निर्देशक : अनु मेनन

लेखक : देविका भगत, इशिता मोइत्रा (संवाद)

कलाकार : शायोनी गुप्ता, कीर्ति कुल्हारी, बानी जे, मानवी गगरू, प्रतीक बब्बर, नील भूपालम, लीसा रे, मिलिंद सोमण, सिमोन सिंह, अमृता पुरी, अंकुर राठी, पारस तोमर, राजीव सिद्धार्थ

रेटिंग : 2.5 / 5

एमेजॉन प्राइम वीडियो की नई हिंदुस्तानी वेब सीरीज ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ में महिलाएं प्रमुखता से मौजूद हैं. न केवल इस महिला-प्रधान सीरीज का चेहरा चार होनहार अभिनेत्रियां हैं, बल्कि पटकथा और संवाद लेखक से लेकर निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर, एडिटर और शो-रनर तक महिलाएं हैं. प्रीतीश नंदी के प्रोडक्शन हाउस की इस पेशकश को उनकी बेटी रंगीता प्रीतीश नंदी ने पेश किया है और ‘द वेटिंग’ जैसी खूबसूरत फिल्म बनाने वाली अनु मेनन इसकी निर्देशिका हैं.

तो क्या इसका मतलब यह हुआ कि यह वेब सीरीज सिर्फ महिला दर्शकों के लिए बनी है? और क्या पुरुष दर्शकों का इससे ‘कनेक्ट’ कर पाना मुश्किल है?

ये दिलचस्प सवाल हमारे जेहन में भी उठे जब हम तकरीबन तीस मिनट अवधि के इसके 10 एपीसोड देखने बैठे. किसी ने कह भी दिया कि यार तुम इसपर क्यों लिख रहे हो, किसी महिला को इस महिला-प्रधान सीरीज पर लिखना चाहिए. दिमाग ठनका, कि क्या महिला सेक्सुअलिटी के इर्द-गिर्द घूमने वाला सिनेमा मर्दों के लिए नहीं होता? या उनकी समझ के परे का होता है?

जैसे एक जमाने में लड़कों की मौज-मस्ती पर फिल्में बनती थीं (‘दिल चाहता है’, ‘ये क्या हो रहा है’, ‘रॉक ऑन’, ‘दोस्ताना’, ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा’), आज रोल-रिवर्सल के तहत वैसी मौज-मस्ती को तड़क-भड़क अंदाज में लड़कियों के साथ बनाया जा रहा है. ‘एंग्री इंडियन गॉडेसिस’, ‘वीरे दी वेडिंग’ जैसी फिल्में फीमेल-बॉन्डिंग के लिए मशहूर हो रही हैं और इनके बोल्ड होने के चलते संस्कारों के कुछ अब्बाजान आलोचना की तलवार लेकर खड़े हो रहे हैं और कह रहे हैं कि आखिर न्यूडिटी, सेक्स और सिगरेट पीने को फेमिनिज्म थोड़े कहते हैं!

इस तरह की दलील देने वालों के लिए यह सीरीज नहीं है. उन लोगों के लिए है जो समझते हैं कि पुरुष-प्रधान सिनेमा ने जब दशकों से इन एडल्ट थीम्स को सिनेमा में अपने नजरिए से देखा है, तो कुछ वक्त के लिए महिलाओं के नजरिए से इन बोल्ड थीम्स को एक्सप्लोर होता देखने में कोई बुराई नहीं है. और जो यह भी समझते हैं कि सिगरेट-शराब पीने वालीं, सेक्स पर खुलकर बातचीत करने वाली लड़कियां ‘बुरी लड़कियां’ नहीं होतीं. हमारे आसपास मौजूद लड़कियां ही होती हैं.

‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ में सेक्स से जुड़ी हर वह चीज अर्बन महिलाओं के नजरिए से चित्रित हुई और कही गई मिलती है जिसे आप ‘अमेरिकन पाई’ जैसी फिल्मों से जोड़कर देखते हैं. न्यूडिटी के चित्रण को लेकर इसमें ‘सेक्रेड गेम्स’ जैसी हिम्मत तो नहीं है लेकिन यह सेक्स से जुड़ी किसी भी बात को एक्सप्लोर करने से झिझकती नहीं है. इसके संवाद कई दफा एकदम नयी बात करते मालूम होते हैं और इस तरह के संवाद सुनने की हमारी-आपकी आदत नहीं है. ऐसे ही क्षणों के दौरान समझ आता है कि एक महिला टीम द्वारा रचे सिनेमा का व्याकरण पारंपरिक सिनेमा से किस कदर अलग होता है (फीमेल गेज़).

