अभी इसी 28 जनवरी की बात है. मध्य प्रदेश कांग्रेस के कार्यालय में आगामी लोक सभा चुनाव की तैयारियों के लिहाज़ से पिछड़ा वर्ग सम्मेलन आयोजित किया गया था. यानी मक़सद सही था. लेकिन इसी बैठक से जनता के सामने संकेत उल्टा चला गया. दरअसल हुआ यूं कि बैठक के दौरान ही बात करते-करते पार्टी के प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया अचानक रो पड़े. वे कहने लगे, ‘प्रदेश में एक साल तक मैं अपमान सहता रहा. मेरे साथ मारपीट और गुंडागर्दी तक की गई. भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए. इसीलिए अब मैं सभी ज़िम्मेदारियां छोड़कर गुजरात लौटना चाहता हूं. इसके लिए विधानसभा चुनाव के बाद ही मैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को चिट्‌ठी लिख चुका हूं. लेकिन उन्होंने लोक सभा चुनाव तक यहीं (मध्य प्रदेश) ज़िम्मेदारी संभालने को कहा है.’

ऐसा ही इससे एक हफ़्ते पहले का वाक़या. प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने दो नज़दीकी कार्यकर्ताओं के घर उनके परिजनों के निधन पर शोक जताने के लिए भोपाल आए थे. लेकिन इन कार्यक्रमों से फुर्सत होने के बाद वे अचानक भारतीय जनता पार्टी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिलने उनके घर पहुंच गए. मक़सद अच्छा ही था. बीते विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों ने एक-दूसरे को निशाने पर ले रखा था. सो, आपसी कड़वाहट दूर करनी थी. बंद कमरे में करीब 40 मिनट की गुफ़्तगू से शायद इसकी कोशिश भी हुई.

बाद में दोनों नेताओं ने मीडिया से बातचीत में इसे ‘सौजन्य भेंट’ ही बताया. लेकिन जनता के लिए संदेश यहां भी उल्टा चला गया. और अब कहा जा रहा है कि प्रदेश कांग्रेस के संगठन और सरकार में कमलनाथ व दिग्विजय सिंह की जोड़ी के बढ़ते असर से असहज चल रहे सिंधिया ने काफी सोच-समझकर यह कदम उठाया है. इसके असर आगे दिख सकते हैं.

इन दो उदाहरणों के अलावा और भी तमाम मामले हैं, जिनमें काफी-कुछ ऐसा ही हो रहा है. फिर चाहे बात कानून-व्यवस्था की हो या किसान कर्ज़ माफ़ी की. पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति प्रदेश के नए-नवेले मंत्रियों के रवैये की शिकायतें हों या कुछ मंत्रियों की सार्वजनिक छवि का मामला. और वक़्त-बेवक़्त बिजली कटौती भी. सब चीजें मिलकर कांग्रेस सरकार के लिए लोक सभा चुनाव के पहले छवि का संकट बढ़ाती जा रही हैं.

कानून-व्यवस्था और अवैध खनन, जिसकी वज़ह से पुलिस महानिदेशक को बदलना पड़ा

कमलनाथ ने जब मुख्यमंत्री का पद संभाला था तब उन्होंने दो बातें साफ कहीं थीं. पहली- पुलिस महानिदेशक या उनके जैसे अन्य शीर्ष अफसरों को सामान्य परिस्थिति में बदला नहीं जाएगा. संभवत: इसीलिए उन्होंने सरकार की कमान संभालने के बाद राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव बीपी सिंह को बदला नहीं बल्कि उन्हें 31 दिसंबर 2018 तक कार्यकाल पूरा करने दिया. यहां तक कि फिर कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें राज्य निर्वाचन आयुक्त भी बना दिया.

राज्य के पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला के बारे में भी आम राय यही थी कि उन्हें कम से लोक सभा चुनाव तक तो इस पद रखा ही जा सकता है. लेकिन बीती 31 जनवरी को उन्हें हटा दिया गया. वजह? मंदसौर, रतलाम और बड़वानी में भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े तीन नेताओं की हत्याएं. हालांकि ये हत्याएं आपसी रंज़िश का नतीज़ा बताई जा रही हैं. लेकिन इन्हें आधार बनाकर भाजपा ने राज्य में कानून-व्यवस्था बिगड़ने का माहौल बनाना शुरू कर दिया था. लिहाज़ा शुक्ला को विदा कर दिया गया. उनकी जगह वीके सिंह को पुलिस महानिदेशक बनाया गया. यानी ‘छवि के संकट’ से निपटने के लिए ही संभवत: मुख्यमंत्री कमलनाथ ने यह बदलाव किया. अब यह बात दीगर है कि राज्य के पुलिस महानिदेशक के पद से विदाई के महज़ तीन दिन बाद ही ऋषि कुमार शुक्ला को सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) की कमान मिल चुकी है.

