एक फरवरी को मोदी सरकार का अंतरिम बजट लोकलुभावन होगा, इसमें शक-शुबहे की कोई बात नहीं है. भारत में चुनावी साल में बजट के मतदाताओं को लुभाने का दस्तावेज बन जाने की कमोबेश परंपरा ही रही है. 1991 में उदारीकरण के बाद से ही हमारे यहां आर्थिक सुधार के कार्यक्रम और लोकलुभावन घोषणायें अक्सर एक-दूसरे के समानातंर चलती रही हैं.

आर्थिक जानकारों का मानना है कि मोदी सरकार आगामी लोकसभा चुनाव से पहले अंतरिम बजट में ग्रामीण क्षेत्र और मध्यम वर्ग पर तोहफों की बरसात कर सकती है. इसके तहत किसानों की कर्जमाफी से लेकर मिनीमम बेसिक इनकम ( न्यूनतम आय गारंटी) की तर्ज पर सीधे कैश ट्रांसफर जैसी घोषणायें की जा सकती हैं. मध्य वर्ग को आयकर दायरे में छूट भी दी जा सकती है. इसके अलावा जीएसटी और नोटबंदी के कारण नाराज चल रहे लघु और मध्यम वर्ग के कारोबारियों को भी राहत की सौगात मिल सकती है. जीएसटी में छूट से भी यह इशारा मिल ही चुका है.

जानकारों के मुताबिक, सरकार कृषि क्षेत्र को जो राहत देने की घोषणा कर सकती है, उसका खर्च ही एक लाख करोड़ रुपये या उससे अधिक हो सकता है. सवाल उठता है कि इस तरह की योजनाओं वाले भारी-भरकम चुनावी बजट के लिए पैसे कहां से आएंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि जीएसटी और अन्य वजहों से सरकार पहले ही राजस्व की कमी से जूझ रही है.

खबरों के मुताबिक, 2019 के वित्तीय वर्ष में सरकार अपने राजस्व लक्ष्यों से काफी पीछे रह सकती है. जीएसटी लागू होने के बाद सरकार को अनुमान था कि इस वित्तीय वर्ष में वह इससे करीब 13.48 लाख करोड़ रुपये जुटा लेगी. लेकिन ताजा आकंड़ों के मुताबिक चालू वित्तीय साल के शुरुआती नौ महीनों में सिर्फ 97,000 करोड़ की औसत दर से ही कर संग्रह हुआ है. इसके अलावा टेलीक़ॉम सेक्टर और विनिवेश से आने वाला राजस्व भी लक्ष्य से पीछे है. इन आंकड़ों से साफ है कि अंतरिम बजट में होने वाली लोकलुभावन घोषणाओं से 2019-20 में खर्च तो पहले से काफी बढ़ने वाला है, लेकिन आमदनी का कोई भरोसा नहीं है.

ऐसे में सरकार आर्थिक सुधार की सबसे बड़ी शर्त राजकोषीय घाटे में कमी के अपने लक्ष्य से पीछे हट सकती है. जानकारों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2019-20 के लिए सरकार राजकोषीय घाटे की सीमा को बढाकर जीडीपी की 3.3 फीसदी कर सकती है. पहले यह लक्ष्य 3.1 फीसद था. बाजार पर नजर रखने वाले कुछ जानकार राजकोषीय घाटे के जीडीपी के पांच फीसद तक जाने की बात कह रहे हैं. जाहिर है कि इससे सुधार कार्यक्रमों को धक्का लगेगा और सरकार पर कर्ज का बोझ भी बढ़ेगा. रेटिंग एजेंसी मूडीज ने इस संबंध में सरकार को चेताया भी है.

सरकार अपनी आमदनी और खर्च के अंतर को कम करने की कोशिश कुछ और तरीकों से कर सकती है. मसलन आरबीआई से अंतरिम डिविडेंड के तौर पर उसे 40 से पचास हजार करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है. कुछ आर्थिक जानकार मानते हैं कि मोदी सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए अप्रत्यक्ष कर और माल भाड़े में वृद्धि भी कर सकती है. ये कदम अंत में महंगाई का सबब बन सकते हैं. इसके अलावा वह शिक्षा और स्वास्थ्य के पहले से ही कम बजट को और कम भी कर सकती है. पर इस तरह के कदम कमजोर आय वर्ग के लिए मुश्किलें ही पैदा करेंगे. इसके बावजूद सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बढ़ाना ही पड़ेगा. इससे महंगाई बढ़ सकती है और बाजार और निवेशकों में भी इसका अच्छा संदेश नहीं जाने वाला है.

इस सबके बीच श्रम सुधार और उड्डयन क्षेत्र में सुधार जैसे मुद्दों पर कोई बात होती नहीं दिखती. कॉरपोरेट टैक्स कम करने का वादा भी इस बार पूरा होता नहीं लगता. कुल मिलाकर ऐसा लग रहा है कि 2019 के अंतरिम बजट में सियासत के दबाव में आर्थिक सुधारों को वित्त मंत्री पूरी तरह ताक पर रखने वाले हैं.