पहले शहर का नाम और फिर मेले का ओहदा बदलना शायद काफी नहीं लगा तो उत्तर प्रदेश की सरकार ने पुराने इलाहाबाद को प्रयागराज का नया चेहरा देने की ठानी. ‘पेंट माय सिटी‘ की मुहिम इसी संकल्प का हिस्सा लगती है. प्रयाग या इलाहाबाद स्टेशन पर उतरने वाले मुसाफ़िरों को अपने आसपास की दीवारों से ही किसी नई जगह पहुंचने का अहसास हो, इसलिए नज़र में आने वाली हर दीवार पर ख़ूब चटख़ रंग हैं, कुछ चीन्ही, कुछ अनचीन्ही तस्वीरें हैं और इतनी बड़ी भी हैं कि लोगों को बौना होने का अहसास करा सकें.

कुंभ के सरकारी पोर्टल पर कहा गया है कि प्रयागराज मेला प्राधिकरण श्रद्धालुओं और पर्यटकों के आने के पहले प्रदेश के सुंदरीकरण के सरकार के प्रयासों में सहयोग के उद्देश्य से प्रयागराज में 20 लाख वर्ग फीट क्षेत्र में स्ट्रीट आर्ट प्रोजेक्ट के तहत काम करेगा. मेला ख़त्म होने के बाद ये कलाकृतियां शहर की स्थायी विरासत होंगी, साथ ही सार्वजनिक जगहों के सौंदर्य में इजाफ़ा भी होगा.

और ऐसा हुआ भी, यानी मेला शुरू होते-होते शहर भर की बेशुमार इमारतें, तमाम इलाक़ों की दीवारें, नए-पुराने पुलों के खंभे और यहां तक कि धूसर पत्तियों वाले पेड़ों के तने भी कैनवस बन गए. समुद्र मंथन की छवियां शिल्प की शक्ल में हैं और तस्वीरों की शक्ल में तो कितनी ही जगहों पर. संगम फ्लाईओवर पर, इलाहाबाद डिग्री कॉलेज की बाउण्ड्री वॉल पर और नैनी सेंट्रल जेल की बाहरी दीवार पर तो 54 हज़ार वर्ग फीट में समुद्र मंथन के प्रसंग के चित्र बनाए गए हैं. मंथन की कथा के हवाले से ऐसी चीज़ें जो सिर्फ़ लोगों की कल्पना में बसती थीं, उन्हें भी मूर्त रूप मिल गया है – कौस्तुभमणि, रम्भा, वारुणी, कल्पवृक्ष और उच्चैःश्रवा को भी कामधेनु, ऐरावत, लक्ष्मी और पांचजन्य के साथ साक्षात देखा जा सकता है.

पुराणों से होते हुए इस कला का दायरा इतिहास और वर्तमान तक भी चला आया है. हरिवंश राय बच्चन, अमिताभ बच्चन, अटल बिहारी वाजपेयी, एपीजे अब्दुल कलाम, बिस्मिल्लाह खान, लता मंगेशकर, अमजद अली खान, ज़ाकिर हुसैन, हरिप्रसाद चौरसिया की छवियां जहां-तहां देखने को मिलती हैं, तो साधु-संतों और देवी-देवताओं की छवियां कहीं भी देख सकते हैं.

ये तस्वीरें बनाने का ज़िम्मा जिन एजेंसियों को दिया गया, तस्वीरों के चयन के लिए उन्हें चार सूत्र दिए गए – उत्तर प्रदेश और प्रयागराज की सांस्कृतिक विविधता और विरासत, कुंभ का धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थ, कुंभ की पौराणिक पृष्ठभूमि और सामाजिक जागरूकता के संदेश. और उन्होंने इन्हीं को आधार मानकर जो रचा, ख़ुद ही उस पर ख़ूब मुग्ध होकर मीडिया से कहा – शहर आर्ट गैलरी में तब्दील हो गया. शहर का नाम बदलने के समर्थकों को दीवारें अब गाती हुई सी लगती हैं. धर्म, संस्कृति और आस्था का जीवंत रूप.

