‘देखिये, अधेड़ लेखक अपनी खोई हुई तन्दुरुस्ती ढूंढ़ रहे हैं. सुबह की सैर में, कुतुबखानों में या मयख़ानों में. क्या करें, लेखकों और उनकी रचनाओं का बीमा नहीं होता. क्योंकि लेखक संपूर्ण लेखक नहीं होता. उसका मुख्य धंधा कुछ और होता है. अधिकतर बचे-खुचे समय को ही वह लेखन में बुनता है. कर्मकांड से जो भी कर ले. आखि़र किसका समय टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित नहीं?’ ऐसा तीख़ा व्यंग करनेवाली कृष्णा सोबती बचे-खुचे समय में या कि साहित्यकार नहीं थी. उन्होंने असाधारण रूप से कई जोखिम उठाकर पर पूरी गरिमा और उसके साथ, स्वाभिमान को किसी भी समझौते से विरत रखकर, एक लेखकीय जीवन जिया. अपने मूलस्थान, हवेली और जम़ीन से देश को बंटवारे के कारण विस्थापित उन्होंने साहित्य को ही अपना देश, अपना घर बनाया. भौतिक घर तो उन्होंने कई बदले पर साहित्य का घर उनका स्थायी आवास रहा. उनके ही एक पद का इस्तेमाल कर कहा जा सकता है कि उनका ज़मीर हमेशा रौशन रहा और उसका दांव ठीक पड़ता है या ग़लत इसकी चिंता उन्होंने कभी नहीं की. उनका यह आवास ‘शब्दों के आलोक’ से और कभी सुस्त न होनेवाले ज़मीर से रोशन रहा.

हिंदी साहित्य में अगर कोई साधारणता की महिमा का इतिहास लिखेगा तो उसमें निश्चय ही कृष्णा सोबती का नाम बेहद दीप्ति के साथ होगा क्योंकि उनका समूचा साहित्य साधारण की लगभग पवित्र और अदम्य आभा को चरितार्थ करता रहा है. यह पवित्रता किसी वैभव-ऐश्वर्य से नहीं सहज गरिमा, ऐन्द्रियता, अपार लालित्य से आयी है और उसमें अध्यात्म और ऐन्द्रियता का द्वैत अतिक्रमित हो जाता है. जीवन, मानवीय संबंधों, उसकी विडम्बनाओं और नियति को लेकर कृष्णा जी की दृष्टि विराट्,अपने सत्व और मर्म में महाकाव्यात्मक थी पर उसका केन्द्र साधारण की महिमा, विशालता थी. उनके चरित्र, साधारण लोग, इतिहास या पुराण से नहीं अपने अनिवार्य जीवन-संघर्ष से जो अमलिन नायकत्व अर्जित करते थे उसकी भंगुरता से जितना कृष्णा जी अवगत थीं उतना ही वे स्वयं. गंवाने की पीड़ा, बिछोह का अवसाद, विस्थापन की भीषणता उनकी जिजीविषा को कभी अवरुद्ध नहीं कर पायी.

कृष्णा जी ने मेरे बारे में एक लंबे संस्मरण में मेरी ‘साहित्य और कलाओं के स्वतंत्र साक्ष्य पर... आस्था’ का ज़िक्र किया था, बरसों पहले. वे स्वयं अपने समय और समाज का, उसकी उथल-पुथल और अन्तर्धाराओं का हिस्सेदार गवाह रहीं. उनका साहित्य ‘पक्षपाती तटस्थता’ से लिखा गया है जिसमें जितनी संसार की उतनी ही आत्म की भी चीरफाड़ है. वे इतिहास नहीं, ‘दूसरा इतिहास’ लिखती रहीं. ऐसा दूसरा इतिहास जिसमें साधारण लोगों की संघर्ष-गाथा है, अपने सारे अन्तर्विरोधों, लालित्य और मानवीयता के समेत जो इतिहास में प्रायः नहीं होती.

