‘कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में अब दो ही विकल्प बचे हैं. एक ये कि वो खुद को हालात के हवाले कर दे और यथास्थिति को स्वीकार कर ले. और दूसरा ये कि वो अपने दम पर अपनी सारी ताकत को इकट्ठा करके, करो या मरो की नीति पर चल कर चुनाव मैदान में उतर जाए.’

कांग्रेस की कई सरकारों में मंत्री रहे वयोवृद्ध पार्टी नेता अम्मार रिजवी का यह बयान उत्तर प्रदेश में गठबंधनों के दौर में अलग-थलग पड़ गई कांग्रेस की जमीनी हकीकत दिखाता है. बीता एक दशक देखें तो सियासी रूप से सबसे अहम सूबे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए स्थितियां लगातार खराब होती जा रही हैंं. पार्टी का वोट बैंक सिकुड़ता चला गया है. 2009 में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 78 लोक सभा सीटों पर चुनाव लड़ कर 21 सीटें जीती थीं और उसे कुल 18.2 फीसदी वोट मिले थे. 2012 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में वह 355 सीटों पर लड़कर 28 पर विजयी हुई और उसे कुल 11.6 फीसदी वोट हासिल हुए. 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस 67 सीटों पर लड़ी और दो सीटों के साथ 7.5 फीसदी वोट ही हासिल कर पाई. 2017 में वह सपा की साइकिल पर सवारी करते हुए विधानसभा की 114 सीटों पर मैदान में थी. लेकिन सपा की दोस्ती भी उसके लिए निराशाजनक ही रही. उसे कुल सात सीटें मिलीं और उसका वोट बैंक सिमट कर 6.25 फीसदी पर आ गया.

बीमारी और तैयारी

कांग्रेस का यह घटता जनाधार ही उसे सपा-बसपा के गठबंधन का हिस्सेदार बनने में सबसे बड़ी बाधा बना, क्योंकि इसी मत प्रतिशत के आधार पर उसे गठबंधन में हिस्सेदारी देने की बात कही गई थी. जैसा कि पहले जिक्र हुआ, कांग्रेस को 2014 में सपा के 22.70 और बसपा के 19.60 फीसदी मतों की तुलना में 7.5 फीसदी मत ही मिले थे. यानी उसके पास ज्यादा बड़ा हिस्सा मांगने के लिए यह अपने आप में बहुत ही कमजोर आधार था. फिर मायावती की महत्वाकांक्षा के चलते भी गठबंधन में कांग्रेस के लिए सम्मानजनक हिस्सेदारी के रास्ते बंद होने ही थे. इसके बाद कांग्रेस ने अपने दम पर सूबे की सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी.

मगर प्रियंका गांधी वाड्रा को पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने के अलावा अब तक पार्टी ने अपने दम पर 80 सीटों पर जीत के लिए कोई तैयारी की हो, ऐसा नहीं दिखता. प्रियंका गांधी के नाम की घोषणा भी बड़े अनमने ढंग से की गई. अगर यह घोषणा प्रियंका की मौजूदगी में किसी औपचारिक कार्यक्रम में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा की गई होती तो उसके प्रभाव और निहितार्थ कुछ और होते. मगर वह घोषणा तब की गई जब प्रियंका विदेश में थीं और राहुल गांधी अमेठी में. सिर्फ एक प्रेस नोट जारी करके कांग्रेस ने अपने बड़े दांव को चलाने की इतिश्री कर ली.

घटते वोट प्रतिशत के अलावा पार्टी की एक और बड़ी समस्या प्रदेश में संगठन को लेकर है. राज्य में करीब दो वर्ष से संगठन का ढांचा मृतप्राय है. पार्टी राज्य की 80 सीटों की ओर तो देखती है, लेकिन संगठन को देखने को फुरसत किसी के पास भी नहीं है. अभी भी राज्य में संगठन के ढांचे को लेकर तरह-तरह की अटकलें हैं. दो महासचिवों को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी देने के साथ-साथ प्रदेश को चार हिस्सों में बांट कर चार प्रभारी अध्यक्ष बनाए जाने की भी अटकलें हैं. कार्यकर्ता संगठन के पुनर्निर्माण की बाट जोह रहे हैं. मगर हो कुछ नहीं रहा है. हर बीतते दिन के साथ उनका उत्साह ठंडा पड़ता जा रहा है.

फिर भी उम्मीद बाकी है

लेकिन कांग्रेस में अपने दम पर लड़ कर बड़ी जीत हासिल करने की कुछ उम्मीदें अब भी बाकी हैं. इन उम्मीदों का आधार उसे 2009 के लोकसभा चुनावों के नतीजों में दिखता है. 2009 में कांग्रेस को जो 21 सीटें मिलीं थी उनमें से 18 सीटें नई थीं. जबकि पुरानी नौ सीटों में से वह छह सीटें हार गई. यानी कांग्रेस के लिए नई सीटों पर जीत हासिल कर पाना अभी भी असम्भव नहीं माना जा सकता.

