श्रीनगर एयरपोर्ट पर उतरते ही शायद आपकी पहली नज़र उन पोस्टर्स पर जाएगी जो गुज़रे ज़माने की बॉलीवुड फ़िल्मों का ज़िक्र करते हैं. वे फ़िल्में जो कश्मीर को पर्यटन और प्यार की सबसे अच्छी याद बनाने का सबसे बड़ा ज़रिया रहीं. बाहर निकलिए तो सीआरपीएफ़ की टुकड़ियों से गुज़रकर आप एक लंबी-चौड़ी सड़क पर होंगे जिसके दोनों तरफ़ बने आलीशान घर आपको यहां की रईसी और भव्यता का एहसास कराते हैं. लेकिन जैसे-जैसे आप असल शहर में दाख़िल होंगे, यह एहसास तारी होने लगेगा कि यहां मुश्किलों की कमी नहीं है.

यहां छोटी दुकानों की लंबी कतारें हैं और हर दुकानदार के हाव-भाव ऐसे हैं जैसे वह किसी भी समय सब-कुछ समेटकर घर जा सकता है. यहां की जिंदगी से राजनीति इस कदर जुड़ी हुई है कि लोग बंद, फ़ायरिंग और पत्थरबाज़ी के लिए हमेशा तैयार रहते हैं. हरेक के पास इंसाफ़ मांगने और विरोध करने की सैकड़ों वजहें हैं. लेकिन इस सबके बीच कुछ ऐसा भी हुआ है जिसने कश्मीर को नई ज़ुबान दी - फ़ुटबॉल की ज़ुबान.

शहर के बीचों-बीच टीआरसी टर्फ़ ग्राउंड पर इन दिनों रियल कश्मीर फ़ुटबॉल क्लब की जीत का शोर सुनाई देता है. कुछ लोग इसे स्पैनिश क्लब ‘रियाल मैड्रिड’ की तरह ‘रियाल कश्मीर’ भी कहते हैं. देश की टॉप फ़ुटबॉल लीग यानी आई-लीग में यह टीम पहली बार ही हिस्सा ले रही है. लेकिन प्रदेश और देश में आज शायद ही ऐसा कोई फ़ुटबॉल फ़ैन हो जिसकी ज़ुबान पर इस क्लब का नाम ना हो.

टीम ने लीग के अपने पहले ही मैच में डिफ़ेंडिंग चैम्पियन ‘मिनर्वा पंजाब’ पर जीत हासिल की. इसके बाद वह मोहन बागान, ईस्ट बंगाल और चेन्नई सिटी जैसी टीमों को हराने या उनके साथ मुक़ाबला ड्रॉ करने में कामयाब रही. किसी ने शायद ही सोचा था कि पहली बार खेल रहा यह क्लब 11 टीमों की इस लीग में टॉप तीन तक पहुंचकर शीर्ष स्थान का दावेदार बन जाएगा. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इस टीम और इसके फ़ैन्स का जोश गुज़रे ज़माने में मोहन बागान के खेल और लंबे-चौड़े फ़ैन बेस की याद दिलाता है.

उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन करने वाली इस टीम की ताक़त वह एक कड़ी है जो कश्मीर के लाखों लोगों को नब्बे मिनट के लिए जोड़ देती है. श्रीनगर में होने वाले उसके मुक़ाबलों में 15 हज़ार की क्षमता वाला स्टेडियम खचाखच भरा रहता है. एक वरिष्ठ फ़ुटबॉल कॉमेंटेटर ने मुझसे कहा कि ‘अगर ये स्टेडियम 30 हज़ार लोगों के लिए होता तो भी यूं ही भरा होता, 50 हज़ार के लिए होता तो भी यूं ही और अगर इसमें पूरा कश्मीर समा सकता तो भी तस्वीर ऐसी ही होती.’

रियल कश्मीर की कामयाबी ने फ़ुटबॉल को यहां का नंबर वन खेल बना दिया है. अब फ़ुटबॉल के प्रति यहां नॉर्थ ईस्ट, कोलकाता और केरल जैसी सुगबुगाहट महसूस की जा सकती है. यह इसलिए भी लाज़मी था क्योंकि टैलेंट से भरपूर होने के बावजूद कश्मीर के लिए क्रिकेट का सफ़र लंबा और थका देने वाला रहा है. भारतीय क्रिकेट टीम में परवेज़ रसूल जैसे नाम को पहुंचने में बरसों लग गए और उनके डेब्यू का इंतज़ार तो मानो और भी लंबा था. ऐसी जद्दोजहद से अच्छा है कि फ़ुटबॉल को ही अपना दिल भी दिया जाए और जां भी.

इस टीम की कहानी भी अपने आप में ख़ास है. 2014 में आए सैलाब के दौरान सैकड़ों की मौत और हज़ारों उजड़े घरों के बीच कुछ नौजवान रोज़ मिलते और सोचते कि ज़िंदगी के क्या मायने निकाले जाएं. एक लोकल बिज़नेसमैन संदीप चट्टू और पत्रकार शमीम मेराज ने इन्हें फ़ुटबॉल का रास्ता दिखा दिया. छोटे-मोटे मुक़ाबले शुरू हुए और देखते ही देखते क्लब में अनुभवी खिलाड़ी जुड़ते गए. 2016-17 में रियल कश्मीर ने आई-लीग की सेकंड डिवीज़न में कदम रखा और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.

इस दौरान उसे स्कॉटलैंड के डेविड रॉबर्टसन जैसे पेशेवर कोच और ऐडिडास जैसे स्पॉन्सर का साथ भी मिल गया. और अपने गठन के दो साल में ही यह क्लब बड़ी-बड़ी टीमों से नज़रें मिलाने लगा. आज उसके कश्मीरी फ़ैन्स टीम के जरिये खुद को चैम्पियन बनता देखने लगे हैं. वे एक ऐसी जीत का सपना देख रहे हैं जो सिर्फ़ कश्मीर की होगी. जिसके लिए एक दिन वे दिल खोलकर पटाख़े छोड़ पाएंगे.

इस साल की शुरुआत में टीम के लिए एक और अच्छी ख़बर आई. राज्य के युवाओं में इस टीम को लेकर जगे उत्साह को देखते हुए सरकार ने रियल कश्मीर एफ़सी के नाम दो करोड़ रुपये सैंक्शन कर दिए हैं. इनके ज़रिए टीम अपने भविष्य का प्लान और भी बेहतर तरीके से कर सकती है. यह इसीलिए भी ज़रूरी है क्योंकि कश्मीर के फ़ुटबॉल का असल इम्तिहान अब शुरू होता है. टीम पर आने वाले समय में आईलीग के पहले साल से बेहतर नहीं तो उसके बराबर प्रदर्शन करने का दबाव रहेगा. आगे जब भी कोई टीम कश्मीर एफ़सी के सामने होगी, उसे यह भी मालूम होगा कि यह टीम क्या कर सकती है.

रियल कश्मीर एफ़सी को कम समय में लोगों का ढेर सारा साथ और सफलता मिली है. टीवी पर उसके मैच भी देखे जा रहे हैं. लेकिन अब भी वह भारतीय मीडिया के दिलों में जगह पाने का इंतज़ार कर रही है. आज भी टीम और उसके समर्थक अख़बारों की छोटी अपडेट्स से ही तसल्ली करने को मजबूर हैं. दिल में एक शिकायत यह भी है कि मीडिया में कश्मीर की पत्थरबाज़ी को तो शिद्दत से दिखाया जाता है लेकिन उसकी टीम की जीत का जश्न उसी तरह से क्यों नहीं मनाया जाता!

सफ़ेद बर्फ़ से ढके शहर में फिरन पहने, कांगड़ी लिए कुछ बच्चों को गाते सुना हमने:

ये कोई पत्थरबाज़ी नहीं

ये तो शान की बाज़ी है

ये फ़ुटबॉल की बाज़ी है

ये दिलो-जान की बाज़ी है