मायड़ भाषा लाड़ली, जन-जन कण्ठा हार।
लाखां-लाखां मोल है, गाओ मंगलाचार।।
वो दन बेगो आवसी, देय मानता राज।
पल-पल गास्यां गीतड़ा, दूना होसी काज।।

ये पंक्तियां अरसे पुराने उस तक़ाज़े से जुड़ी हैं जो ‘राजस्थानी’ को बतौर भाषा, संवैधानिक मान्यता देने की पैरवी करता आया है. इनका लब्बोलुआब है कि वह मुबारक दिन जल्द आने वाला है जब राजस्थानी को भाषाओं से संबंधित आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाएगा. पर, क्या इस मांग का पूरा होना इतना सहज है जितना कि इन पंक्तियों से महसूस होता है? इतिहास पर नज़र डालें, तो कतई नहीं! दरअसल राजस्थानी को मान्यता दिए जाने की मांग पिछले कई दशकों से अनसुलझे विवाद का केंद्र बनी हुई है. ताज़ा मामला हाल ही में चुने गए तीन विधायकों द्वारा राजस्थानी में शपथ लेने की मांग पर शुरू हुआ जिसे प्रोटेम स्पीकर गुलाब चंद कटारिया ने संविधान के हवाले से नकार दिया.

लेकिन यह पहली बार नहीं था जब राजस्थान विधानसभा के गलियारों में इस मुद्दे की गूंज उठी हो. 1956 के पहले कार्यकाल से ही यह विषय, इस सदन की सरगर्मी बढ़ाता रहा है. वहीं 2003 में अशोक गहलोत सरकार ने राजस्थानी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए सर्वसम्मति से संकल्प पारित कर केंद्र सरकार को भेजा था, जिस पर तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने (2006 में) सैद्धांतिक सहमति भी दे दी. लेकिन, तमाम कारणों के चलते यह प्रक्रिया अटक गई.

इस पूरे घटनाक्रम पर जालोर से विधायक जोगेश्वर गर्ग कहते हैं, ‘भाषा बनाने के नाम पर राजस्थानी के साथ शुरुआत से ही धोखा हुआ है.’ गर्ग उन तीन विधायकों में शुमार थे जिन्होंने इस बार राजस्थानी में शपथ लेने की मांग रखी थी. सत्याग्रह से हुई बातचीत में वे आगे जोड़ते हैं, ‘आजादी के बाद राजऋषि कहे जाने वाले पुरुषोत्तम दास टंडन, हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाने का भावुक प्रस्ताव लेकर राजस्थान आए थे जिसे तत्कालीन मंत्रीमंडल ने स्वीकार कर लिया. जबकि उस समय यहां के एक प्रतिशत लोग भी हिंदी नहीं बोल पाते थे.’ गर्ग के शब्दों में, ‘तब हमें आश्वासन दिया गया था कि चूंकि राजस्थान ने हिंदी पर बड़ा अहसान किया है इसलिए भविष्य में हमारी भाषा की चिंता की जाएगी. लेकिन यह सिर्फ जुमला ही साबित हुआ.’

बकौल जोगेश्वर गर्ग, ‘कई सौ साल पहले की मरुभाषा से दो भाषाएं निकलीं, एक गुजराती और दूसरी राजस्थानी.’ गर्ग को शिकायत है कि इनमें से मरुभाषा के ग्रंथ कन्हड़देव प्रबंध को अपना बताने वाली गुजराती को तो मान्यता मिल गई, लेकिन राजस्थानी की सुध किसी ने नहीं ली.

इस बात के लिए प्रोफेसर कल्याण सिंह शेखावत देश की कुछ राजनैतिक हस्तियों की भूमिका को कटघरे में खड़ा करते हैं. 1962 से राजस्थानी को मान्यता दिलवाने के लिए संघर्ष कर रहे शेखावत का आरोप है कि नेहरू सरकार में मंत्री और महात्मा गांधी के करीबी केएम मुंशी ने गुजराती और राजस्थानी के एक ही भाषा होने का तर्क देकर गुजराती को मान्यता दिला दी और राजस्थानी के मसले को अधर में छोड़ दिया. शेखावत की मानें तो, ‘बाकी कसर कुछ गैर राजस्थानी अधिकारियों ने इस मामले को उलझाकर पूरी कर दी, ताकि प्रशासनिक सेवाओं से राजस्थान के प्रत्याशियों की उचित दूरी बनी रहे.’