कई बार यह सीरीज वर्तमान समय की हिंदी फिल्मों से कहीं ज्यादा बोल्ड खुद को साबित करती है. चारों नायिकाएं जब एक ‘ट्रक बार’ में मिलती हैं तो उनकी गुफ्तगू नकली नहीं लगती, बल्कि हमें मुंबई जैसे अर्बन शहरों के किसी पब/बार में बैठी बेबाक महिलाओं के करीब ले जाकर बिठा देती है. और आपको वीमेन सेक्सुअलिटी की इस बेबाक अभिव्यक्ति को देखकर वेब सेंसरशिप की चाहत रखने वाले संस्कारी अब्बाजानों की चिल्ला-चोट थोड़ी ऊंची भी सुनाई देने लगती है!

यह सीरीज कुछ क्रांतिकारी नायिकाएं गढ़ने की भी कोशिश करती है. ऐसी नायिकाएं जो खुद को अपनी सेक्सुअलिटी से परिभाषित करने में हिचकिचाती नहीं. सीरीज में एक बच्ची की मां और सफल वकील कीर्ति कुल्हारी (अंजना), सच्ची पत्रकारिता करने की कोशिश करने वाली शायोनी गुप्ता (दामिनी), बाइसेक्सुअल जिम ट्रेनर बानी जे (उमंग), और मां के दबावों के चलते शादी को अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य समझने वाली मानसी गगरू (सिद्धी) के किरदारों के सहारे सीमाएं तोड़ती अर्बन महिलाओं का चित्रण किया गया है.

इन चारों में सबसे ज्यादा प्रभावित मानसी गंगरू करती हैं. वे अपने वजनदार अभिनय से एक वजनी लड़की की पीड़ाओं और खुशिओं को गहरा उकेरती हैं. शायोनी गुप्ता पहली बार ग्लैमरस रोल में हैं और प्रभावी तरीके से अपने किरदार को निभाती हैं. लेकिन उनके करियर पत्रकारिता का सीरीज में चित्रण सतही है जबकि प्रीतीश नंदी जैसे भूतपूर्व पत्रकार के सीरीज से जुड़े होने के चलते आप बेहतर और यथार्थवादी चित्रण की उम्मीद करते हैं.

कीर्ति कुल्हारी हमेशा से इम्प्रेसिव काम करती आई हैं और इस बार भी मां और काम की थकान को ओढ़ने के साथ ही बंदिशें तोड़ने की ललक को भी बखूबी चेहरा देती हैं. बानी जे अभिनय में कच्ची होने के बावजूद कमर्शियल हिंदी सिनेमा में बेहद दुर्लभ माने जाने वाले बाइसेक्सुअल युवती के किरदार को बखूबी निभाती हैं. मर्दों की मौजूदगी प्रमुखता से सीरीज में नहीं है, लेकिन फिर भी प्रतीक बब्बर और नील भूपालम को देखकर अच्छा लगता है. मिहिर नाम का किरदार निभाने वाले नए अभिनेता राजीव सिद्धार्थ भी प्रभावित करते हैं.

हल्की-फुल्की चिक फ्लिक (Chick Flick) की तरह रची गई ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ देखते वक्त आपको ‘सेक्स एंड द सिटी’ सीरीज और ‘वीरे दी वेडिंग’ फिल्म की हर हाल में याद आएगी. रईस नायिकाओं के साथ मिलकर शराब पीने और सेक्स पर बात करने वाली ‘सेक्स एंड द सिटी’ का प्रभाव तो खासा ज्यादा है, और चारों नायिकाओं के कई सीन इस पुरानी बहुचर्चित अमेरिकी सीरीज की याद दिलाएंगे.

लेकिन ऐसा होना ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ की सबसे बड़ी कमी नहीं है. एमेजॉन की इस सीरीज की एक बड़ी कमी तो ये है कि इसकी कई घटनाएं घोर फिल्मी हैं. ये घटनाएं प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशन्स की कई पुरानी और खुद को समझदार समझने वाली सतही फिल्मों –‘पॉपकॉर्न खाओ मस्त हो जाओ’ से लेकर ‘शादी के साइड इफेक्ट्स’ तक – के स्तर का आईक्यू रखती हैं.

