प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के दौरान कई बार आरक्षण को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं. वे कहते रहे हैं कि उनके जीते जी दलितों व आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार पर आंच नहीं आ सकती. वहीं बिहार विधानसभा चुनाव के समय उन्होंने कहा था कि अगर आरक्षण को कोई ख़तरा हुआ तो वे उसे बचाने के लिए अपनी ‘जान की बाज़ी’ लगा देंगे.

लेकिन 13 पॉइंट रोस्टर मामले में उनकी यह प्रतिबद्धता सवालों के घेरे में है. इसे लेकर एससी-एसटी व ओबीसी संगठनों में बहुत ज़्यादा नाराज़गी है और वे इस पर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. विश्वविद्यालयों में शिक्षक भर्तियों को लेकर बनाए गए इस फ़ॉर्मूले के लिए कहा जा रहा है कि इससे पूरी आरक्षण व्यवस्था ही ख़त्म हो सकती है, लिहाज़ा नरेंद्र मोदी को उनका आरक्षण को लेकर किया वादा याद दिलाने की ज़रूरत है.

यह मामला अब एक बड़ा राजनीतिक विवाद बनता भी दिख रहा है. रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ट्वीट के ज़रिए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले वंचित तबक़ों से शिक्षा के अवसर छीने और अब उन्होंने 13 पॉइंट रोस्टर के ज़रिए विश्वविद्यालयों में उनकी नौकरी के अवसर भी ख़त्म कर दिए.

क्या है पूरा मामला

देशभर के विश्वविद्यालयों के लिए कहा जाता है कि इनमें आरक्षण व्यवस्था सही मायने में लागू नहीं की गई, इसलिए यहां एससी-एसटी व ओबीसी वर्गों के शिक्षकों की संख्या शुरू से काफ़ी कम रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक हालिया रिपोर्ट इसकी तस्दीक़ करती है. इसे देखते हुए साल 2005 में केंद्र सरकार के तहत कार्मिक एवं शिक्षा विभाग ने विश्वविद्यालयों की शिक्षक भर्तियों में एससी-एसटी व ओबीसी आरक्षण लागू होने में आने वाली दिक़्क़तों को दूर करने की बात कही थी. विभाग की ओर से पत्र लिखने के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने भर्ती प्रक्रिया के लिए एक फ़ॉर्मूला तैयार करने के मक़सद से तीन सदस्यीय समिति बनाई.

चूंकि तकनीकी रूप से शिक्षकों की भर्ती विभाग नहीं विश्वविद्यालय करता है, इसलिए समिति ने विश्वविद्यालय को इकाई मानते हुए 200 पॉइंट रोस्टर बनाया. इसमें पदों को इस क्रम में रखा गया कि वंचित तबक़ों को आरक्षण मिलना सुनिश्चित हो जाए. रोस्टर के तहत पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य श्रेणी के लिए रखा गया. इनके बाद चौथा पद ओबीसी के लिए आरक्षित किया गया. फिर पांचवां और छठवां पद सामान्य श्रेणी और सातवां पद एससी कैटिगरी के लिए रखा गया. वहीं, एसटी कैटिगरी के लिए चौदहवां पद आरक्षित किया गया. इस तरह इस फ़ॉर्मूले के ज़रिए विश्वविद्यालयों की शिक्षक नौकरियों में आरक्षण मिलना सुनिश्चित किया गया.

लेकिन अधिकतर विश्वविद्यालयों ने इस रोस्टर को स्वीकारने से इनकार कर दिया, क्योंकि उन्हें यह रोस्टर उस समय से लागू करना होता, जिस समय से उन्होंने आरक्षण लागू किया था. इसका मतलब यह हुआ कि उन्हें अतीत में ख़ाली रह गए उन आरक्षित पदों को भरना होता जिन पर आरक्षण नहीं लागू होने की वजह से (एससी-एसटी व ओबीसी) शिक्षक नहीं आ सके. इसलिए 200 पॉइंट रोस्टर को लागू करने के बजाय विश्वविद्यालय इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचे, जिसने पिछले साल फ़ैसला सुनाया कि अब शिक्षकों की भर्ती विश्वविद्यालयों को इकाई न मानते हुए, उनके विभागों को इकाई मानकर की जाए.