शेखावत के मुताबिक संघ ही नहीं बल्कि राजस्थान के अपने लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) में भी राजस्थानी के साथ दोहरा बर्ताव होता है. एक वरिष्ठ अधिकारी के दुराग्रह का ज़िक्र करते हुए शेखावत कहते हैं कि आरपीएससी ने अपने पाठ्यक्रम में राजस्थानी साहित्य और संस्कृति को तो शामिल रखा, लेकिन भाषा के तौर पर राजस्थानी को हटा दिया. शेखावत तंज कसते हैं, ‘शायद यह इकलौता ऐसा उदहारण है जहां भाषा के बिना ही साहित्य पढ़ाया और पूछा जाता है.’

वरिष्ठ पत्रकार श्रीपाल शक्तावत, शेखावत की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘जब तक एक भाषा रोजगार से नहीं जुड़ेगी तो बचेगी कैसे? जिस तरह उर्दू को मान्यता मिलने के बाद प्रशासनिक सेवाओं में कश्मीर से आने वाले युवाओं की भागीदारी सुखद तौर से बढ़ी. उसी तरह राजस्थानी को भी मान्यता मिलने पर यहां के युवाओं को आगे आने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा.’

युवा कथाकार और प्रोफेसर डॉ अरविंद सिंह आशियां फ़िक्र जताते हुए कहते हैं, ‘राजस्थानी को न तो खाने-कमाने की भाषा बनने दिया गया, न ही यह सत्ता की भाषा बन पाई. इसलिए न तो यह हमारी अगली पीढ़ी तक पहुंच पा रही है और न ही इसमें लोगों की रुचि बची है.’ उनकी इस बात की बानगी हाल ही में जयपुर में आयोजित साहित्य महोत्सव (जेएलएफ) के दौरान दिखी जब राजस्थानी को समर्पित एक सत्र का पांडाल, श्रोताओं की राह तकता ही रह गया. और ऐसे ही एक अन्य सत्र में जो लोग मौजूद थे उनमें से अधिकतर राजस्थानी नहीं, बल्कि वक्ताओं से निजी संबंधों के ख़ातिर पहुंचे जान पड़ रहे थे.

जेएलएफ-2019 में राजस्थानी भाषा को समर्पित एक सत्र में खाली पड़ी कुर्सियां | फोटो- पुलकित भारद्वाज
जेएलएफ-2019 में राजस्थानी भाषा को समर्पित एक सत्र में खाली पड़ी कुर्सियां | फोटो- पुलकित भारद्वाज

राजस्थानी को मान्यता न दिए जाने के पीछे एक बड़ी वजह इसकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता से भी जोड़ी जाती है. कई विश्लेषकों के मुताबिक; खुद राजस्थान शब्द का अस्तित्व ही सर्वप्रथम 1949 में इस राज्य के निर्माण के बाद सामने आया था, इसलिए राजस्थानी के पुरातन भाषा होने के दावे को संदेहास्पद माना जाता है.

राजस्थानी साहित्य अकादमी सलाहकार परिषद के संयोजक और पद्मश्री सम्मानित डॉ चंद्रप्रकाश देवल इस तरह की बातों को कोरी लफ्फ़ाजी बताते हैं. देवल के मुताबिक चूंकि वेदों को राजस्थान और पंजाब में बहने वाली सरस्वती नदी के किनारे लिखा गया था इसलिए उनमें राजस्थानी के कई प्रचलित शब्द मिलते हैं. नवीं सदी में लिखे गए जैनकाव्य ‘कुवलयमाला’ के हवाले से देवल कहते हैं कि इस ग्रंथ में जिन भाषाओं का ज़िक्र किया गया उनमें मरुभाखा भी शामिल थी जो कालातंर में मारवाड़ी हो गई यानी मरु प्रदेश में बोली जाने वाली भाषा.

देवल दावा करते हैं कि राजस्थान के प्राच्य विद्या संस्थानों में पौने चार लाख से ज्यादा पाण्डुलिपियां मौजूद हैं जो पूरे हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा है. वे आगे जोड़ते हैं, ‘ईस्ट-इंडिया कंपनी के राजनयिक रहे कर्नल जेम्स टॉड (1829) ने अपनी ऐतिहासिक किताब ‘एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान’ में जिस राजस्थान शब्द का इस्तेमाल किया वह मूलत: ‘रजथान’ शब्द से निकला था, जिसका मतलब रज यानी रेत का स्थान था, न कि राजाओं का स्थान. और यहां की भाषा थी रजथानी जिसके माने भी रेगिस्तान में बोली जाने वाली भाषा से ही था.’

अपना इतिहास सिद्ध करते समय राजस्थानी भाषा के समर्थकों को यह शिकायत भी रहती है कि जिस साहित्य को हिंदी का आदिकाल घोषित किया जाता है, वह असल में राजस्थानी की विरासत है. लेखक और साहित्य अकादमी राजस्थानी के संयोजक अर्जुन देव चारण कहते हैं कि हजार साल पुरानी हमारी रासो परंपरा को हिंदी ने हथिया लिया और हिंदी को बड़ा बताने के लिए राजस्थानी को बोली बना दिया गया.