और सबसे बड़ी कमी है कि क्रांतिकारी नायिकाएं गढ़ने की ‘कोशिश’ करने के बावजूद यह सीरीज उन्हें लेकर किसी तसल्ली बख्श यात्रा पर नहीं निकलती. गोल-गोल ज्यादा घूमती है और केवल उनकी सेक्स लाइफ के चारों ओर 10 एपीसोड तक घूमती है. यह एक वक्त बाद हद उबाऊ हो जाता है और चारों अभिनेत्रियों के प्रभावी अभिनय तथा साथ वाले बेहद शानदार दृश्यों के बावजूद उन्हें खुद को हर एपीसोड में दोहराते हुए देखना रास नहीं आता. आखिर कोई कितना किस-सीन और सेक्स-सीन और सेक्स को केंद्र में रखकर की गई बातचीत देख सकता है! कहानी को आखिरकार आगे तो बढ़ना ही होता है और ऐसे फ्रिक्शन व कॉन्फ्लिक्ट पटकथा में पिरोने होते हैं जो दर्शकों को लंबे फॉर्मेट वाले सिनेमा में आखिर तक बांधकर रख सकें.

‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ ऐसा नहीं कर पाती. हाल में रिलीज हुई नेटफ्लिक्स की ‘सेक्स एजुकेशन’ नामक सीरीज की तरह वह सेक्स की टेक लेकर कोई कमाल बात नहीं कहती. जो कुछ भी इस हिंदुस्तानी सीरीज के आखिरी एपीसोड में होता है उसे आधे एपीसोड्स गुजर जाने के बाद ही हो जाना चाहिए था, ताकि उसके बाद सीरीज नए मोड़ ले सकती, नयी यात्राएं तय करने निकल सकती. लेकिन चूंकि सीरीज की कहानी का फैलाव ही बेहद सीमित था और आजकल हर वेब सीरीज को मल्टी-सीजन होने का भी चस्का है, इसलिए सीजन 2 के लालच में ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ खुद को बेहिसाब खींचती है.

इससे एक नयी कमी की तरफ भी ध्यान जाता है, जिससे इन दिनों हमारी कई वेब सीरीज ग्रस्त मालूम होती हैं. आने वाले वक्त में पक्के से कई दूसरी नयी सीरीज भी ग्रस्त होने ही वाली हैं. यानी, लेखन में इंडल्जंट होना.

वेब सीरीज का फॉर्मेट इन दिनों इसलिए विश्वभर में पसंद किया जा रहा है क्योंकि ये बारीकी से कैरेक्टर डेवलप करने के असीम मौके देता है. लेखन की टेक लेकर एपीसोड दर एपीसोड किरदारों को महीन विशेषताएं दी जा सकती हैं, जिससे कि वे दर्शकों पर गहरा असर छोड़ पाते हैं और सीरीज प्लॉट-ड्रिवन नहीं भी हुई तब भी कैरेक्टर-ड्रिवन होकर दर्शकों के लिए बिंज-वर्थी हो जाती है. लेकिन हमारे यहां लेखन का यह नया फॉर्मेट कुछ सीरीज बनाने वालों को इंडल्जंट बना रहा है और वे विस्तार देने की जगह कहानी को बेवजह खींच रहे हैं. इरोस नाउ की वेब सीरीज ‘स्मोक’ में भी हमने यह होते हुए देखा था और अब ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज!’ में भी यह कमी प्रमुखता से उभरकर सामने आई है.

वैसे तो दूसरे सीजन की हरी झंडी इन दिनों तकरीबन हर वेब सीरीज को मिल रही है. लेकिन बेहद कम सीरीज अपने पहले सीजन के अंत में दर्शकों को इतना भूखा छोड़ पा रही हैं कि वे दूसरे सीजन के लिए बेचैन हो जाएं. हर सीरीज ‘सेक्रेड गेम्स’ और ‘मिर्जापुर’ नहीं हो पा रही, क्योंकि उनका लेखन उन्हें कहीं न कहीं दगा दे रहा है. वोदका शॉट्स तो कभी भी मांगे जा सकते हैं जनाब, लेकिन ऐसी सीरीज को सबसे पहले यह जरूरी चीज मांग लेना चाहिए - ‘सम मोर राइटिंग प्लीज!’

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