इस पुस्तक के अध्याय ‘हिन्दूवाद की वापसी’ का एक अंश :

‘अगर उदारवादी हिन्दुओं का विशाल बहुमत हिन्दुत्व का प्रतिरोध कर रहा है तो यह कहना कोई विसंगति नहीं होगी कि हिन्दूवाद, जो भारत का प्राचीन स्वदेसी धर्म रहा है...वह इक्कीसवीं सदी के लिए एक आदर्श धर्म है - एक ऐसा धर्म जिसका कोई पैगम्बर नहीं है, जिसमें अधर्म या धर्मविरुद्ध जैसी कोई धारणा नहीं है... हिन्दूवाद सचमुच एक ऐसा धर्म है जो उत्तर-आधुनिक विश्व की प्रकृति के बिलकुल अनुकूल है.

अब समय आ गया है कि हम अपने असली और सच्चे धर्म की तरफ लौटें - आदि शंकराचार्य और स्वामी विवेकानन्द के धर्म की तरफ - और इसे कट्टरवादियों का खिलौना बनने से बचाएं. यह हिन्दूवाद की वापसी का समय है, उसे हिन्दुत्ववादियों से वापस लेने का भी...

अमीष त्रिपाठी जैसे बेस्टसेलर उपन्यासकार हिन्दू मिथकों के पात्रों को आधुनिक पाठकों के अनुरूप नए सांचों में ढालकर ख़ूब लोकप्रियता अर्जित कर रहे हैं. पाठकों के हृदयों को छूने के लिए उन्हें हिन्दुत्व के कट्टरवाद की ज़रूरत नहीं पड़ती.’


पुस्तक : मैं हिन्दू क्यों हूं

लेखक : शशि थरूर

प्रकाशक : वाणी प्रकाशन

कीमत : 695 रुपए


केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद से हिन्दू धर्म की चर्चा, समाज और राजनीति में एक साथ काफी बढ़ गई. लेकिन दोनों जगहों पर यह लगभग नकारात्मक ढंग से ही आगे बढ़ी. बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि आजकल हिन्दू धर्म की व्याख्या सिर्फ कट्टर इस्लामिक आतंकी संगठनों के बरक्स हो ही रही है. कुछ लोग हिन्दू चरमपंथियों के चश्मे से हिन्दू धर्म की व्याख्या कर रहे हैं. तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी हैं जो हिन्दू धर्म की इस कट्टर व्याख्या से आहत हैं और इसे सबसे श्रेष्ठ धर्म न कह पाने की पीड़ा से छटपटा रहे हैं.

शशि थरूर की किताब ‘मैं हिन्दू क्यों हूं’ दूसरी श्रेणी के लोगों की छटपटाहट पर मरहम का बढ़िया काम कर सकती है. यह किताब बेहद संतुलित और तटस्थ तरीके से हिन्दू धर्म की महानता, अच्छाइयों और कमियों पर काफी विस्तार से बात करती है. इस किताब में हिन्दू धर्म की बेहद सहज, सरल, लेकिन धीर-गंभीर व्याख्या है जो बेहद प्रभावित करती है. ‘मैं हिन्दू क्यों हूं’ को हिन्दू धर्म की आधुनिक टीका कहना गलत नहीं होगा.

वर्ण व्यवस्था और अंधविश्वास मूलतः ये दो ऐसे बिंदू हैं जिनके आधार पर प्रगतिशीलों और वामपंथियों ने हिन्दू धर्म को ‘बुरे धर्म’ के तौर पर प्रचारित किया है. शशि थरूर हिन्दू धर्म के इन सब नकारात्मक बिंदुओं पर भी बेहद धैर्य और विस्तार से बात करते हैं और इस धर्म की कमियों को खुले दिल से स्वीकार भी करते हैं. लेकिन इसके बावजूद वे इस धर्म की अच्छाईयों से स्वयं अभिभूत हैं. इस कारण वे पाठकों को भी हिन्दू धर्म के प्रति दिए गए अपने ठोस तर्कों और तथ्यों से प्रभावित करते हैं. और इसे दुनिया के सबसे खुले, सहिष्णु और व्यक्ति को सबसे ऊपर रखने वाले धर्म के रूप में स्थापित करने में सफल होते हैं.

