मोदी सरकार का अंतरिम बजट चुनावी होने वाला है, इसमें दो राय नहीं थी. किसी भी सरकार का आखिरी बजट आर्थिक से ज्यादा राजनीतिक होता ही है. प्रभारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल का बजट भाषण उम्मीद के मुताबिक ही तमाम लोकलुभावन घोषणाओं से भरा रहा. बजट से पहले ही अनुमान लगाया जा रहा था कि सरकार ग्रामीण और कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी घोषणायें करने जा रही हैं. आर्थिक जानकार मान रहे थे कि सरकार किसानों और मध्यम वर्ग को लुभाएगी. बस देखना यह था कि इसके लिए सरकारी खजाने का मुंह कितना खोला जाएगा.

अब, बजट की सबसे बड़ी बातें - पहली, आयकर दायरे को 2.5 लाख से बढ़ाकर 5 लाख करना, और दूसरी दो हेक्टेयर जमीन तक वाले किसानों को सलाना छह हजार रुपये नगद देना.

दो हेक्टेयर से कम जमीन वालों को सरकार ने सलाना छह हजार रुपये की सीधी वित्तीय मदद की घोषणा की है जो उन्हें तीन किश्तों में दी जाएगी. वित्त मंत्री ने इस योजना को ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि’ का नाम दिया है. इस योजना के तहत सरकारी खजाने पर करीब 75000 करोड़ का भार आएगा. आर्थिक जानकारों का मानना है कि सरकार की नगद पैसे देने की यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में खपत तो बढ़ा सकती है, लेकिन इसका चुनावी लाभ कितना मिलेगा, नहीं कहा जा सकता है.

अगर योजना के तहत मिलने वाली रकम को प्रतिमाह के हिसाब से देखा जाए तो यह पांच सौ रुपये प्रति माह होगी. आर्थिक और राजनीतिक जानकारों के एक खेमे का मानना है कि दो हेक्टेयर के किसान के लिए यह रकम इतनी आकर्षित करने वाली भी नहीं मानी जा सकती है. इसलिए चुनावी तोहफे के रुप में यह कितनी असरदार होगी यह तो वक्त बताएगा.

बजट के आने से पहले जानकार मान रहे थे कि मोदी सरकार कृषि क्षेत्र के लिए इससे भी बड़ी घोषणा कर सकती है. चर्चा थी कि सरकार किसान कर्ज माफी या किसी अन्य बहाने से कृषि क्षेत्र को सीधे लाभ की कोई ऐसी सौगात दे सकती है जिस पर 1.5 से दो लाख करोड़ रुपये तक का खर्च आएगा. यानी कि कृषि क्षेत्र में मोदी सरकार ने जो सौगात दी है वह कुछ लोगों के अनुमान से काफी कम या आधी कही जा सकती है. ऊपर से दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानों को सालाना छह हजार की रकम भूमिहीन और बंटाईदार किसानों को भी नहीं मिलेगी जो बतौर वोटर एक बड़ी संख्या हैं. ऐसे में इसका कोई बहुत चुनावी लाभ मिलेगा, कहना मुश्किल है.

बजट के लोकलुभावन कदमों में सबसे अपेक्षित जो कदम रहा है वह आयकर छूट की सीमा को पांच लाख तक बढ़ाना कहा जा सकता है. यह मध्यम वर्ग और वेतनभोगियों को खुश करने वाला कदम है. लेकिन इस वर्ग के एक बड़े हिस्से को पहले से ही भाजपा का समर्थक माना जाता है. कहा जा सकता है कि सरकार ने इस वर्ग की नाराजगी को कम करने के लिए यह कदम उठाया है. यह घोषणा भाजपा के अपने जनाधार को पुख्ता करने की कोशिश है, लेकिन इससे नए वोटरों की तादाद बढ़ेगी, ऐसा नहीं लगता.

इन दोनों घोषणाओं के अलावा असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए मोदी सरकार ने पेंशन योजना की शुरुआत भी की है. इसके तहत उन्हें 3000 की मासिक पेंशन मिलेगी. पक्के तौर पर सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से यह बड़ी स्कीम है. लेकिन एक तो यह साठ साल के बाद मिलेगी. और यह वेतनभोगियोंं के लिए कुछ-कुछ नेशनल पेंशन स्कीम जैसी ही है. लोगों को इसमेंं पहले योगदान करना होगा और फिर उसे पेंशन मिलेगी.