‘इस बात से ख़ैर मैं भी सहमत हूं कि शहर किसी अनुष्ठानिक तैयारी में जुटा दिखाई देने लगा है. ऐसी तमाम इमारतें-दीवारें, बनने के बाद जिन पर कभी रंग-रोगन नहीं हुआ था, अचानक चमकने लगी हैं. मगर इसमें इलाहाबाद की विरासत और परंपरा कहां है?‘, इलाहाबाद संग्रहालय में क्यूरेटर रह चुके कला इतिहास के अध्येता डॉ. श्रीरंजन शुक्ल सवाल करते हैं. वे कहते हैं कि इलाहाबाद अपनी सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के लिए पहचाना जाता है, जंग-ए-आज़ादी में अपने योगदान के लिए जाना जाता है मगर इस कथित आर्ट गैलरी में सजाई गई तस्वीरों से तो यह पता नहीं चलता. श्रीरंजन शुक्ल बताते हैं, ‘देश के तमाम नामचीन चेहरों को यहां जगह मिली, अच्छी बात है मगर नेहरू-इंदिरा की कोई तस्वीर क्यों न हो भला? फ़ैसला करने वाले लोग अगर तटस्थ रहते तो ज्यादा बेहतर होता.’

‘पेंट माय सिटी‘ की इस मुहिम में तीन लाख, पांच लाख या बीस लाख वर्ग फीट में तस्वीरें बनाई गई हैं. अलग-अलग अनुमानों में खर्च का आंकड़ा 89 करोड़ से लेकर 125 करोड़ रुपये तक बताया जाता है. लेकिन इसके बारे में सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है क्योंकि आधिकारिक रूप से कोई इसका जवाब नहीं देता. वरिष्ठ डिज़ाइनर और चित्रकार अशोक सिद्धार्थ का ख़्याल है कि आम शहरी के लिए यह इतना महत्वपूर्ण भी नहीं है कि कितनी रक़म ख़र्च हुई या कितने क्षेत्रफल में काम हुआ. वे कहते हैं, ‘लोगों के लिए ज्यादा ज़रूरी यह है कि जो काम हुआ, वह कितना सार्थक है या उन्हें कितना संतोष देता है, उनके आसपास के माहौल को कितना ऊर्जावान बनाता है. और इस लिहाज़ से मैं कहूंगा कि यह सब सौंदर्य या सुरूचि में कुछ जोड़ने के बजाय उसे कम ही करता है. इसे अश्लील तो नहीं कहूंगा मगर यह अभद्र ज़रूर है.’

अशोक आगे जोड़ते हैं, ‘बिना किसी विचार या योजना के सिर्फ़ रंग फैलाने के इस कृत्य को कुछ और नहीं कहा जा सकता.’ उनका मानना है कि डिज़ाइन और डेकोरेशन में फ़र्क़ समझने वाला, सार्वजनिक जगहों की पवित्रता और पब्लिक आर्ट का मर्म जानने वाला कोई भी शख़्स दीवारों के इस तरह रंगे जाने से हरग़िज़ सहमत नहीं हो सकता.

प्रयाग महिला विद्यापीठ डिग्री कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जूही शुक्ला को पहली प्रतिक्रिया सेंट जोसेफ़ कॉलेज में सातवीं में पढ़ने वाले अपने बेटे से मिली. एक रोज़ घर लौटने के बाद उसने मां को बताया कि उसके कॉलेज की दीवार अजब ढंग से पेंट हो रही है. और कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया उनके पति ने दी, जब दफ़्तर से लौटते वक़्त उन्होंने सर सुंदर लाल हॉस्टल की दीवार पर साइकिल सवार साधु के सामने कैमरे वाले साधु की तस्वीर देखी. बकौल डॉ. जूही, अब तो अपना ही शहर पहचान में नहीं आ रहा है. वे बताती हैं, ‘इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की दीवारों पर राधा-कृष्ण की छवियां हों, या फिर जगह-जगह बनाई गई साधुओं की तस्वीरें, उनमें न तो लोक की सहजता मिलती है और न ही अभिव्यक्ति की परिपक्वता. यह ख़ास तरह का आडम्बर लगता है. हालांकि बहुतेरे लोग तो इसी पर मुग्ध हैं मगर ये वही लोग हैं, जो हर हाल में वाह-वाह करते मिल जाते हैं. सुरुचि से वास्ता रखने वाला कोई भी शख़्स यही कहेगा कि शहर को ऐसे ख़राब नहीं करना चाहिए था.’

