मालदा पश्चिम बंगाल का एक जिला है, इस तथ्य से ज्यादा लोग यह बात जानते होंगे कि मालदा आम की एक स्वादिष्ट किस्म है. इस इलाके के नाम पर ही अपना नाम पाने वाले मालदा की महक देश-विदेश तक पहुंची है. यहां हर साल सात लाख मीट्रिक टन तक आम पैदा होता है. मालदा के साथ हिमसागर और लखनभोग जैसी दूसरी किस्में भी उगाई जाती हैं. लेकिन, अब पश्चिम बंगाल की एक अन्य पहचान माछ यानी मछली ही अब मालदा की इस मुख्य पहचान के लिए संकट बनती दिख रही है.

हम मालदा जिला मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर गौड़ में हैं. अपने बगीचों के लिए मशहूर इस जगह में आम के पेड़ों पर मंजरी या बौर तो दिखते हैं, लेकिन कई कटे पेड़ों की लकड़ियों के ढेर भी नजर आते हैं. पेड़ों की कटाई अब भी जारी है.

सभी तस्वीरें : हेमंत कुमार पाण्डेय
सभी तस्वीरें : हेमंत कुमार पाण्डेय

‘आम के बगान से अब फायदा कम हो गया है, इसलिए बगान हटा (काट) रहा है. अब माछ में अधिक फायदा होता है. यहां पर पेड़ काटकर अब पोखर बनेगा.’, पेड़ कटाई के काम में लगे शंभू बताते हैं. जमीन मालिक की ओर से उन्हें और उनके साथ पेड़ काटने में लगे अन्य मजदूरों को रोजाना 450 रुपये और एक वक्त का खाना मिलता है. पीछे मुड़कर हाथ से बगीचे की तरफ इशारा करते हुए शंभू आगे कहते हैं, ‘बीते एक हफ्ते से यहां काम कर रहे हैं. पूरे बगान के पेड़ को काटने में महीनेभर का वक्त लग जाएगा.’

शंभू की बातों की पुष्टि मीडिया रिपोर्टों से भी होती है. बीते साल जुलाई में प्रकाशित द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक मालदा के आम बागान मालिकों को दो रुपये प्रति किलो की दर से इस फल को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा था. उनका कहना है कि इसके उत्पादन में जितनी लागत आई थी, उसकी एक-तिहाई की भी वसूली नहीं हो पाई. इससे नाराज बगान मालिकों ने सड़क पर आम फेंककर अपनी नाराजगी भी जाहिर की थी.

बगीचों की जगह बन रहे तालाबों को मछली पालने के लिए लेता कौन है? इस पर शंभू के साथ काम कर रहे एक अन्य मजदूर का जवाब आता है, ‘पोखर लेने के लिए तो लोगों का लाइन लगा रहता है. माछ पालने में बहुत फायदा है न इसलिए.’

इस बगान में आने से पहले हमारी मुलाकात मछली कारोबारी हुसैन से हमारी मुलाकात हुई थी. उनका कहना था, ‘मछली बेचने के लिए कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता. बिहार से लेकर झारखंड तक के कारोबारी इसे खरीदने तालाब के पास ही आते हैं.’ हुसैन के साथ मछली पालन करने वाले दूसरे कारोबारियों की मानें तो एक किलो मछली की कीमत करीब 150 रु मिल जाती है. मांग भी हमेशा बनी रहती है. बीते अगस्त में मत्स्यपालन मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने चालू वित्तीय वर्ष में मछलियों के उत्पादन में छह फीसदी बढ़ोतरी की उम्मीद जाहिर की थी.

तालाब की मछलियों को पक्षियों से बचाने के लिए इसके ऊपर पतले-पतले धागे लगाए गए हैं
तालाब की मछलियों को पक्षियों से बचाने के लिए इसके ऊपर पतले-पतले धागे लगाए गए हैं

वहीं, बीती एक फरवरी को पेश अंतरिम बजट में केंद्र सरकार ने मछुआरों के लिए विशेष सुविधाओं का एलान किया है. साथ ही, उसने कृषि मंत्रालय से अलग मत्स्य पालन विभाग बनाने की बात कही है. केंद्र ने कहा है कि मछुआरों को भी किसानों की तरह क्रेडिट कार्ड पर रियायती दर से कर्ज उपलब्ध करवाया जाएगा.

बाजार और सरकार की उपेक्षा के साथ-साथ कुदरत भी आम के साथ अन्याय करती हुई दिखती है. इस उजड़ते हुए बागान में अपने मवेशियों के लिए चारे का इंतजाम करने पहुंचे शेख मोहम्मद अब्दुल बताते हैं, ‘आम के सीजन में ओला पड़ने की वजह से काफी नुकसान होता है. बीते साल तो आम बहुत कम हुआ था.’ इसके अलावा अधिक ठंड और कुहरे की वजह से आम की मंजरी या बौर में फफूंद लगने की आशंका बढ़ जाती है. बीते साल निपाह वायरस भी आम की फसल पर कहर बनकर टूटा था. मई में निपाह के मामले सामने आने के बाद किसानों ने इसकी वजह से हड़बड़ाहट में आमों को कम कीमत पर वक्त से पहले ही बेचना शुरु कर दिया था. उस वक्त लोगों के बीच यह बात फैली थी कि निपाह वायरस फलों के जरिए फैलता है. इस वजह से केरल, जहां सबसे पहले इसके मामले सामने आए थे, के केला किसानों को भी काफी नुकसान उठाना पड़ा था.

कटता हुआ पेड़ और इसके पीछे बगान जिसे महीने भर में खत्म होना है
कटता हुआ पेड़ और इसके पीछे बगान जिसे महीने भर में खत्म होना है

मालदा में आम के बगानों के सिकुड़ने और उनकी जगह तालाबों के विस्तार को करीब से महसूस किया जा सकता है. हर 500 मीटर के दायरे में दो या इससे अधिक तालाब दिख जाते हैं. इन्हें खेती योग्य जमीन या फिर आम बगान को खत्म करके बनाया जा रहा है. स्थानीय लोगों से बातचीत के दौरान आम के बगान खत्म होने को लेकर लोगों के माथे पर कोई शिकन तो दिखाई नहीं देती है. लेकिन जानकारों की मानें तो बगानों का सिकुड़ना ऐसे ही जारी रहा तो मालदा का आम जल्द ही बीते वक्त की बात हो सकता है.