गणित के विद्यार्थी इसे बख़ूबी समझेंगे. अंतर कलन (डिफरेंशियल कैलकुलस) में एक बिंदु होता है जिसे पॉइंट ऑफ़ इन्फ्लेक्शन कहा जाता है. आसान शब्दों में यह वह बिंदु होता है जहां से कोई वक्र उत्तल से अवतल या अवतल से उत्तल हो जाता है. पिछली सदी के भारतीय इतिहास में चार मोड़ हैं जिन्हें पॉइंट ऑफ़ इन्फ्लेक्शन कह सकते हैं - 1947, 1948, 1950 और 1991. साल 1991 के पॉइंट ऑफ़ इन्फ्लेक्शन के बाद उत्तल (संकुचित) भारतीय अर्थव्यवस्था अवतल (विशाल) होने की दिशा में अग्रसर हो गई. संविधान की प्रस्तावना में निहित लफ्ज़ ‘समाजवाद’ के माने जैसे ख़त्म हो गए. अर्थव्यवस्था के दरवाज़े खुल गए. पतझड़ में पेड़ों से गिरते पत्तों की मानिंद विदेशी निवेश भारतीय आर्थिक तंत्र में बरसने लगा. लाखों-लाख नौकरियों का सृजन हुआ जिसने मध्य वर्ग यानी मिडिल क्लास को उभारा.

और ऐसा भी हुआ कि सर्वशक्तिमान अर्थ (पैसा), जिसे समाज के अंतर को पाटना था, उसने यह अंतर और बढ़ा दिया. क्रोनी कैपिटलिज्म यानी राजनीतिक साठ-गांठ से चलने वाले पूंजीवाद का क्रूरतम रूप देखने में आया. और भ्रष्टाचार...उसकी बात ही क्या करें! आइये, आज साल 1991 की बात करते हैं.

राजनीतिक हालात : जीतेंगे सब, हारेंगे आप

उस साल मई में चुनाव थे. चुनाव प्रचार के दौरान ही राजीव गांधी की हत्या हो गई. कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर चली. उसे 244 सीटें मिलीं. कुछ निर्दलीय सांसदों और झारखंड मुक्ति मोर्चा की मदद से पार्टी ने सरकार बनाई. कांग्रेस ने सर्वसम्मति से पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री चुना और उन्होंने रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री. राजीव गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान बड़े-बड़े आर्थिक वादे किये थे. प्रधानमंत्री राव ने बड़ी होशियारी से मनमोहन सिंह को आगे करते हुए कहा कि वे खेलें, जीतें तो सेहरा सबके सिर बंधेगा और हारे तो ठीकरा उनके सिर फोड़ा जाएगा. हां, नरसिम्हा राव ने उन्हें खुलकर खेलने की आज़ादी दी.

आर्थिक हालात- जादू की छड़ी

सभी जानते हैं कि साल 1991 में पेमेंट ऑफ़ क्राइसिस यानी भुगतान का संकट था. तेल ख़रीदने के लिए सिर्फ़ 21 दिनों का विदेशी मुद्रा भंडार रह गया था. रिज़र्व बैंक के मुखिया रह चुके मनमोहन सिंह इन हालात से नावाकिफ़ नहीं थे. अपनी पहली ही प्रेस कांफ्रेंस में यह कहकर, कि उनके पास ग़रीबी कम करने वाली किसी जादू की छड़ी नहीं है, उन्होंने अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी. मनमोहन ने मोंटेक सिंह अहलूवालिया को वित्त आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया और वे फ़ौरन से पेश्तर काम में जुट गए.

सिंह एंड कंपनी

मोंटेक सिंह अहलूवालिया के अलावा 1991 में जो हुआ, उसके पीछे कुछ और भी किरदार थे जैसे कि राकेश मोहन जो उद्योग मंत्रालय में मुख्य सलाहकार बने और दीपक नायर जो सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार. 1990 में जब पहली बार अशोक देसाई ने मंत्रालय को होने वाले पेमेंट ऑफ़ क्राइसिस से अवगत कराया तो कइयों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी. जाने-माने अर्थशास्त्री अशोक देसाई मुख्य वित्त मंत्रालय में बतौर कंसलटेंट अपनी सेवाएं दे रहे थे.

