साल 2019 में ऐसा क्या खास है कि लाखों लोग अचानक दुनिया को यह बताने में लग गए कि वे आज के मुकाबले दस साल पहले कैसे दिखते थे? पिछले कुछ समय से चर्चा बटोर रहे हैशटैग टेन ईअर चैलेंज शुरू करने का मकसद क्या रहा होगा? तमाम डेटा एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस हैशटैग के साथ पोस्ट की जा रहीं दस साल के अंतरों वाली तस्वीरों का इस्तेमाल फेसबुक अपने फेस रिकग्नीशन अल्गोरिदम को सुधारने के लिए कर रहा है.

12 जनवरी 2019 को किताब ‘टेक ह्यूमनिस्ट: हाउ यू कैन मेक टैक्नॉलजी बैटर फॉर बिज़निस एंड बैटर फॉर ह्यूमन्स’ की लेखिका केट ओ’ नील ने ट्विटर पर लिखा - ‘दस साल पहले मैं: मैंने भी तब शायद फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपनी तस्वीरें डाली होतीं. मैं अब: सोचती हूं कि किस तरह इस सारे डेटा को चेहरा पहचानने वाले अल्गोरिदम को प्रशिक्षण देने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.’ इस ट्वीट को 11 हज़ार से ज़्यादा बार रीट्वीट किया गया. हालांकि बहुत सारे लोगों को अब भी इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है और वे मौज-मजे के लिए फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अपनी आज और दस साल पहले की तस्वीरें डाले जा रहे हैं.

हालांकि फेसबुक ने यह कहते हुए इस तरह के आरोपों को नकार दिया कि टेन ईअर चैलेंज को उसने नहीं, यूजर्स ने शुरू किया था और इसमें उन्हीं तस्वीरों का इस्तेमाल हो रहा है जो फेसबुक पर पहले से मौजूद है. फेसबुक प्रवक्ता ने यह भी कहा कि इस सोशल नेटवर्किंग साइट को इस मीम से कुछ हासिल नहीं हो रहा है और यूजर्स फेसबुक के फेस रिकग्नीशन फाचर को जब चाहे बंद कर सकते हैं.

15 जनवरी को केट वायर्ड डॉट कॉम पर एक लेख में इस बारे में विस्तार से लिखती हैं. वे बताती हैं कि बेशक साल 2009 की तस्वीरें फेसबुक पर पहले से ही मौजूद हैं लेकिन क्या ज़रूरी है कि वे तस्वीरें 2009 में ही ली गई हों. हर तस्वीर का एक्सिफ डेटा (जिसमें तस्वीर लिए जाने की तारीख और जगह की जानकारी होती है) भी ज़रूरी नहीं कि उसमें मौजूद ही हो (क्योंकि व्हाट्सएप जैसे कुछ प्लैटफॉर्म्स तस्वीरों से एक्सिफ डेटा हटा देते हैं) या फिर सही हो (अगर किसी ने किसी तस्वीर की तस्वीर खींचकर फेसबुक पर अपलोड की होगी तो उसका एक्सिफ डेटा असली तस्वीर के एक्सिफ डेटा से अलग होगा). ऐसे में एक मीम के ज़रिए इतनी आसानी से एक बहुत बड़ा डेटा जुटा लेना फेसबुक के लिए बेहद कीमती हो सकता है.

केट फेस रिकग्नीशन अलगोरिदम के बेहतर हो जाने के कुछ फायदे भी गिनाती हैं. जैसे कि इसके ज़रिए पुलिस खोए हुए बच्चों के चेहरे में आए बदलाव का अंदाज़ा लगा कर उन्हें तलाश सकती है. या कई साल बाद भी अपराधियों को पहचान कर उन्हें पकड़ सकती है. लेकिन इसके ज़रिए उन लोगों को भी निशाना बनाया जा सकता है जो अपराधी नहीं हैं लेकिन सरकार विरोधी प्रदर्शनों आदि में शामिल होने के कारण पुलिस के रडार पर हैं.

