केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने अयोध्या मामले में इसी हफ्ते एक नया स्टैंड लिया. उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि अयोध्या में गैर-विवादित जमीन वाला हिस्सा उसे वापस कर दिया जाए. सरकार ने अदालत से कहा कि वह इस जमीन को उसके मूल मालिकों को लौटाना चाहती है. लेकिन सरकार का यह कदम उसके ही सबसे बड़े नेता और पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी के रुख से बिलकुल उलट है. वाजपेयी ने बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि उनकी सरकार गैर-विवादित जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए बाध्य है.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 14 मार्च, 2002 को अटल बिहारी वाजपेयी ने राज्यसभा में बयान देते हुए साफ किया था कि उनकी सरकार जमीन की ‘वैधानिक प्राप्तकर्ता’ है और उसका ‘कर्तव्य है कि वह उस पर यथास्थिति बरकरार रखे.’ रिपोर्ट के मुताबिक उस समय राम जन्मभूमि न्यास ने गैर-विवादित विवादित हिस्से पर ‘प्रतीकात्मक पूजा’ करने का अनुरोध किया था. इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी. वाजपेयी ने संसद को बताया था कि उनकी सरकार ने इस याचिका को लेकर न तो कोई हलफनामा दायर किया है और न ही लिखित बयान जमा कराया है.

दरअसल, 13 मार्च, 2002 को सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश देते हुए कहा था कि विवादित जमीन के नजदीक किसी भी तरह की धार्मिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए. इसके एक साल बाद पांच न्यायाधीशों वाली संवैधानिक पीठ ने इसी तरह का आदेश जारी करते हुए कहा था कि मुकदमें का फैसला होने तक जमीन के दोनों हिस्से ‘आंतरिक रूप से जुड़े हुए हैं’ और अलग नहीं किए जा सकते. उधर, तत्कालीन अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि गैर-विवादित जमीन के ‘अस्थायी इस्तेमाल’ से यथास्थिति संबंधी आदेश का उल्लंघन नहीं होगा.

वाजपेयी ने इसी को लेकर संसद में सरकार का रुख स्पष्ट किया था. उन्होंने कहा था, ‘भारत सरकार ने 25 फरवरी, 2002 को साफ कर दिया था कि वैधानिक प्राप्तकर्ता होने के नाते वह अयोध्या में विवादित जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने के लिए बाध्य है.’ वहीं, अटॉर्नी जनरल के बयान को लेकर पूर्व प्रधानमंत्री ने सफाई में कहा था, ‘यह अटॉर्नी जनरल का संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कोर्ट द्वारा पूछे जाने पर कानून या कोर्ट के किसी फैसले की व्याख्या करें. प्रतीकात्मक पूजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट की ओर से पूछे जाने पर उन्होंने यही किया.’

वाजपेयी ने संसद को यह भी बताया कि 67 एकड़ वाली गैर-विवादित जमीन में से 42 एकड़ का ठेकेदार राम जन्मभूमि न्यास ही है, जिसके ट्रस्ट ने वहां पूजा की अनुमति मांगी थी. वाजपेयी ने कहा, ‘सरकार इस मामले में कोई फैसला करती, उससे पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई. (इसलिए) सरकार में राय बनी कि उसका फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक लिया जाएगा.’