यही हाल अवैध खनन के मामले का है. विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इस मसले को भाजपा की शिवराज सिंह चौहान सरकार के ख़िलाफ़ जोर-शोर से उठाया था. साथ ही जनता से वादा भी किया था कि उसकी सरकार बनी तो अवैध खनन (ख़ास तौर पर रेत) करने वालाें पर सख़्त कार्रवाई की जाएगी. लेकिन अब तक ऐसा कुछ हो नहीं पाया है. इसका नतीज़ा ये हो रहा है कि अब भाजपा के साथ-साथ मेधा पाटकर जैसे सामाजिक कार्यकर्ता भी सरकार पर सवाल उठा रहे हैं. बल्कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने तो यहां तक आरोप लगा दिया है कि कांग्रेस के नेताओं के संरक्षण में ‘संरक्षित स्थलों से अवैध खनन किया जा रहा है.’

किसानों की कर्ज़ माफ़ी लोक सभा चुनाव से पहले हो पाएगी या नहीं, कोई नहीं जानता

विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने वादा किया था कि सरकार बनने के बाद 10 दिन के भीतर किसानों का दो लाख रुपए तक कर्ज़ माफ़ कर दिया जाएगा. कमलनाथ ने मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद इसके आदेश पर दस्तख़त भी दो घंटे के भीतर ही कर दिए. लेकिन कर्ज़ माफ़ी अब तक हुई नहीं है. उल्टा इसमें गड़बड़ियां ही सामने आ रही हैं. मसलन- भाेपाल और उसके नज़दीकी बैरसिया कस्बे में कर्ज़ माफ़ी की जो सूचियां चस्पा हुई हैं उनमें किसी किसान के ख़ाते में पुराने कर्ज़ के 22 तो किसी के में 67 या दो-ढाई सौ रुपए बकाया दिख रहे हैं. यानी उनका इतना ही कर्ज़ माफ़ हो रहा है. जबकि असल में संबंधित किसान दो लाख रुपए या उससे ज़्यादा के कर्ज़दार अब भी हैं.

स्थानीय अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों की मानें तो राज्य सरकार ने फिलहाल किसान कर्ज़ माफ़ी के लिए 5,000 करोड़ रुपए के अनुपूरक बजट का बंदोबस्त किया है. कोशिश ये है कि 22 फरवरी से किसानों के ख़ातों में पैसा पहुंचने लगे. लेकिन इस पर संशय के बादल हैं. इसकी पहली वज़ह तो यही है कि राज्य का ख़जाना खाली है. सरकार पर पौने दाे लाख करोड़ रुपए से ज़्यादा का कर्ज़ है. तिस पर लगभग आठ लाख किसानों का कर्ज़ माफ़ करने के लिए सरकार को 54,000 कराेड़ रुपए का इंतज़ाम करना होगा.

और इस सबके बीच बड़ी बात ये कि मार्च के पहले या दूसरे सप्ताह में लोक सभा चुनाव की आचार संहिता लगने की संभावना है. सो उस वक़्त किसानों के ख़ातों में राशि जमा नहीं कराई जा सकेगी. इसे आचार संहिता का उल्लंघन माना जा सकता है. संभवत: इसीलिए मुख्यमंत्री कमलनाथ अब इस मुद्दे काे उलटाने की कोशिश करते दिख रहे हैं. उन्होंने हाल ही में मीडिया से बातचीत में कहा है कि राज्य के किसानों काे कर्ज़ बांटने में भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान 3,000 करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है. सरकार इसकी जांच करा रही है. इस मसले को जनता के सामने भी ले जाया जाएगा.