पर असली मुद्दा यह है कि क्या इस तरह का डेटा उपभोक्ताओं को पूरी जानकारी देने के बाद नहीं जुटाया जाना चाहिए? ताकि वे यह तय कर सकें कि वे अपनी तस्वीरें ऐसे किसी डेटाबेस या अल्गोरिदम को देना चाहते हैं या नहीं?

फेसबुक और और बाकी सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पहले ही अपने उपभोक्ताओं का डेटा, बिना उनकी मर्ज़ी और जानकारी के, सरकारी, गैर-सरकारी एजेंसियों को बेचने के गुनाहगार रह चुके हैं. साल 2013 में अमेरिका की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी का सर्विलेंस मिशन ‘प्रिज़्म’ अब भी सोशल मीडिया की जानकारी रखने वालों के ज़ेहन में ताज़ा है. गूगल, फेसबुक, याहू, एपल और माइक्रोसॉफ्ट समेत नौ बड़ी कंपनियों ने तब भी इस बात को नकार दिया था कि उन्होंने अपने उपभोक्ताओं की जानकारियां एनएसए को दी हैं. लेकिन व्हिसिलब्लोअर और एनएसए के ही कॉन्ट्रैक्टर रहे एडवर्ड स्नोडन के खुलासे ने उनके इस झूठ से पर्दा उठा दिया. इसी तरह करोड़ों फेसबुक यूजर्स का डेटा, बिना उनकी मर्ज़ी और जानकारी के इस्तेमाल करने वाली फर्म केंब्रिज एनालिटिका की कहानी भी किसी से छिपी नहीं है.

डरने वाली बात यह है कि हम बिना सोचे-समझे अपनी निजी ज़िंदगी, अपनी बेहद निजी जानकारियां सोशल मीडिया पर खुले-आम प्रदर्शित कर रहे हैं, और हममें से ज़्यादातर को कोई अंदाज़ा तक नहीं है कि इसका किस हद तक और किस काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.

स्नोडेन मामले पर इसी नाम से 2016 में आई ओलिवर स्टोन की फिल्म का एक दृश्य जहां स्नोडेन सीआइए के अपने अधिकारी से तर्क करता है कि लोगों की जानकारी हम बिना उनकी मर्ज़ी के कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं, यहां साझा करना दिलचस्प हो जाता है.

कॉर्बिन (सीआइए सीनियर): तुमने कभी सोचा है, एड, कि वर्ल्ड वॉर-2 को 60 साल हो गए और तीसरा वर्ल्ड वॉर अब तक क्यों नहीं हुआ? क्योंकि हम अपनी ताकत को दुनिया की भलाई के लिये इस्तेमाल करते हैं. उनकी समृद्धि के लिए, शांति के लिए. दुनिया भर में हमारे लिए रात-दिन काम कर रही एक सेंट्रलाइज़्ड इंटेल फैक्ट्री के बिना हम न्यूक्लियर वॉर, साइबर अटैक या आतंकवादी हमले से अपनी रक्षा कैसे कर सकते हैं?

स्नोडेन: इसका मतलब ये है कि हमें करोड़ों लोगों की ज़िंदगियों की लिस्ट बना कर रख लेनी चाहिए?

कॉर्बिन: ज़्यादातर लोग खुद ही अपनी ज़िंदगियों को लिस्ट बनाकर जनता के इस्तेमाल के लिए सोशल मीडिया पर रख रहे हैं.

स्नोडेन: पर वे अपनी ज़िंदगी का कुछ ही हिस्सा सामने रखते हैं, और वो भी अपनी मर्ज़ी से. हम उनसे ये हक छीन रहे हैं. हम उनका सबकुछ ले रहे हैं.

कॉर्बिन: ज़्यादातर अमेरिकन आज़ादी नहीं सुरक्षा चाहते हैं. ये सीधा-सीधा सौदा है. अगर आप इन सारे नए खिलौनों से खेलना चाहते हो और सुरक्षित भी रहना चाहते हो तो आपको अंदर आने की कीमत चुकानी पड़ेगी.

