‘मेरी दादी (पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी) प्यार और स्नेह से फ़ैसले लेती थीं. उनके काम लोगों को आपस में जोड़ने वाले थे. देश के ग़रीबों के प्रति उनके मन में सुहानुभूति थी. लेकिन मोदी (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) के फ़ैसले गुस्से और नफ़रत से प्रेरित होते हैं. वे देश को बांटते हैं. देश के ग़रीबाें और कमज़ोर तबकों के लिए उनके मन में कोई सुहानुभूति नहीं है. ऐसे में नरेंद्र मोदी से इंदिरा गांधी की तुलना करना इंदिराजी का अपमान करना है.’

हिंदुस्तान टाइम्स को दिए साक्षात्कार में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी और इंदिरा गांधी की तुलना से जुड़े सवाल पर यह प्रतिक्रिया दी है. हालांकि राहुल गांधी के स्पष्टीकरण के बावज़ूद तमाम जानकारों का मानना है कि नरेंद्र मोदी काफ़ी-कुछ इंदिरा गांधी वाले अंदाज़ में ही काम कर रहे हैं. इंदिरा गांधी के समय उनका प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) ही सत्ता का इकलौता केंद्र होता था. सभी मंत्रालयों से जुड़े अहम फ़ैसले पीएमओ ही लेता था. उनके कार्यकाल में पार्टी के भीतर और बाहर से उठने वाली विरोध की आवाज़ों को दबाने की कोशिश की जाती थी. यही नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में हो रहा है.

इतना ही नहीं. ग़रीबों और कमज़ोर वर्गों के लिए नरेंद्र माेदी सरकार ने जिस तरह की योजनाएं शुरू की हैं, उन्हें भी इंदिरा गांधी की योजनाओं की नकल माना जा रहा है. हालांकि राहुल गांधी इससे इत्तिफ़ाक नहीं रखते. उनके मुताबिक, ‘देश का हर संस्थान मोदी की तानाशाही का सामना कर रहा है. मोदी को लगता है, जैसे वे देश के भगवान हैं. लेकिन कांग्रेस की यह सोच नहीं है. हमारी पार्टी इस तरह से काम नहीं करती.’ अलबत्ता ग़ौर करने की बात यह भी है कि इंदिरा गांधी के समय 1974 में उनके समर्थक एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता डीके बरुआ ने ही नारा दिया था, ‘इंदिरा ही भारत हैं और भारत ही इंदिरा है.’