नागरिक-लेखक

कृष्णा सोबती अपने नागरिक-लेखक होने पर हमेशा इसरार करती थीं. इसका आशय ऐसा लेखक होना था जो साहित्य और उससे बाहर समाज में अपनी नागरिकता को पूरे संवैधानिक अधिकार और मर्यादाओं के साथ विन्यस्त करें. उनके लिए नागरिकता का अर्थ अपनी स्वतंत्रता और न्यायबुद्धि का ज़िम्मेदारी से,संवेदनशीलता और जवाबदेही से, पर-पीड़ाचेतना और दूसरों के एहतराम से, सामाजिकता और व्यक्ति की गरिमा के भाव से निर्वाह था. एक तरह से उन्होंने अपने समय और समाज का नागरिक चैतन्य और अन्तःकरण हो सकना साहित्य और लेखक की अनिवार्य ज़िम्मेदारी माना. उन्होंने स्पष्ट कहा था कि ‘क़िस्सा कोताह यह कि हमारे समय को लिखने का प्रमाण किसी एक वर्ग या समुदाय के चालू मुहावरे को नहीं. वहां किसी एकनिष्ठ दृष्टि का आतंक नहीं. बल्कि साहित्य संसार की समृद्ध और जटिल बहुलता है. कोई नहीं कह सकता कि हमारे समय को लिखने का प्रामाणिक एकाधिकार किसी एक धर्म, मत या राजनीतिक विचारधारा को प्राप्त है.’ उनके साहित्य का अटल विश्वास था- ‘‘मनुष्य के लिए ज़रूरी है कि वह अपने समय को वह अपने समय को खंडित न होने दे. इसके बिना साहित्य-संसार अपनी समग्रता का कोई स्वप्त तक नहीं देख सकता. मनुष्यता साहित्य के माध्यम से ही समयातीत है, अनन्त है, अटूट है.’

कृष्णा जी की नागरिकता का एक पक्ष उनका अपने समानधर्माओं के काम में लगातार दिलचस्पी लेना और उनके बहुत रोचक संस्मरण सामने लाना भी था. वे इस बहाने उनका अनूठा आकलन भी कर देती थीं. उन्होंने अज्ञेय, नेमिचन्द्र जैन, उपेन्द्रनाथ अश्क, मंटो, उमाशंकर जोशी, श्रीकान्त वर्मा, कमलेश्वर से लेकर सत्येन कुमार,मंजूर एहतेशाम, सौमित्र मोहन, स्वदेश दीपक, नासिरा शर्मा आदि अनेक लेखकों पर लिखा. ‘हम हशमत’ शीर्षक से इसके तीन खंड निकल चुके हैं और चौथा अभी आया है. उन्होंने अपने लेखक मित्र कृष्ण बलदेव वैद से एक लम्बा संवाद पुस्तकाकार प्रकाशित किया और कवि-आलोचक गजानन माधव मुक्तिबोध पर एक पूरी पुस्तक लिखी. यह पुस्तक तब लिखी और प्रकाशित हुई जब वे 90 की आयु पार कर चुकी थीं. कृष्णा जी ने साहित्य के हिन्दी परिसर में न सिर्फ़ विचरण किया बल्कि कई महत्वपूर्ण अर्थों में उसे बचाने-ढालने की सार्थक कोशिश भी की.

इसी नागरिकता का एक और पक्ष उनकी अपार उदारता थी. उनसे बेहतर मेज़बान हिन्दी का कोई दूसरा लेखक हम नहीं जानते. लेकिन यह उदारता सिर्फ़ लेखकों-कलाकारों तक सीमित न थी, इसमें अनेक साधारण लोग भी आते थे. उनकी उदारता की कादम्बिनी में नहाये लोगों की संख्या बहुत है. इसी उदारता और दूसरों की मदद करने की उनकी अपार आकांक्षा के रहते उन्होंने रज़ा फ़ाउण्डेशन को पहले एक करोड़ रुपये और फिर ज्ञानपीठ पुरस्कार की 11 लाख रुपये की राशि दी थी, साहित्य और भाषा के संवर्द्धन के उद्देश्य से. कृष्णा सोबती अपनी दुखद मृत्यु तक अपनी सिसृक्षा, उदारता और गरिमा में अडिग रहीं.