स्नोडेन: लेकिन लोगों को ये अंदाज़ा भी नहीं है कि वो ऐसा कोई सौदा कर रहे हैं.

कॉर्बिन: ये बताओ कि आज जंग के मैदान कहां हैं?

स्नोडेन: हर जगह.

कॉर्बिन: जंग का पहला कायदा क्या है?

स्नोडेन: दुश्मन को पता नहीं लगना चाहिए कि आप कहां हो.

कॉर्बिन: अगर एक ऐसे बंदे को आपकी पोज़ीशन की जानकारी मिल जाए, जिसे नहीं होनी चाहिए तो? अगर पार्लियामेंट जान जाए तो?

स्नोडेन: तो दुश्मन भी जान जाएगा.

कॉर्बिन: तो यही मिस्टर स्नोडेन दुनिया के हालात हैं. राज़ का राज़ रहना ही सुरक्षा है और सुरक्षा का मतलब है जीत.

लेकिन जल्द ही स्नोडेन को समझ आ जाता है कि यह सिर्फ सुरक्षा या खतरों के प्रति चौकन्ना रहने का मसला नहीं है बल्कि हर हाल में हर चीज को अपने नियंत्रण में रखने के लिए लोगों की ज़िंदगियों के सबसे निजी पलों तक में सेंध लगाने का मसला है. और तमाम क्रांतियों की वाइस बन चुकी सोशल नेटवर्किंग कंपनियां हमारी निजी जानकारियों का सौदा इन सरकारों से करती आ रही हैं.

अपनी किताब ‘अनएंडिंग गेम्स: अ फॉर्मर रॉ चीफ़्स इनसाइट इनटू एसपियोनेज’ में विक्रम सूद लिखते हैं, ‘गूगल 1998 में एक छोटे सर्च इंजन की तरह शुरू हुआ जब लैरी पेज और सर्गे ब्रिन नाम के दो स्टैनफर्ड के विद्यार्थियों ने एक ऐसी अल्गोरिदम खोजी जो वेब पर बेहतर सर्च रिज़ल्ट दे सकती थी. तब से गूगल इंटरनेट की दुनिया की बहुत बड़ी ताकत बन गया. इसकी जीमेल सेवा एक गीगाबाइट डेटा के साथ शुरू हुई थी जबकि हॉटमेल महज़ दो मेगाबाइट दे रही थी. वक्त के साथ गूगल ने गूगल कॉन्टैक्ट्स, गूगल मैप्स, गूगल अर्थ, गूगल ड्राइव, गूगल क्रोम, गूगल वीडियो (यूट्यूब) और गूगल एंड्रॉइड जैसी बाकी सेवाएं भी शुरू कर दीं. आज गूगल के ब्रांड की कीमत 82 बिलियन डॉलर है. इन सबके लिए पैसा कहां से आता है, जबकि गूगल, यूट्यूब, फेसबुक लिंक्डइन या ट्विटर अपनी सेवाओं के लिए उपभोक्ता से कोई पैसा नहीं लेते? इसका एक ही जवाब हो सकता है कि ये सब महान परोपकारी संस्थान हैं जो लगातार बढ़ती तकनीकी की दुनिया में वे सेवाएं मुफ्त में दे रहे हैं जिनकी मानवता को ज़रूरत है. पर फ्री-मार्केट कैपटलिज्म के काम करने के तरीके के आधार पर कोई इस जवाब को पचा नहीं पाएगा. जहां दिलचस्पी हो, वहीं सौदा हो सकता है; ये तो बेहद पुरानी एडम स्मिथ की थ्योरी है.’