‘मनमोहन जी ने देश की इज़्ज़त बेच दी’

भुगतान संकट से जूझ रहे देश को बचाने का सिर्फ़ एक ही तरीका था - वह यह कि विदेशों से कुछ उधार मिले. पर जिस देश के पास सिर्फ़ 21 दिनों का मुद्रा भंडार हो, जहां की अर्थव्यवस्था लोहे के दरवाज़ों के भीतर कैद हो, वहां ऐसी कामना भी बेवकूफ़ी ही कहलाती. मनमोहन सिंह यह बात जानते थे. सो वे सीधे विश्व बैंक गए और भारतीय रिज़र्व बैंक का सोना गिरवी रखकर उधार ले आये. विश्व बैंक ने लोन देते वक़्त पूछा कि वे चुकाएंगे कैसे. मनमोहन सिंह ने कहा दरवाज़े खोल दिए हैं और विश्व बैंक को चलाने वाली वैश्विक कंपनियों को भारत आने का न्यौता दिया जाएगा.

बैंक ने बिना पलक झपकाए लोन दे दिया. डॉलर की गठरी लेकर मनमोहन सिंह भारत आये ही थे कि विपक्ष उन पर टूट पड़ा. इल्ज़ाम लगा कि वे सोना नहीं, देश की इज़्ज़त गिरवी रख आये हैं. मनमोहन सिंह को खेल का नियम याद था- ‘जीतेंगे सब, हारेंगे वे’. वे सिर झुकाए इल्ज़ाम सुनते रहे. प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सब देख रहे थे. वे जानते थे कि मनमोहन सिंह ही वह शख्स हैं जो इस समस्या से देश को बाहर निकाल सकते हैं. वे साए की तरह सिंह के साथ खड़े रहे.

चरमराती अर्थव्यवस्था के जंग खाए हुए किवाड़

इंस्पेक्टर राज, लाइसेंस राज, एमआरटीपी अधिनियम और समाजवादी आर्थिक मॉडल में उत्पादन की सांस घुटी रहती थी. उत्पादन का बाज़ार की मांग से कोई सरोकार नहीं था. सरकार तय करती थी कि किस उद्योग में कितना उत्पादन किया जाएगा. सीमेंट से लेकर स्कूटर उत्पादन तक हर क्षेत्र में सरकारी नियंत्रण था. उत्पादन के लिए लाइसेंस से लेकर ज़मीन अधिग्रहण और संयंत्र लगाने के लिए उद्योगपति को सैकड़ों लाइसेंस लेने होते थे. तिस पर लेबर कानून की अपनी दिक्कतें थीं, कामगारों की यूनियनें कारोबारियों की जान सांसत में डाले रखतीं. कुल मिलाकर ऐसा माहौल था कि उद्योग पनपते ही नहीं थे. जो थे, वे सिर्फ़ सरकारी और उनमें भ्रष्टाचार चरम पर.

ऐसे माहौल में सालाना प्रति व्यक्ति आय महज़ 11,535 रुपये थी, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) लगभग 11 लाख करोड़ रु. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश सिर्फ़ 13,00 करोड़ रु था और विदेशी मुद्रा भंडार 58,00 करोड़ रु. वहीं 18,000 करोड़ रुपये का निर्यात था और लगभग 24,000 करोड़ रुपये का आयात. सिंह एंड कंपनी को यह तस्वीर बदलनी थी.