शब्दों का आलोक

कृष्णा सोबती अपनी भारतीय अस्मिता और नागरिकता के बारे में हमेशा सजग रहीं. उन्होंने स्पष्ट कहा- ‘लोकतांत्रिक भारत का नागरिक होने के नाते में अपने होने में न सिर्फ़ हिन्दू हूं- न मुसलमान, न ईसाई, न सिख, न पारसी. मुझमें, मेरे अस्तित्व और चेतना से जुड़े हैं लोकतांत्रिक देश के मूल्य और सिद्धान्त भी जो मुझमें भारतीय होने का अहसास जगाते हैं. एक स्वस्थ समाज की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति और साहित्य से होती है. परंपरा और परिवर्तनों के फलस्वरूप उन पुराने की पड़ताल से भी उभरती है जो रूढ़ियों और परिवर्तनों के फलस्वरूप जनमानस की सोच में लगातार बने रहते हैं और उनके स्वभाव, रूचि और सोच के अटूट अंग हो जाते हैं. भारत जैसे लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश में यही मूल्य हमारे राष्ट्रीय जीवन को प्रतिबिम्बित करते हैं. .... ऐसे में धर्म, सम्प्रदाय, जाति और हिन्दुत्व के नाम पर आक्रामक और हिंसात्मक संस्कार को उभारना, उसे राष्ट्रवाद का नाम देना, धर्म से नत्थी करना देश, समाज और नागरिक संहिता के विरुद्ध है. ... राजनीतिक दंगल में मर्यादा पुरुषोत्तम जैसे मितभाषी नायक को खींचना भी भारतीय भारतीय संस्कार के विरुद्ध है. भूमंडलीकरण के इस युग में राष्ट्रीय उत्थान के लिए ऐसे अनेक कार्यक्रम और योजनाएं हैं जो बाबरी मसजिद के ध्वंस और गुजरात कांड के नाम पर की गयी राजनीति में कहीं ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण हैं.’

कृष्णा जी की यथार्थ की पकड़ और समझ असाधारण थी. उन्होंने एक बार अपनी कृति ‘यारों के यार’ पर हुए विवाद के सिलसिले में कहा था- ‘गालियां भी भाषायी संस्कृति और सम्याचार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. मुझे नहीं मालूम कि इसके इस्तेमाल पर हमें इतना नाक-मुंह क्यों सिकोड़ना चाहिये. गालियां समाज के विद्रूप और विसंगतियों को ही प्रगट करती हैं. गालियों की अपनी सत्ता है. हिंसा, विरोध, घृणा, धिक्कार, रोष, तिलमिलाहट या उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ अपने घावों को खोल देने को ही कर्कश सटीक आवाजें इंसानी सहनशक्ति को फाड़कर फूट पड़ी होंगी. हिंसा-प्रतिहिंसा को उभारती छोटी-बड़ी वज़नी गालियां अपने भाषायी अधिकार से विश्व की तमाम भाषाओं में अपनी जगह सुरक्षित किये हुए हैं. उन्हें किसी भी संहिता के अनुसार मानवीय शब्दावली से बाहर नहीं किया जा सकता.’

भाषा की शुद्धता के प्रसंग में उन्होंने इस पर इसरार किया कि ‘नागरी भाषा किसी की बपौती नहीं. उसका तामझाम सिर्फ़ कुर्सीनशीनी नहीं. सिर्फ़ अमलदारी नहीं. सिर्फ़ पुरोहिती नहीं. हिंदी संस्कृत महारानी की पुरानी धोती ही नहीं. यह अपनी जन्मजात सामर्थ्य में जीवन्त भाषा है। इसलिए नहीं कि वह अभिजात की भाषा है. इसलिए कि वह जनभाषा है. एक साथ धनियों की, ग़रीबों की. खेतिहर किसानों की. मजदूरों की. पिछड़ों की.’