बीते शुक्रवार को अमेरिका ने रूस के साथ हुई ‘मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि’ यानी आईएनएफ से खुद को अलग करने की घोषणा की थी. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि रूस लगातार इस संधि का उल्लंघन कर रहा है और जब तक वह मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण करता रहेगा, तब तक अमेरिका इस संधि का पालन नहीं करेगा. उनके मुताबिक अब अमेरिका भी जमीन से मार करने वाली इन मिसाइलों का निर्माण करेगा. अमेरिका की इस घोषणा के अगले ही दिन रूस ने भी इस संधि से हटने का ऐलान कर दिया. रूस का यह भी कहना है कि अब वह अमेरिका के साथ ऐसी किसी भी संधि को लेकर बातचीत की पहल नहीं करेगा.

मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (आईएनएफ) संधि क्या है?

1980 में शीत युद्ध के दौरान रूस ने यूरोपीय देशों को निशाना बनाने के मकसद से अपने सीमाई इलाकों में सैकड़ों मिसाइलें तैनात कर दी थीं. मध्यम दूरी की ये मिसाइलें परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम थीं. इसके बाद 1987 में शीत युद्ध की स्थिति को खत्म करने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और अंतिम सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने एक संधि की थी. इसे ही मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (आईएनएफ) संधि नाम दिया गया. यह संधि इन दोनों देशों को जमीन से मार करने वाली ऐसी मिसाइलें बनाने से रोकती है जो परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम हों और जिनकी मारक क्षमता 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर तक हो. आईएनएफ संधि से पश्चिमी देशों पर सोवियत संघ के परमाणु हमले का खतरा खत्म हो गया था.

अमेरिका के संधि से हटने की वजह

अमेरिकी मीडिया की मानें तो बीते कुछ सालों से देश की खुफिया एजेंसियां लगातार सूचना दे रही थीं कि रूस न केवल मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल बना रहा है बल्कि, उसने ऐसी तैयारी कर रखी है कि चंद मिनटों में पूरे यूरोप पर ये मिसाइलें दागी जा सकती हैं. अमेरिकी सरकार में रहे पूर्व अधिकारी बताते हैं कि ओबामा प्रशासन में यह मुद्दा कई बार उठा था, लेकिन बराक ओबामा ने हर बार रूस को चेतावनी देकर छोड़ दिया.

दूसरी तरफ ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद उनके प्रशासन ने सक्रिय रूप से रूस पर दबाव बनाने के कई प्रयास किए. पूर्व अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने एक बार यह तक कह दिया कि अगर रूस नहीं माना तो अमेरिका समुद्र से लॉन्च की जाने वाली मध्यम दूरी की क्रूज मिसाइल को अपने बेड़े में शामिल करेगा. बताते हैं कि इसके बाद भी जब रूस बेपरवाह बना रहा तब डोनाल्ड ट्रंप को संधि से अलग होने का फैसला करना पड़ा.

डोनाल्ड ट्रंप के इस फैसले के पीछे की एक बड़ी वजह चीन को भी बताया जा रहा है. बीते साल अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन जिस तरह की मिसाइलें बना रहा है, अगर उसे भी रूस के साथ हुई संधि में शामिल किया जाए तो उसकी 95 फीसदी मिसाइलें इस संधि का उल्लंघन करेंगी. इस रिपोर्ट के बाद अधिकारियों का कहना था कि अब इस संधि में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए या फिर अमेरिका को संधि से हट जाना चाहिए.

रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन सीएनएन से बातचीत में कहते हैं, ‘मैं काफी पहले से अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन से कहता आ रहा हूं कि आईएनएफ संधि को खत्म कर देना चाहिए. आप केवल रूस द्वारा किए जा रहे संधि के उल्लंघन को देख रहे हैं, लेकिन मैं चीन को सबसे बड़ा खतरा मानता हूं जिसने मध्यम दूरी की बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का जखीरा इकट्ठा कर लिया है. आपको कुछ करना चाहिए क्योंकि अब यह संधि आपके राष्ट्रीय हितों के पक्ष में नहीं दिखती.’

संधि टूटने से रूस को ज्यादा फायदा

दुनियाभर के जानकारों का मानना है कि इस संधि के टूटने का सबसे ज्यादा फायदा रूस को होगा. इनके मुताबिक अब रूस को मध्यम दूरी की बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें बनाने और तैनात करने से कोई नहीं रोक सकेगा. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट में विशेषज्ञ और अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी स्टीवन पिफर अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं, ‘रूसी अधिकारी ट्रंप की घोषणा के बाद से बहुत खुश हैं. डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी मनचाही मुराद पूरी कर दी है. अब वे खुलेआम मिसाइलों का निर्माण भी करेंगे और संधि तोड़ने के लिए अमेरिका को कोसेंगे भी.’

इस संधि के टूटने का एक और फायदा भी रूस को होता नजर आ रहा है. सीएनएन के वरिष्ठ पत्रकार एडम स्मिथ अपनी एक टिप्पणी लिखते हैं, ‘रूस हमेशा से ही नाटो को दो फाड़ करने के प्रयास करता रहा है और अब इस संधि के टूटने के बाद उसकी यह मुराद पूरी हो सकती है.’ एडम स्मिथ के मुताबिक संधि टूटने के बाद अब अमेरिका यूरोप में मिसाइलें तैनात करेगा जिसे लेकर कुछ नाटो सदस्य देश शायद ही तैयार हों, जिसका असर नाटो की एकता पर पड़ना तय है.

हालांकि अमेरिका के आईएनएफ से अलग होने की घोषणा के बाद नाटो ने कहा है कि वह इस फैसले पर अमेरिका के साथ है. लेकिन, कुछ अधिकारियों का कहना है कि अंदरखाने नाटो में इस फैसले को लेकर काफी नाराजगी है. नाटो से जुड़े एक राजनयिक नाम न छापने की शर्त पर रॉयटर्स को बताते हैं, ‘जब अमेरिका ने इस फैसले से नाटो को अवगत कराया था, तब नाटो सदस्य देशों ने इस संधि को बचाने के लिए अमेरिका को कई विकल्प सुझाए थे और यह भी कहा था कि इसके टूटने से यूरोप को बड़ा खतरा है.’ सीएनएन के मुताबिक अमेरिका ने इसके बाद नाटो से इस पर सक्रिय रूप से बात करनी बंद कर दी और इस बारे में संगठन को बहुत कम जानकारी ही दी. जानकार कहते हैं कि अमेरिका के इस एकतरफा फैसले को लेकर अब नाटो के अंदर नाराजगी होना स्वाभाविक है, जो भविष्य में खुलकर सामने आ सकती है.