विरोध और स्वागत

सबसे पहले रुपये का अवमूल्यन (डीवैल्यूएशन) किया गया. यानी डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा को कमज़ोर किया गया. कुछ अहम क्षेत्रों को छोड़कर बाकी सभी विदेशी निवेश के लिए खोल दिए गए. लाइसेंस और परमिट राज ख़त्म कर दिया गया. ब्याज दरें और इम्पोर्ट ड्यूटी कम की गई. विदेशी निवेश के खुलते ही तमाम वैश्विक कंपनियां 84 करोड़ जनता की ओर दौड़ पड़ीं. लगभग हर रोज़ किसी न किसी अखबार में इस जनसंख्या का गुणगान किया जाता. जो पहले अभिशाप थी, अब बतौर वरदान देखी जाने लगी. मिडिल क्लास को सबसे बड़ी ताक़त बताया जाने लगा. उत्पादन के घोड़ों की रास ढीली कर दी गयी, औद्योगिक उत्पाद दिनों-दिन बढ़ने लगा जिससे रोज़गार के अवसर पैदा होने लग गए और आर्थिक माहौल बदलने लग गया. बैंकों ने रीटेल सेक्टर में ब्याज दरें गिराकर आमजन को लोन मुहैया करवाए जिससे उपभोक्ता संस्कृति में उछाल आ गया.

कुछ उद्योग संगठनों ने विदेशी कंपनियों की आमद को देश की इंडस्ट्री के लिए ख़तरा बताया. कहा गया कि जिस तरह ईस्ट इंडिया कंपनी ने देश पर कब्ज़ा कर लिया था, वैसा ही दोबारा होने जा रहा है. एक तरफ़ राहुल बजाज जैसे उद्योगपति थे जिन्होंने उदारीकरण का स्वागत तो किया पर सरकार से कहा कि पहले देश के उद्योग को मज़बूत किया जाए ताकि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुक़ाबला कर सके. दूसरी तरफ़, जेआरडी टाटा ने इन सुधारों का स्वागत करते हुए कहा कि काश ये उनकी जवानी के दिनों में लागू किये जाते तो नजारा कुछ और ही होता.

1991 के सुधारों की शुरुआत ने मिडिल क्लास के दायरे को बढ़ाया है. ग़रीबी की रेखा दक्षिणोत्तर हुई है. 1991 में जो हुआ वह ऐतिहासिक था. दिवालिया होने जा रहे 84 करोड़ के देश को ‘एक्सीडेंटल फाइनेंस मिनिस्टर’ और उनके पथप्रदर्शक नरसिम्हा राव बचा लाए और उस रास्ते पर डाल दिया जहां से पीछे नहीं मुड़ा जा सकता. आज भारतीय अर्थव्यवस्था वह शेर बन गई है जिसने कई अर्थव्यवस्थाओं को पीछे धकेल दिया है. आने वाले प्रधानमंत्री इसकी सवारी तो कर सकते हैं, पर इसके साथ छेड़-छाड़ की कोशिश या इससे उतरने का प्रयास उन्हें भारी भी पड़ सकता है.

आधा शेर और एक्सीडेंटल फ़ाइनेंस मिनिस्टर

पिछले साल पीवी नरसिम्हा राव के जीवन पर एक किताब प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक है- ‘हाफ लायन-हाउ नरसिम्हा राव ट्रांसफॉर्म्ड इंडियन इकॉनमी’. उधर, मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री कार्यकाल पर हाल ही में
‘एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ नाम की एक फिल्म आई है. इस फिल्म पर सधा हुआ व्यंग कसते हुए मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा है कि वे ‘एक्सीडेंटल फाइनेंस मिनिस्टर’ भी थे. हक़ीक़त भी यही है. नरसिम्हा राव की पहली पसंद पूर्व आरबीआई गवर्नर आईजी पटेल थे.

‘हाफ़ लायन...’ में जिक्र है कि नरसिम्हा राव के जन्म या बरसी पर कांग्रेस सरकार कोई आयोजन नहीं करती. पार्टी ने अपने प्रधानमंत्री को बिलकुल भुला दिया है. कोई भी मंत्री उनकी समाधि पर नहीं जाता. मनमोहन सिंह ही अकेले राजनेता हैं जो इन मौकों पर वहां जाना नहीं छोड़ते. संस्कारशील शिष्य अपने गुरु को याद करना नहीं भूलता.