यहीं से इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई. विश्वविद्यालय की अपेक्षा विभाग के स्तर पर पदों की संख्या काफ़ी कम हो जाती है. इसलिए 200 पॉइंट रोस्टर की जगह 13 पॉइंट रोस्टर सामने आया. इसमें फ़ॉर्मूला पुराना वाला ही अप्लाई किया गया, लेकिन पदों की कम संख्या की वजह से आरक्षण न लागू होने पाने की संभावना बहुत ज़्यादा बढ़ गई. 13 पॉइंट रोस्टर का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि ज़्यादातर विभागों में पदों की संख्या 13 भी नहीं है, ऐसे में वंचित तबक़ों को आरक्षण नहीं मिल पाएगा और विश्वविद्यालयों में सामान्य वर्ग के शिक्षकों की अधिकता और बढ़ जाएगी.

इस मामले में मोदी सरकार पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

इकॉनॉमिक टाइम्स ने एक अध्ययन के आधार पर बताया है कि नए रोस्टर की वजह से विश्वविद्यालयों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षित पदों की संख्या 25 से 100 प्रतिशत तक कम हो सकती हैं. कारण वही है कि ज़्यादातर विभागों में उतने पद नहीं हैं कि सभी वंचित तबक़ों के शिक्षकों को आरक्षित पदों पर नौकरियां दी जा सकें. वहीं, संख्या के अनुपात के हिसाब से पहले से ही ज़्यादा प्रतिनिधित्व रखने वाले सामान्य वर्ग के शिक्षकों की संख्या में 25 से 40 फ़ीसदी तक का और इज़ाफ़ा हो सकता है.

यह नौबत आने के लिए दलित-आदिवासी चिंतक व संगठन मोदी सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं. उनका कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार और उसके मंत्रालयों की भूमिका संदिग्ध है. पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट का फ़ैसला आते ही यूजीसी ने इसके परिणाम को लेकर विचार किए बिना इसे सभी विश्वविद्यालयों में लागू करने का फ़रमान जारी कर दिया. बाद में विरोध के चलते केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. लेकिन वहां उसने कथित रूप से वंचित तबक़ों का पक्ष कमज़ोर तरीक़े से रखा. परिणामस्वरूप, बीते महीने सुप्रीम कोर्ट ने 13 पॉइंट रोस्टर के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिका ख़ारिज कर दी. इस तरह विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती इसी फ़ॉर्मूले के तहत किए जाने का रास्ता साफ़ हो गया.

मोदी सरकार पर आरोप है कि जिस तरह उसने एससी-एसटी एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट में कमज़ोर दलीलें पेश की थीं, उसी तरह 13 पॉइंट रोस्टर के ख़िलाफ़ उसने वंचित तबक़ों का पक्ष मज़बूती से नहीं रखा. इकॉनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट बताती है कि सरकार की अदालती तैयार अच्छी नहीं थी. उसने केवल तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों का डेटा अदालत के सामने रखा, जबकि उसके पास देशभर के विश्वविद्यालयों के आंकड़े मौजूद थे.

हालांकि अब सरकार ने 40 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से 20 विश्वविद्यालयों का डेटा इकट्ठा किया है, ताकि उसका विश्लेषण करने के बाद पुनर्विचार याचिका दायर कर शीर्ष अदालत को बताया जा सके उसके फ़ैसले के कितने गंभीर परिणाम हो सकते हैं. उधर, विश्वविद्यालयों को लेकर कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उन्होंने विभागों को इकाई मानते हुए ख़ाली पदों को भरना शुरू कर दिया है.