वे आगे लिखते हैं, ‘सच्चाई यह है कि उपभोक्ता दरअसल खरीददार है ही नहीं, वह खुद एक प्रॉडक्ट है. यह इसी तरह काम करता है और इसे मार्क गॉडमैन ने बड़ी आसानी से समझाया है. हर एक सेवा इस तरह डिज़ाइन की गई है कि वह उपभोक्ता को अपने और अपनी ज़िंदगी के बारे में जानकारी देने के लिए फुसला सके, फंसा सके या बहका सके. यह बहुत मासूमियत से शुरू होता है, पर हर उपभोक्ता द्वारा इंटरनेट पर की जाने वाली हर एक सर्च, हर लिंक जिस पर क्लिक किया गया है, या किसी भी तरह की गतिविधि, गूगल की आर्काइव में जमा हो जाती है. भेजे गए और रिसीव किए गए हर मेल का हिसाब-किताब रखा जाता है. उपभोक्ताओं के प्रोफाइल इकट्ठे किए जाते हैं और दुरुस्त किए जाते हैं. जब गूगल ने कॉन्टेक्ट्स को ऑनलाइन सेव करने की सुविधा पेश की, तब वह किसी भी व्यक्ति के सोशल सर्कल का आकार, ताकत और उसकी खरीदने की क्षमता का आकलन कर सकता था. फ्री जीपीएस के साथ गूगल मैप्स उन सभी जगहों का हिसाब रखता है जहां आप गए हैं; गूगल वॉइस हर उस नाम और नंबर का हिसाब रखता है जिसे आपने फोन किया है, ये आवाज़ पहचानने वाले और आवाज़ को टेक्स्ट में बदलने वाले सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से आपके वॉइस मेल मैसेज को ट्रांसक्राइब कर सकता है. गूगल की फ्री एंड्रॉइड सर्विस उपभोक्ता के स्मार्टफोन के ज़रिए उसे ट्रैक करती है.’

पूर्व रॉ चीफ की यह बात डराने वाली है, पर वे सिर्फ तथ्यों को ही सामने रखते हैं जब बताते हैं कि ‘2012 के बाद से, जब गूगल ने घोषणा की कि वह अपने सभी प्लैटफॉर्म्स का डेटा एक केंद्रीकृत जगह पर ला रहा है, तब से तो सभी क्वैरी, ईमेल, वॉइस मेल, तस्वीरें, कमेंट और लोकेशन पहले से बेहतर तरीके से वर्गीकृत करके जमा किए जा रहे हैं. अगर कोई अपने फोन को पास रखकर (किसी से आमने-सामने) बातचीत कर रहा है, तो गूगल उसे रिकॉर्ड कर अपने पास रख सकता है. यहां तक कि आम बातचीत भी अपने आप फोन के रिकॉर्डिंग फंक्शन को शुरू कर सकती है. फेसबुक एनक्रिप्शन लाने की योजना बना रही है, लेकिन इस तरह कि वे फिर भी सारे मैसेज पढ़ सकें. किसी भी व्यक्ति, समूह या संस्था की कोई भी सर्च, आसमान में एक बड़े कंप्यूटर अल्गोरिदम में, पेटाबइट्स की मात्रा में इकट्ठी हो रही हैं और करोड़ों में बेची जा रही हैं. सच्चाई यह है कि ‘गूगल कुछ नहीं भूलता और कुछ भी डिलीट नहीं करता.’

हालात ये हैं कि हम सब एक बड़े सर्विलेंस डोम के नीचे हैं, हमारा हर कदम कैमरे की आंख की निगरानी में है, हमारी लगभग हर बातचीत सुनी जा रही है, और हर जानकारी इस्तेमाल की जा रही है, बिना हमारी जानकारी के. इसका असर हम पर किस तरह पड़ रहा है वह अपने आप में एक बड़ा मुद्दा है. लेकिन फिलहाल हमें यह समझने की ज़रूरत है कि हम इंटरनेट और तकनीक की इस दुनिया में उपभोक्ता बने रहना चाहते हैं या फिर हमें उत्पाद या प्रॉडक्ट बनने से कोई ऐतराज नहीं है.