सरकार के दावे के मुताबिक, इससे दस करोड़ कामगार फायदा पायेंगे. आर्थिक जानकार मानते हैं कि इस तरह की पेंशन स्कीम के सफलतापूर्वक चलने और उसकी चुनावी सफलता के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है. राजनीतिक नब्ज जानने वाले भी मानते हैं कि तत्काल नगदी देनी वाली सामाजिक सुरक्षा की योजनायें जनता को अधिक लुभाती हैं. ऐसे में चुनावी साल में इस वादे पर जनता-जनार्दन का भरोसा कितना होता है, यह तो वक्त ही बताएगा.

इसके अलावा इस बजट से पहले यूनिवर्सल बेसिक इनकम या मिनिमम इनकम गारंटी जैसी योजना की भी बहुत चर्चा थी. आर्थिक विशेषज्ञ भी इस बात की पैरवी कर रहे थे कि तमाम सब्सिडी के बजाय जरुरतमंदों को सीधे एक निश्चित आय हर महीने दे दी जाए. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले यह घोषणा की थी कि अगर उनकी सरकार आई तो वे मिनिमम इनकम गारंटी योजना लागू करेंगे. इसे तब इस रुप में देखा गया कि मोदी सरकार अंतरिम बजट में इस तरह की किसी बड़ी योजना की घोषणा कर सकती है. इसलिए कांग्रेस पहले ही इसकी काट में ऐसा बयान दे रही है.

लेकिन अगर अंतरिम बजट की घोषणाओं को देखें तो किसानों को सालाना छह हजार रुपये देने को इसका एक रुप कहा जा सकता है. लेकिन यह घोषणा अपने दायरे में इतनी बड़ी नहीं है कि इसकी तुलना मिनिमम इनकम गारंटी से की जा सके. किसान सम्मान निधि को तेलंगाना में लागू रायथू बंधु योजना का एक रुपांतरण कहा जा सकता है. इसे टीआरएस सरकार ने चुनाव से काफी पहले लागू कर दिया था जिसका उसे चुनावी लाभ भी मिला. लेकिन ठीक चुनाव से पहले लागू की जा रही मोदी सरकार की किसान निधि योजना लोगों को क्या वैसे ही लुभा पाएगी!

एक करोड़ रुपये तक के लघु और मध्यम कारोबारियों को कर्ज में दो फीसदी छूट की भी घोषणा वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में की है. यह भी भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक को साधने की दिशा में एक और कदम है. बजट से पहले माना यह भी जा रहा था कि निम्न मध्यम वर्ग के लिए आवासीय क्षेत्र में कोई बड़ी घोषणा की जा सकती है या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत उसी कीमत में क्षेत्रफल बढ़ाने की घोषणा की जा सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

इनके अलावा बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कुछ प्रतीकात्मक बातों पर भी जोर दिया. जैसे रक्षा क्षेत्र के बजट पर बोलने में उन्होंने खासा वक्त खर्च किया और वन रैंक, वन पेंशन को सरकार की उपलब्धि बताया. नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ लड़ाई के रुप में पेश किया और बार-बार दोहराई जाने वाली यह बात कही कि इससे आयकर रिटर्न बढ़ने वालों में इजाफा हुआ है. बातें पुरानी थीं, लेकिन इस ‘आर्थिक राष्टवाद’ से मध्यम वर्ग का एक तबका प्रभावित होता ही है. बजट में रेलवे को 64000 करोड़ रुपये दिए जाने की घोषणा हुई है, लेकिन रेल सुधार पर कोई खास चर्चा नहीं की गई.

इस अंतरिम बजट में सरकार ने राजकोषीय घाटा बढ़ने की बात मानी, लेकिन उसे कम करने का संकल्प भी दोहराया. अगर शेयर बाजार की प्रतिक्रिया पर गौर करें तो निफ्टी और सेंसेक्स शुरुआती हिचकिचाहट के बाद उछले. आर्थिक जानकार मानते हैं कि इसकी वजह यह भी हो सकती है कि बाजार इस बात से तसल्ली में है कि बजट लोक-लुभावन तो है लेकिन यह पूरी तरह चुनावी घोषणा-पत्र भी नहीं है.