चारण आगे जोड़ते हैं, ‘राजस्थान का मध्यकाल बेहद समृद्ध है. यहां ऐसे-ऐसे अद्भुत ग्रंथ रचे गए जो वीरता और श्रृंगार जैसे बिलकुल अलग रसों को बेहद खूबसूरती से एक साथ प्रस्तुत करने में सक्षम हैं. अपनी इस बात के पक्ष में वे मध्यकाल के विख्यात कवि ईसरदास बारहठ के ग्रंथ ‘हाला-झाला री कुंडलिया’ से एक संदर्भ उद्धृत करते हैं-

सैल घमोड़ा किम सह्या, किम सहिया गजदंत,
कठण पयोधर लागता, कसमसतो थू कंत.’

(एक पत्नी अपने पति की वीरता का बखान करते हुए कहती है कि युद्ध भूमी में तुम्हारा ऐसा कौन सा रूप हो गया जो तुमने भाले की तीखी धार और हाथियों के दांत अपने शरीर पर झेल लिए. अन्यथा तुम तो इतने नाजुक थे कि मेरे स्तनों के स्पर्श से ही कसमसाने लगते थे.)

चारण अपनी बात आगे बढ़ाते हैं, ‘कृष्ण भक्तिनी मीराबाई राजस्थानी में ही लिखती थीं. अजीब बात है कि राजस्थान को मीरा की धरती तो कहते हैं, लेकिन उस मीरा का यश बढ़ाने का काम जो भाषा करती है उसे ख़ारिज कर दिया जाता है.’ चारण के शब्दों में, ‘महाराणा प्रताप पर गर्व तो सभी करना चाहते हैं, लेकिन जिस भाषा में वे बोला करते थे, वह स्वीकार नहीं.’

राजस्थानी के इस हाल के लिए भारत विद्याविद (इंडोलॉजिस्ट) श्रीकृष्ण जुगनु ऐसे भी कई लोगों को जिम्मेदार ठहराते हैं जो इस भाषा के कथित झंडाबरदार बने हुए हैं. वे कहते हैं, ‘राजस्थानी को सबसे ज्यादा नुकसान वे लोग पहुंचाते हैं जो अकादमियों में पद और किसी पुरस्कार की लालसा पाले इस भाषा का बीड़ा उठाते हैं. फिर महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने पर अपने करीबियों को अनुगृहीत करते हैं और पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं.’

राजस्थानी को संवैधानिक दर्ज़ा मिलने में एक प्रमुख अड़चन भारतीय रिजर्व बैंक की तरफ से भी है. बैंक का कहना है कि ‘नोट’ पर अब किसी और भाषा को छापने के लिए जगह नहीं है. हालांकि नोट पर सभी मान्यता प्राप्त भाषाएं यूं भी नहीं छापी जातीं. वहीं, संघ लोक सेवा आयोग की दलील है कि राजस्थानी में प्रश्नपत्र तैयार करने और उत्तर जांचने के लिए उसके पास योग्य जानकार नहीं हैं. इनके अलावा कुछ अन्य केंद्रीय संस्थाएं भी अलग-अलग कारणों का हवाला देकर राजस्थानी (समेत किसी भी नई भाषा) को संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने पर आपत्ति जताती रही हैं.

लेकिन दिलचस्प बात यह है कि भाषा के तौर पर राजस्थानी को मान्यता मिलने की राह में सबसे बड़े रोड़ा किसी और ने नहीं बल्कि खुद राजस्थानियों ने ही लगा रखा है. दरअसल, प्रदेश के जोधपुर, जैसलमेर और बीकानेर इलाकों में मारवाड़ी बोली जाती है, उदयपुर-भीलवाड़ा क्षेत्र में मेवाड़ी. बांसवाड़ा-डूंगरपुर क्षेत्र बागड़ी का है तो जयपुर अंचल ढूंढाड़ी का. कोटा-बूंदी क्षेत्र में हाड़ौती का वर्चस्व है, सीकर-झुंझनू में शेखावाटी का. और भरतपुर-करौली-सवाईमाधोपुर में बृज चलती है. इनमें से मोटे तौर पर मारवाड़ी को ही राजस्थानी माना जाता है और बाकियों को बोली. यही बात कईयों को मंजूर नहीं, खासतौर पर बृज और बांगड़ी के अनुयायियों को. यही कारण है कि राजस्थानी को राजस्थान में राज्य भाषा तक नहीं बनाया जा सका है.

राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शास्त्री कौसलेंद्रदास कहते हैं कि पूरे प्रदेश पर एक क्षेत्र विशेष की बोली थोपने की मांग संकुचित दृष्टि की शिकार हैं. शास्त्री के शब्दों में, ‘राजस्थान में बोली जाने वाली सारी बोलियों का स्त्रोत संस्कृत है. ऐसे में किसी भी बोली को कम या ज्यादा नहीं आंका जा सकता है.’ वे कहते हैं, ‘राजस्थान हिंदी साहित्य अकादमी प्रत्येक वर्ष सभी बोलियों के लेखकों को भाषागत पुरस्कार देती रही है. इसलिए एक बोली को भाषा बनाने की मांग ठीक नहीं.’

वहीं, प्रदेश के एक वरिष्ठ पत्रकार का इस बारे में कहना है कि भावनात्मक तौर पर राजस्थानी को राज्यभाषा घोषित करने से जुड़ी बातें अच्छी लगती हैं. लेकिन इसे व्यवहारिकता में ला पाना मुश्किल है. वे कहते हैं, ‘नई पीढ़ी राजस्थानी भूल चुकी है. बच्चा अपने घर से स्वभाविक तौर पर राजस्थानी सीखे, इससे बेहतर कुछ नहीं. लेकिन इसे शैक्षणिक बाध्यता देने से नुकसान होगा. इतने प्रयास और समय में बच्चे कोई प्रोफेशनल लैंग्वेज सीख सकते हैं.’

राजस्थानी भाषा संकल्प विरोधी समिति के केंद्रीय महामंत्री और हिंदी साहित्य समिति भरतपुर के सचिव राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि जो संकल्प प्रदेश सरकार ने 2003 में भेजा था, उसमें बृज को राजस्थानी की बोली बताया था. जबकि बृज का राजस्थानी से दूर-दराज तक कोई लेना देना नहीं. अग्रवाल का कहना है कि अगर राजस्थान में कभी राज्यभाषा बनने की स्थिति पैदा हुई तो एक नहीं बल्कि आठ भाषाएं बनानी पड़ेंगी. राजस्थान के बारे में यह भी दिलचस्प तथ्य है कि 1927 में भरतपुर में आयोजित एक सम्मेलन में यहां की तत्कालीन भरतपुर और अलवर रियासतों ने हिंदी को अपनी राष्ट्रभाषा घोषित किया था.

राजस्थान उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश पानाचंद जैन का दावा है कि बोलियां बेशक हमारे यहां कई हैं, लेकिन राजस्थानी नाम की कोई भाषा नहीं है. कोटा से ताल्लुक रखने वाले जैन आगे कहते हैं, ‘राजस्थान लैंग्वेज एक्ट- 1956 में केवल हिंदी भाषा का उल्लेख किया है. एक तरफ हम हिंदी को विश्व की भाषा बनते देखना चाहते हैं. दूसरी तरफ उसे चुनौती देते हैं. हिंदी को नुकसान पहुंचाकर राजस्थानी का उत्थान नहीं हो सकता.’ राजस्थान में राज्यभाषा घोषित करने से जुड़ी प्रशासनिक व कानूनी परेशानियों का ज़िक्र करते हुए वे सवालिया लहजे में कहते हैं, ‘क्या गजट पांच भाषाओं में तैयार होंगे? क्या अदालतों में बयान बांग्ड़ी या बृज में रिकॉर्ड किए जा सकते हैं? क्या मुंसिफ मेवाड़ी में फैसला देंगें?’ वे जोड़ते हैं, ‘पांच-सात बोलियों को मिलाकर राजस्थानी बना दी गई है. न इसका कोई व्याकरण है और न ही कोई ग्रंथ.’

हालांकि राजस्थानी के अन्य समथर्कों की तरह डॉ गीता सामोर भी जैन की बातों से इत्तेफाक़ नहीं रखतीं. सामोर राजस्थान विश्वविद्यालय में हिंदी-राजस्थानी विभाग की प्रोफेसर हैं. मशहूर भाषा विज्ञानी सुनीति कुमार चटर्जी के हवाले से वे बताती हैं कि भाषा विज्ञान राजस्थानी को एक स्वतंत्र भाषा मानता है. सामोर के शब्दों में, ‘राजस्थानी के पास अपना समृद्ध शब्दकोश मौजूद है जिसमें दो लाख से ज्यादा शब्द मौजूद हैं. एक अलग व्याकरण है. विस्तृत साहित्य है. हर भाषा की तरह इसकी भी बोलियां हैं जो इसे वैसे ही समृद्ध करती हैं, जैसे पेड़ को शाखाएं.’ सामोर सवाल उठाती हैं कि जब पंजाबी, मराठी, गुजराती से हिंदी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा तो राजस्थानी कैसे पहुंचा सकती है.