अपनी तमाम खामियों और कमजोरियों के बाद भी कांग्रेस अपनी जीत के लिए 25-30 सीटों पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है. ऐसी सीटों के लिए उसने अपने सम्भावित उम्मीदवारों को तैयारी करने के संकेत भी दे दिए हैं. इसी तरह यह भी कहा जा रहा है कि पार्टी इस बार 60-65 सीटों पर युवाओं को उतारना चाहती है. हालांकि कांग्रेस के इन युवाओं की उम्र सीमा क्या होगी अभी यह तय नहीं है, लेकिन इसका अर्थ यह तो है ही कि इस बार उम्रदराज लोगों के लिए टिकट पाना आसान नहीं होगा. इससे कुछ बड़े और पुराने नेता नाराज भी हो सकते हैं. लेकिन कांग्रेस युवा शक्ति को अपने पाले में खींचने के लिए यह दांव भी खेलने को तैयार है.

कांग्रेस की दूसरी बड़ी रणनीति अलग-अलग वजहों से पार्टी से दूर हुए मतदाताओं को अपनी ओर खींचने की है. 2009 में पार्टी को 21 में से 17 सीटें ग्रामीण बहुल लोकसभा क्षेत्रों में हासिल हुई थी. इसलिए पार्टी अब ग्रामीण लोकसभा सीटों पर अपना पूरा ध्यान देना चाहती है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी का किसानों को लक्ष्य कर घोषणाएं करना पार्टी की उम्मीदों को जगा रहा है तो प्रियंका के कारण पूर्वी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण बहुल सीटों पर पार्टी को फायदा हो सकेगा, ऐसा कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मानना है. इस तरह ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस अपना पुराना वोट बैंक फिर से खड़ा करना चाहती है.

पार्टी को इस बात की भी आशा है कि लोकसभा चुनाव होने के कारण उत्तर प्रदेश के गैर भाजपा मतदाताओं के सामने सपा-बसपा के क्षेत्रीय गठबंधन की तुलना में राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का मुकाबला कर रही कांग्रेस ज्यादा बेहतर विकल्प होगी. इस लिए पार्टी को लगता है कि मुस्लिम, ब्राह्मण और यादवों को छोड़ कर अन्य पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का रुझान कांग्रेस के पक्ष में हो सकता है. वैसे भी 2009 के चुनाव में कांग्रेस के ऐसे प्रत्याशियों को भी जीत मिली थी जिनका जातीय आधार बड़ा नहीं था. इसलिए राष्ट्रीय विकल्प बन सकने की अपनी संभावना को ही कांग्रेस अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है.

अपना ही नुकसान

लेकिन पार्टी खुद ही अपने दांव कमजोर भी कर रही है. प्रियंका गांधी के पूर्वी यूपी के प्रभारी महासचिव बनने की घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश के प्रभारी रहे गुलाम नबी आजाद की छुट्टी हो गई थी. नए प्रभारी महासचिव अभी आए नहीं, मगर प्रियंका की रैलियों की घोषणा हो गई और राहुल गांधी की भी 10 फरवरी को लखनऊ में रैली की घोषणा कर दी गई. अब कहा जा रहा है कि यह रैली स्थगित कर दी गई है. अब खबर आई है कि प्रियंका, राहुल गांधी के साथ 11 फरवरी को चार दिवसीय दौरे पर लखनऊ आएंगी. यानी चुनाव तो सभी सीटों पर लड़ा जाएगा मगर तैयारी अभी घर के अंदर भी शुरू नहीं. ऐसे में कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश से 15-20 सीटें हासिल कर पाने की सम्भावनाएं खुद कांग्रेस की ओर से ही धूमिल की जा रही हैं.

असल में कांग्रेस उत्तर प्रदेश को लेकर अपना स्टैंड ही तय नहीं कर पायी है. ‘सत्ताइस साल यूपी बेहाल’ का जो नारा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तैयार किया था वह काफी हद तक इन 27 सालों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की बदहाली का दर्द भी झलकाता है. पिछले 10-15 वर्षों से कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व उत्तर प्रदेश से ही आता रहा है, लेकिन न सोनिया गांधी के जमाने में और न अब राहुल के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश में संगठन को ठीक करने का कोई प्रयास हुआ. उत्तर प्रदेश कांग्रेस लगातार उपेक्षित बनी रही और शीर्ष नेतृत्व हवाई किले बनाता रहा.

कांग्रेस अब भी करो या मरो की नीति पर चल कर पूरे समर्पण से उत्तर प्रदेश के चुनाव अभियान में जुट सके तो उत्तर प्रदेश में उसकी सीटें बढ़ सकती हैं. लेकिन यह ‘पिकनिक राजनीति’ से सम्भव नहीं है. यह रास्ता समर्पण की राजनीति का है, सड़क की राजनीति का है और संघर्ष की राजनीति का है. कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में अपने राजनीतिक मित्रों और प्रतिद्वन्दियों को भी पहचानना होगा और गैर भाजपा मतदाताओं के बीच खुद का एजेंडा साफ करना होगा. पार्टी आज सूबे में जहां पहुंच चुकी है, वहां से ऊपर उठने के लिए उसे हरसंभव प्रयास करने पड़ेंगे. अन्यथा यूपी में अमेठी और रायबरेली के उसके अंतिम गढ़ भी ढह सकते हैं.