उनकी इस बात को समझने के लिए सिविल लाइन्स के मशहूर एलचिको रेस्तरां की दीवार देखना ही काफी होगा. यहां अमिताभ बच्चन की तस्वीर बनाने वालों को उनका चेहरा काफी नहीं लगा तो बैकग्राउंड में उन्होंने टूटी हुई दीवार से झांकती ईंटें और जहां-तहां चटख़ता प्लास्टर भी पेंट किया ताकि देखने वाले को कोई शुबहा न रह जाए कि यह दीवार फ़िल्म वाले अमिताभ ही हैं. रेस्तरां से तस्दीक़ करने पर बताया गया कि यह तस्वीर चुनने या बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं.

इसी तरह सुभाष चौराहे पर पिछले 25 सालों से खड़े सुभाष चंद्र बोस के बुलंद बुत को संगत देने का इरादा किसे और क्यों सूझा, यह तो नहीं मालूम मगर शहरियों ने देखा कि चौराहे को थोड़ा और चौड़ा करके सुभाष चंद्र बोस के बुत के इर्द-गिर्द किसिम-किसिम की बंदूकें लिए हुए छह फौजियों के बुत और लगा दिए गए. हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर यह पता चले कि चूंकि नेताजी ने आज़ाद हिन्द फौज़ बनाई थी, इसलिए उनकी अकेले की मूर्ति को और अर्थवान बनाने के लिए फौज़ियों की तैनाती ज़रूरी लगी.

अरैल घाट के रास्ते में दोनों पर पेड़ों के तनों पर भी चित्रकारी की गई है – मंदिर, घंटियां, साधु और झंडियों के साथ ही ज़ेब्रा, जिराफ, पेंगुइन, मछली और मुस्कुराते हुए मिकी माउस पेड़ों पर क़ाबिज़ हैं. दारागंज में पत्थर से बने प्राचीन नागवासुकि मंदिर की दीवारों को पीला-केसरिया रंग मिल गया है. डॉ.श्रीरंजन के मुताबिक इस इलाक़े के भवनों में झरझरा पत्थर का ही इस्तेमाल हुआ है. इसका गुण यही है कि ‘कैपिलरी एक्शन’ से नमी ऊपरी सतह तक आती रहती है लेकिन अगर पत्थर पर रंग कर देंगे तो छिद्र बंद होने से ‘कैपिलरी एक्शन’ संभव नहीं होगा और नमी अंदर ही बनी रहेगी. हालांकि यह प्रक्रिया धीमी है, लेकिन इससे भवन की मज़बूती और उसकी आयु दोनों प्रभावित होंगे.

चित्रकारों की एक टीम के मुखिया सैफ़ुल इस्लाम ने बताया कि उन्हें जगह दिए जाने के बाद आर्ट और डिज़ाइन का प्रस्ताव उन लोगों ने ही किया था, मगर उनके प्रस्ताव पर आख़िरी फ़ैसला प्रशासन के लोगों ने किया. उनकी मंज़ूरी मिलने के बाद ही उन लोगों ने काम शुरू किया. यानी तस्वीरों के चयन की पूरी ज़िम्मेदारी अफ़सरों की ही रही. अशोक सिद्धार्थ का मानना है कि अगर तस्वीरों के विषय और उन्हें बनाए जाने की जगहों के तालमेल का ध्यान रखा गया होता तो शायद इस क़वायद की सार्थकता साबित होती और पब्लिक आर्ट का मक़सद भी पूरा होता. मगर यह तभी संभव था, जब मक़सद सचमुच शहर को सुंदर बनाना होता.

यूनिवर्सिटी की दीवार पर अलग-अलग शैलियों में बने राधा-कृष्ण पढ़ने और पढ़ाने वालों के बीच भी परिहास की वजह बन गए हैं. वे आपस में एक दूसरे से पूछते हैं, यह विषय किसने सुझाया होगा और भला क्या सोचकर सुझाया होगा? निराला आर्ट गैलरी के पास से गुज़रते हुए छात्रों की एक टोली से यही सवाल जब मैंने पूछा तो उनमें से एक ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, ‘पूरा शहरै पोत दिए हैं. कौन-किसने जानकर आख़िर हम क्या कर लेंगे?’ फिर यह छात्र दुष्यंत के एक शेर का मिसरा गुनगुनाता हुआ आगे बढ़ गया, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए.