इसी पुस्तक की ग़ज़ल ‘रुख़ अंदर रुख़’ के कुछ अंश -

‘तुम लोग, जो कि ईश्वर की खोज में लगे हो, ख़ुद ही ईश्वर हो / तुम्हें उसे खोजने की जरूरत नहीं है. वह तुम्हीं हो! वह तुम्हीं हो!

जिसे तुमने खोया ही नहीं, उस चीज़ को ख़ोज क्यों रहे हो, / तुम्हारे सिवा कोई और है ही नहीं, तुम कहां हो? कहां हो?

अपने घर में बैठो और दर-दर मत भटको / क्योंकि यह घर भी तुम्हीं हो और खुदा का घर भी तुम्हीं हो

तुम्हीं अस्तित्व हो और उस पर लगने वाले विशेषण भी तुम्हीं हो / तुम कभी उच्चतम आसमान बन जाते हो तो कभी निम्नतम ज़मीन / तुम स्वयं अमृतत्व हो और नाश की आशंका मात्र से रहित हो

नाम तुम्हीं हो, नामों में प्रयुक्त वर्ण तुम्हीं हो, और किताब तुम्हीं हो / ईश्वरीय धरोहर के रक्षक जिब्रील तुम्हीं हो और आसमानों से भेजे जाने वाले पैग़म्बर भी तुम्हीं हो

अगर तुम्हें अपने माशूक़ के चेहरे में अपना चेहरा देखना है / तो रेगमाल से अपने हृदय-दर्पण पर लगे जंग को मांज दो’


पुस्तक : निःशब्द नूपुर

लेखक : रूमी

अनुवादक : बलराम शुक्ल

प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 995 रुपए


रूहानियत एक ऐसा विषय है जिसके बारे में बहुत ज्यादा बातें नहीं होतीं. न कोई इस बारे में ज्यादा कहता है और न सुनने वाले ही हैं. सब लोग ज्यादातर अपने-अपने धर्म, ईश्वर और उसके उसूलों की ही बात करते हैं. रूहानियत पर बात करना शायद सबके बस में है भी नहीं. क्योंकि जिस दुनिया में लोग एक व्यक्ति के प्यार में ही ठीक से नहीं डूब पा रहे, वहां उस असीम, अनंत सत्ता के प्रेम में डूबना तो बहुत दूर की कौड़ी है. लेकिन जिस भी किसी ने रूहानी इश्क का स्वाद चखा है, वह फिर इससे उबर नहीं पाया, बल्कि और...और गहरे उतरता ही गया.

ईरान के बेहद प्रसिद्ध कवि ‘रूमी’ ऐसे ही व्यक्ति थे जो खुदा के इश्क में इतने दीवाने हुए कि उनकी इसी दीवानगी में लिखी गई कविताएं-ग़ज़लें पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हो गईं. यह संग्रह रूमी की रूहानियत से भरी 100 चुनिंदा गज़लों को हिन्दी में अनुदित करता है. हालांकि ग़ज़लों का अनुवाद काफी सरल किया गया है, लेकिन अनुदित ग़ज़लों में लय, सुर, ताल का स्वाद रत्ती भर भी नहीं बच सका है.

हमारे यहां भी कबीर ने रूमी के स्तर की रूहानी बातें की थीं. कहा था, ‘मोको कहां ढूंढे बंदे मैं तेरे पास में / ना मैं मंदिर, ना मैं मस्जिद, न काबे कैलास में.’ धार्मिकता और रूहानियत में शायद यही सबसे बड़ा फर्क है कि धर्म से जुड़े लोग कर्मकांडों और बाहरी चीजों के माध्यम से ईश्वर की प्राप्ति की बात करते हैं. जबकि रूहानियत में यकीन रखने वाले लोगों के लिए बाहरी कर्मकांड महज छलावा है और उस परम सत्ता के साथ खुद को भी धोखे में रखना है. इसलिए रूमी कहते हैं कि जिसे ढूंढ़ने के लिए काबा के चक्कर लगाए जा रहे हैं, वह तो खुद के भीतर है. उस असीम के दर्शन के लिए बाहरी दुनियावी दूरी को नापने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने अंदर ईश्वर के साथ जो दूरी है उसे खत्म करना जरूरी है. वे लिखते हैं -

‘हज को चल दिये ऐ मेरे क़ौम के यारो! कहां? कहां? भटक रहे हो आखिर तुम सब? / जिससे तुम्हें प्रेम है-तुम्हारा माशूक! वह तो यहीं है, जल्दी से लौट आओ! लौट आओ!

जिसे तुम खोजने चले हो वह तुम्हारा माशूक़ तो हर दरो दीवार का पड़ोसी है / फिर तुम लोग और किसकी चाह में भटक रहे हो उस रेगिस्तान में?

काश! तुम उस अरूप प्रियतम के रूप को निरख पाते, तो- / जान जाते कि घर के मालिक, घर और का,बा सब तुम्हीं तो हो! तुम्हीं तो हो!

दसियों बार तुम उस रेगिस्तानी राह से उस घर (का,बे) तक पहुंचे होगे / अब, सिर्फ़ एक बार इस शरीर के घर से निकलकर इस हृदय की अटारी पर चढ़ आओ

मैंने माना, वह घर (काबा) बेशक बहुत सुन्दर है. तुमने ख़ुद उसकी निशानियां भी बयां कीं- / लेकिन कभी ऐसा भी तो हो, कि उस घर के स्वामी ख़ुदा की भी निशानियां बयान करो!’

अहम और अहंकार को सच्ची निराकार भक्ति की सबसे बड़ी बाधाओं में से एक माना गया है. रूमी कहते हैं कि अहंकार से न सिर्फ व्यक्ति का व्यक्तित्व सिकुड़ जाता है बल्कि वह ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम से भी दूर हो जाता है. अहंकार व्यक्ति के भीतर की इंसानियत को तो कम करता ही है, वह उसकी ऊर्जा को भी सीमित करता है. रूमी ‘मैं’ से ऊपर उठकर ‘हम’ की बात करने पर जोर देते हैं. वे पूरी कायनात से प्रेम करने के लिए सबसे पहले अहम का त्याग करना जरूरी बताते हैं. ‘अहंकार और निरहंकारिता’ नामक ग़ज़ल में वे कहते हैं -

‘जब तुम अपने अहंकार के साथ रहते हो तो तुम्हें अपने जैसा प्रिय भी कांटे की तरह चुभता है / और जब तुम अहंकारविहीन होकर खुद को पा लेते हो तो फिर तुम्हारा प्रिय भी तुम्हारे किस काम का?

जब तुम अहंकार के साथ होते हो तो एक मच्छर भी तुम्हें मार सकता है / और जब तुम अहंकार-रहित होते हो तो तुम हाथी का भी शिकार कर सकते हो

जब तुम अहंकारग्रस्त होते हो तो तुम्हारा प्रिय तुम्हें किनारे हटा देता है / और जब तुम अहंकार रहित होते हो तो प्रिय किसी मादक शराब की तरह तुम तक आ पहुंचता है

जब तुम अहंकार में होते हो तो मानों पतझड़ की तरह सिकुड़ जाते हो / और जब तुम अहंकार-रहित होते हो तो पतझड़ भी तुम्हारे लिए वसन्त की तरह विस्तृत हो जाता है

तुम्हारी सारी बेचैनी इस नाते है क्योंकि चैनो-क़रार के पीछे तुम खुद भाग रहे हो / अगर तुम ख़ुद बेक़रार आशिक बन जाओ तो क़रार भी तुम्हारे पीछे दौड़ने लग जाए.’

अनुवादक बलराम शुक्ल फारसी भाषा के गूढ़ जानकार हैं. इस अनुवाद के लिए उन्होंने बेहद मेहनत से रूमी की ग़ज़लों पर उपलब्ध फारसी व्याख्याएं पढ़ीं. साथ ही ईरानी विद्वानों के प्रवचन, अरबी एवं फारसी के कोशों का उपयोग और विद्वानों से संपर्क किया. इस कारण उनके किए अनुवाद की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं किया जा सकता.

इन सभी ग़ज़लों की रूह में असीम ईश्वर के प्रति बेशर्त और अंतहीन प्रेम बसा है. भाव के स्तर पर यह रूहानियत लगभग सभी ग़ज़लों में शिद्दत से महसूस होती है. लेकिन जैसे स्वाद के साथ खाने की प्रेंजेटेशन भी मायने रखती है, उसी तर्ज पर कहें तो अनुवाद में स्वाद है लेकिन उसकी प्रस्तुति खूबसूरत नहीं है. इस कारण अनुदित हिस्सा ग़ज़लों को पढ़ने का सुख नहीं देता जो काफी अखरता है.

इस संग्रह में मूल फारसी और हिंदी, दोनों भाषाओं में ग़ज़लों के साथ ही कवि रूमी का संक्षिप्त परिचय भी दिया गया है. पुस्तक के अंत में फारसी छंदों और व्याकरण के बारे में भी बताया गया है. रूमी की ग़ज़लें पहली बार सीधे फारसी से हिन्दी में अनुदित हुई हैं. रूह, रूहानी और रूहानियत के मर्म और स्वाद को समझने वालों को रूमी की ये ग़ज़लें दिल, दिमाग और आत्मा तक स्पर्श कर सकती हैं.