चीन की दिग्गज टेलीकॉम कंपनी ह्वावे ने कहा है कि अमेरिका, भारत में भी उसके रास्ते में अड़ंगे लगा रहा है. कंपनी के चेयरमैन गुओ पिंग के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन पूरी कोशिश कर रहा है कि 5जी नेटवर्क से जुड़ी ह्वावे के उपकरणों की बिक्री भारत में रोकी जाए. गुओ पिंग के मुताबिक इसके लिए अमेरिकी अधिकारी भारत भेजे जा रहे हैं जो सरकार और कॉरपोरेट कंपनियों के लोगों से मिलकर उन्हें ह्वावे के खिलाफ कर रहे हैं.

अमेरिका ने बीते कुछ समय से ह्वावे के खिलाफ पूरी तरह से मोर्चा खोला हुआ है. हाल में उसने इस कंपनी के खिलाफ दो बड़े कदम उठाये हैं. अमेरिका के न्याय विभाग ने इस चीनी कंपनी पर धोखाधड़ी, जासूसी और बौद्धिक संपदा की चोरी के आरोप में 13 मामले दर्ज किए हैं. न्याय विभाग ने कंपनी की मुख्य वित्तीय अधिकारी मेंग वानझोऊ पर अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ जाकर ईरान की मदद करने के लिए आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया है. मेंग ह्वावे के संस्थापक रेन झेंगफेई की बेटी हैं. चीनी कंपनी पर कार्रवाई के बाद इस मामले में अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों से ह्वावे के उपकरणों, वायरलेस और इंटरनेट नेटवर्क पर प्रतिबंध लगाने को भी कहा है. यूरोपीय मीडिया के मुताबिक इसके बाद से इन देशों ने भी चीनी कंपनी पर लगाम लगाने की तैयारी शुरू कर दी है.

अमेरिका का इस तरह किसी एक कंपनी के खिलाफ हो जाना काफी चौंकाने वाला है. उसके इस कदम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिसके चलते अमेरिका ने दुनियाभर में इस चीनी कंपनी की सेवाओं पर रोक लगाने की मुहिम छेड़ दी है. जानकार इसकी कई वजह बताते हैं.

इनके मुताबिक इसकी पहली सबसे बड़ी वजह चीनी सरकार का वह नियम है जिसके तहत वहां की कोई भी कंपनी पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं है. चीनी सरकार के पास यह अधिकार है कि वह कभी भी अपने देश की किसी भी कंपनी से खुफिया जानकारी साझा करने या इकट्ठा करने के लिए कह सकती है. अन्य चीनी कंपनियों की तुलना में ह्वावे को वहां की सरकार और सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी का काफी करीबी माना जाता है. इस करीबी की वजह कंपनी के मालिक रेन झेंगफेई हैं, जो कभी चीन की सेना में उच्च पद पर तकनीक विशेषज्ञ थे. माना तो यह भी जाता है कि ह्वावे को खड़ा करने में कम्युनिस्ट पार्टी ने झेंगफेई की भरपूर मदद की थी.

बीते महीने ईरान मामले में अमेरिका के कहने पर कनाडा में मेंग वानझोऊ को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि अब उन्हें जमानत मिल गई है | फोटो : एएफपी
बीते महीने ईरान मामले में अमेरिका के कहने पर कनाडा में मेंग वानझोऊ को गिरफ्तार किया गया था, हालांकि अब उन्हें जमानत मिल गई है | फोटो : एएफपी

अमेरिका द्वारा ह्वावे के खिलाफ मोर्चा खोलने की एक वजह कंपनी का दागी इतिहास भी है. 2003 में टेलीकॉम उपकरण बनाने वाली कंपनी सिस्को सहित कई अमेरिकी कंपनियों ने ह्वावे पर अपनी बौद्धिक संपदा चुराने के आरोप लगाये थे. 2014 में अमेरिका की प्रमुख टेलीकॉम कंपनी टी-मोबाइल ने भी ह्वावे पर ऐसी ही सूचनाएं चुराने का आरोप लगाकर खलबली मचा दी थी. ऐसे ही कई आरोपों के बाद ह्वावे पर कार्रवाई के मकसद से बीते साल अमेरिकी संसद ने एक कानून बनाया. इस कानून के जरिए अमेरिका की सरकारी एजेंसियों को चीनी कंपनियों की सेवा लेने और उनके उपकरण इस्तेमाल करने से प्रतिबंधित किया गया है. इस कानून से संबंधित दस्तावेजों में कई जगहों पर ह्वावे का स्पष्ट जिक्र है.

अमेरिका में चीनी कंपनी पर हुई इस कार्रवाई के बाद ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड सहित कई देशों ने अपने यहां ह्वावे के खिलाफ जांच शुरू की. बताते हैं कि जांच दौरान उसके उपकरणों में ऐसी डिवाइस या तकनीक पायी गईं, जिनके चलते बड़ी सरकारी जानकारियों में सेंधमारी की जा सकती थी. बीते साल ब्रिटेन में भारी विरोध के बाद ह्वावे ने अपनी तकनीक को दुरुस्त करने के लिए दो बिलियन डॉलर (करीब 14 हजार करोड़ रुपए) खर्च करने की बात कही है.

जानकारों की मानें तो इस समय इस मामले के जोर पकड़ने की वजह एक और भी है. दरअसल, इस समय दुनियाभर की टेलीकॉम कंपनियां 5जी नेटवर्क स्थापित करने की तैयारी में लगी हैं और इस क्षेत्र में तकनीकी रूप से ह्वावे सबसे आगे है. अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश ह्वावे को 5जी नेटवर्क प्रणाली से दूर रखना चाहते हैं. बीते महीने फ़्रांस, अमेरिका और अन्य कई यूरोपीय देशों ने एक बयान जारी किया था जिसमें कहा गया था कि 5जी नेटवर्क स्थापित करने में ह्वावे की मदद लेने से बचा जाए. तब इन देशों ने दावा किया था कि किसी भी देश के नेटवर्क से ह्वावे के जुड़ने के बाद चीन को दूसरे देशों की सरकारों पर नजर रखने का रास्ता मिल जाएगा.