बिजली कटौती और बिल से अब तक ‘झटका’ ही लग रहा है

विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का एक वचन बिजली बिल को आधा करने का भी था. लेकिन फिलहाल बिल आधा करने की बात तो दूर बिजली की दरें बढ़ाने की तैयारी की जा रही है. राज्य की ऊर्जा प्रबंधन कंपनी के महाप्रबंधक संजय शुक्ल ‘पत्रिका’ अख़बार से बातचीत में इसकी पुष्टि करते हैं. बताया जाता है कि बिजली की दरें औसतन 23 फ़ीसदी तक बढ़ाने की तैयारी है. इसके पीछे दलील ये है कि पिछले साल विधानसभा चुनाव की वज़ह से दरें नहीं बढ़ाई गई थीं. इसलिए अब यह ज़रूरी है.

हालांकि बहुत संभव है कि राज्य सरकार इसे मंज़ूरी न दे, फिर भी विपक्षी भाजपा लोक सभा चुनाव के लिहाज़ दो स्तरों पर बिजली का मुद्दा जनता के सामने रखने को तैयार है. पहला- कांग्रेस सरकार ने बिजली बिलों को आधा करने का वादा पूरा नहीं किया. दूसरा- बिजली की समय-असमय कटौती दिग्विजय सिंह सरकार के कार्यकाल की याद दिलाने लगी है. यहां तक कि राज्य मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान मंत्री तक बिजली कटौती पर चिंता जता चुके हैं. इसीलिए ऊर्जा मंत्री प्रियव्रत सिंह अब ऐसा बंदोबस्त कर रहे हैं कि सारे मंत्रियों और विधायकों के मोबाइल पर उनके क्षेत्र में हो रही बिजली कटौती की स्थिति अपडेट होती रहे.

राज्य के मंत्रियों का हिसाब-किताब अभी से सवालिया घेरे में

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बने अभी दो महीने भी पूरे नहीं हुए हैं और राज्य के मंत्रियों का हिसाब-किताब, आचार-व्यवहार सवालों के दायरे में आने लगा है. सवाल उठाने वाले भी कोई दूसरे नहीं बल्कि कांग्रेस के ही लोग हैं. बीती 27 जनवरी को लोक सभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बैठक हुई थी. इसमें मुख्यमंत्री कमलनाथ भी थे. सूत्रों के हवाले से आई ख़बरों की मानें तो इसमें प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया ने साफ कहा, ‘मंत्री पार्टी कार्यकर्ताओं को तवज्ज़ो नहीं दे रहे हैं. बल्कि वे तो भाजपा नेताओं को अपनी गाड़ियों में बिठाकर घुमा रहे हैं.’ बताया जाता है कि इस बात पर मुख्यमंत्री ने भी एक तरह से मुहर लगाई. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा, ‘मैंने आज ही बाला बच्चन को फोन लगाकर कहा है कि मैं रिपोर्ट लिखवाने वाला हूं- मेरा गृह मंत्री ही लापता है.’

ऐसे ही कृषि मंत्री सचिन यादव ने मुख्यमंत्री से मशविरा किए बिना ही ‘भावांतर योजना’ को बंद करने की घोषणा कर दी. बाद में कमलनाथ को स्पष्टीकरण देना पड़ा कि भावांतर योजना बंद नहीं की जाएगी बल्कि इसे नए स्वरूप में लाया जाएगा. इसके लिए उन्होंने दावोस से फोन पर सचिन यादव से बात की. वे वहां वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम की बैठक में हिस्सा ले गए थे.

इसी दौरान 26 जनवरी को ग्वालियर में महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी मुख्यमंत्री का लिखित संदेश नहीं पढ़ पाईं. इससे उनकी शैक्षणिक योग्यता तो क्या बल्कि साक्षरता पर ही सवाल उठने लगे. वहीं लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री सुखदेव पांसे के ख़िलाफ़ जबलपुर हाई कोर्ट ने मुलताई के पारधी दंपती हत्याकांड में मामला चलाने की इजाज़त दे दी. इससे भी सरकार को असहज स्थितियों का सामना करना पड़ा. और फिर इस सब से ऊपर जनवरी के महीने में ही जब पता चला कि मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने सरकारी आवास का आमूलचूल नवीनीकरण कराने की तैयारी में हैं तो आम जनता में संदेश-संकेत सब उल्टे ही जाने थे, जो गए भी.

सो इस तरह जब पूरे देश में एक-दूसरे के बारे धारणा बनाने-बिगाड़ने की राजनीतिक परंपरा परवान चढ़ रही हो, तब मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ख़ुद ही अपने लिए यह काम करती नज़र आ रही है. उसमें भी धारणा बिगाड़ने की स्थितियां ज़्यादा बन रही हैं.