बीते गणतंत्र दिवस पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित फिल्म ‘मणिकर्णिका’ रिलीज हुई. मिली-जुली प्रतिक्रियाओं के बीच इसने अच्छा-खासा बिजनेस भी किया. इस फिल्म के बनने की शुरूआत से ही इसका नाता विवादों से जुड़ गया था. पहले फिल्म पर केतन मेहता के आइडिया को चुराने का इल्जाम लगा, फिर फिल्म के निर्देशक कृष और उनके बाद सोनू सूद के फिल्म छोड़ने की खबरें आईं. फिल्म के रिलीज होने के बाद भी विवाद ने ‘मणिकर्णिका’ और कंगना रनोट का साथ नहीं छोड़ा.

मणिकर्णिका की रिलीज से पहले जिस एक बात ने सबसे ज्यादा चर्चा बटोरी, वह थी, निर्देशक कृष जगलारमुड़ी के जाने के बाद कंगना रनोट का बतौर निर्देशक फिल्म की बागडोर संभालना. फिल्म की रिलीज के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता और दक्षिण भारतीय फिल्मों के जाने-माने नाम कृष का कहना था कि खुद को स्क्रीन पर ज्यादा देर तक दिखाने के लिए कंगना ने उनकी फिल्म हाइजैक कर ली. इसके अलावा उनकी शिकायत ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ और महत्वपूर्ण घटनाओं को नज़रअंदाज किए जाने की भी है.

कृष की बातों पर दो-तीन वजहों से विश्वास किया जा सकता है. पहली तो यह कि फिल्म के बारे में ज्यादातर समीक्षकों की राय भी यही है कि कि इसमें ऐतिहासिक तथ्यों की तोड़-मरोड़ की गई है. दूसरी फिल्म में कई दृष्यों का एक-दूसरे से जुड़ाव थोड़ा इस तरह का है मानो उनके बीच में कुछ और भी होना चाहिए था. इसके अलावा कृष से पहले सोनू सूद और बाद में मिष्ठी चक्रबर्ती भी मणिकर्णिका में अपनी भूमिकाओं से छेड़छाड़ किए जाने की बात कह चुके हैं.

यह मामला उठने पर इशारों-इशारों में हंसल मेहता ने भी यह कहा कि कंगना रनोट ने उनकी फिल्म ‘सिमरन’ के साथ भी ऐसा ही कुछ करने की कोशिश की थी. इस दौरान ‘सिमरन’ के लेखन क्रेडिट पर विवाद को लेकर चर्चा में आए लेखक अपूर्व असरानी ने भी दोबारा रनोट पर हमला करने का मौका नहीं छोड़ा. कंगना, जाहिर सी बात है, इन सभी बातों को बेबुनियाद बता रही हैं.

अब सवाल यह है कि कंगना रनोट की बातों को माना जाए या इतने सारे लोगों की, जिनमें फिल्म समीक्षक भी शामिल हैं. और फिर ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ तो मणिकर्णिका में साफ दिखती ही है. अगर कंगना ही सही नहीं बोल रही हैं तो फिर सवाल यह उठता है कि आखिर तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली, अपने दम पर अपना जमीन-आसमान बनाने वाली, आदित्य पंचोली और ऋतिक रोशन जैसे नामों से खुलकर पंगा लेने वाली एक अभिनेत्री इतना असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं कि अपने आप को ज्यादा और बड़ा दिखाने के लिए फिल्म, उसके बाकी कलाकार और इतिहास, सबके साथ खिलवाड़ करती है.

सोनू सूद के मणिकर्णिका छोड़ने पर कंगना रनोट का कहना था कि वे एक महिला के निर्देशन में काम नहीं करना चाहते थे. उनके बयान को सिर्फ इस एक तर्क से खारिज किया जा सकता है कि सोनू इसके पहले फराह खान के साथ ‘हैप्पी न्यू ईयर’ में काम कर चुके हैं. लेकिन अगर मान भी लिया जाए कि वे पुरुषवादी मानसिकता वाले हैं तो यह पहली बार नहीं है कि कंगना ने लड़की होने के चलते दुर्व्यवहार या भेदभाव किए जाने की शिकायत की है. वे अक्सर इस इल्जाम को दोहराती रहती हैं. ऐसे में एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वे अपने लड़की होने को ढाल की तरह इस्तेमाल करती हैं?

हालांकि जब खुद कुछ करने की बारी आती है तो कंगना अचानक किसी मुसीबत की मारी, अबला नारी सा व्यवहार करती भी नजर आती हैं. इसका उदाहरण मीटू कैंपेन के समय उनके द्वारा क्वीन के निर्देशक विकास बहल पर लगाया गया आरोप है. उस समय कंगना ने कहा था कि क्वीन की शूटिंग के दौरान बहल अक्सर उन्हें अपनी बाहों में जकड़कर उनके बालों को सूंघा करते थे. उस समय तक बॉलीवुड का चर्चित नाम बन चुकी कंगना की इतनी भी क्या मजबूरी रही होगी जो वे यह सब बरदाश्त करती रहीं! सिर्फ एक फिल्म के लिए उनके ऐसा घिनौना कृत्य सहन करने को क्या कहा जाए?

कुल मिलाकर ऐसा लगता है कि जैसे कंगना रनोट अपने लड़की, फेमिनिस्ट और बेबाक होने को अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकती हैं. और वे फिल्म उद्योग में एक के बाद एक पंगे भी उसी रफ्तार से ले सकती हैं जैसा कि एक समय अरविंद केजरीवाल के बारे में माना-कहा जाता था. वे तब किसी के ऊपर या सभी के ऊपर आरोप लगा सकते थे, खुद को ईमानदार और बाकी सभी को चोर बता सकते थे.