शशि थरूर हिन्दू धर्म के बहुत से पक्षों पर ऐसी सकारात्मक बातें कहते हैं जो कि नियमित पूजा-पाठ करने वाले, हिन्दू रीति-रिवाजों का पालन करने वाले ज्यादातर लोग भी संभवतः नहीं कह और सोच सकते होंगे. हिन्दू धर्म के बारे में लेखक के ऐसे ही विचारों की एक झलक -

‘इक्कीसवीं सदी में हिन्दूवाद में एक सार्वभौमिक धर्म के बहुत से गुण दिखाई देते हैं. एक ऐसा धर्म, जो एक निजी और व्यक्तिवादी धर्म है, जो व्यक्ति को समूह से ऊपर रखता है, उसे समूह के अंग के रूप में नहीं देखता. एक ऐसा धर्म जो अपने अनुयायियों को जीवन का सच्चा अर्थ स्वयं खोजने की पूरी स्वतंत्रता देता है और इसका सम्मान करता है. एक ऐसा धर्म जो धर्म के पालन के किसी भी तौर-तरीके के चुनाव की ही नहीं, बल्कि निराकार ईश्वर की किसी भी छवि के चुनाव की भी पूरी छूट देता है. एक ऐसा धर्म जो प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं सोच-विचार करने, चिन्तन-मनन और आत्म-अध्ययन की स्वतन्त्रता देता है.’

शशि थरूर लिखते हैं कि हिन्दूवाद एकलौता ऐसा धर्म है जो अपनी श्रेष्ठता का दावा नहीं करता और व्यक्ति विशेष को सबसे ऊपर रखता है. लेकिन विडंबना यह है कि वर्तमान में यही हिन्दू धर्म राजनीति के हाथों में पड़कर इंसानों को ही निशाना बनाने लगा है. इस किताब के माध्यम से लेखक ने वर्तमान में प्रचलित ‘हिन्दुत्व’ को एक ‘गैर हिन्दू’ या ‘सेक्यूलर’ के रूप में नहीं, बल्कि इसी धर्म के भीतर खड़े एक आस्थावान हिन्दू के रूप में चुनौती दी है. यही इस किताब की सबसे खूबसूरत और खास बात है. लेखक इस किताब में ‘हिन्दूवाद बनाम हिन्दुत्व’ की बहस बहुत स्पष्ट तौर पर खड़ी करने में सफल होते हैं. एक जगह पर आज के हिन्दुत्व के बारे में शशि थरूर लिखते हैं -

‘हिन्दुत्व अभियान’ आत्मविश्वास का प्रतीक न होकर असुरक्षा की भावना का सूचक है. यह अतीत में बार-बार मुसलमानों के हाथों हिन्दू राजाओं की पराजय और अपमान की कथाओं और विजेताओं द्वारा मन्दिरों के विनाश और खज़ानों की लूट की घटनाओं की याद दिलाते रहने पर ही टिका हुआ है. दूसरे शब्दों में कहें तो हिन्दुत्व वृत्तांत हिन्दुओं को पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करता है, न कि एक महान सभ्यता और धर्म के गर्वीले प्रतिनिधियों के रूप में. यह विफलता और पराजय की भावना का वृत्तांत है, न कि एक महान और विश्व के सबसे उदात्त धर्म का आत्मविश्वास भरा वृत्तांत. यह अतीत की विफलताओं की स्मृतियों में कैद वृत्तांत है. इसलिए इसे एक विकासशील वर्तमान और सुनहरा भविष्य दिखाई ही नहीं देता.’

हिन्दूवाद और हिन्दुत्व का फर्क बताती इस किताब का अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद युगांक धीर ने किया है. अनुवाद की श्रेष्ठता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि यह किताब लेखक द्वारा मूलतः हिंदी में लिखी गई ही लगती है. युगांक धीर ‘मैं हिन्दू क्यों हूं’ को ‘आधुनिक पीढ़ी का धर्म-ग्रन्थ’ कहते हैं. यह किताब हिन्दू धर्म पर बेहद तटस्थता, धीरज और तर्क के साथ बात करते हुए पाठकों को इसकी गहराई में उतरकर समझने के लिए न सिर्फ प्रेरित बल्कि मदद भी करती है.

यह किताब हिन्दूवाद की मजबूत जड़ों के विस्तार पर बात करते हुए इस धर्म की विभिन्न शाखाओं, महान आत्माओं पर बात करने के साथ-साथ इस धर्म में मौजूद नकारात्मक बातों, हिन्दुत्व की राजनीति से लेकर हिन्दूवाद की वापसी पर भी विस्तार से बात करती है. यह किताब एक तरफ बतौर हिन्दू आपको दुनिया के सबसे बहुलतावादी, समावेशी, उदार और विस्तृत धर्म से होने के अद्भुत गर्व से भरती है. साथ ही हिन्दू धर्म में दुनिया का सार्वभौमिक धर्म बनने की प्रबल संभावनाओं वाले ठोस तर्कों और तथ्यों को खोजती है. वहीं दूसरी तरफ हिन्दूवाद के विकृत संस्करण यानी आधुनिक हिन्दुत्व के प्रति आपको आगाह भी करती है. कुल मिलाकर यह किताब हर एक हिन्दू और हिन्दुत्व का झंड़ा उठाने वाले दोनों के लिए पठनीय है.