बीती तीन फरवरी की बात है. पश्चिम बंगाल में भाजपा की ओर से लोकतंत्र बचाने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनसभाएं होनी थीं. इनमें बड़ी संख्या में लोग जुट सकें, इसके लिए पार्टी ने पूरी तैयारी कर रखी थी. लेकिन स्थानीय प्रशासन ने आदित्यनाथ के हेलिकॉप्टर को जमीन पर उतरने की अनुमति नहीं दी. इस वजह से उन्हें वापस लखनऊ लौटकर फोन के जरिए बालुरघाट में लोगों को संबोधित करना पड़ा. इसके बाद चार फरवरी को योगी आदित्यनाथ सड़क मार्ग से बंगाल पहुंचे और वहां उन्होंने पुरुलिया में जनसभा को संबोधित किया.

पुरुलिया की जनसभा में आदित्यनाथ

योगी आदित्यनाथ की जनसभा न हो पाने से बालुरघाट के लोगों में निराशा के साथ-साथ राज्य सरकार के रवैये को लेकर गुस्सा भी था. इनमें से एक रबीन्द्र महतो का कहना था, ‘तृणमूल सरकार का यह रूख सही नहीं है. आदित्यनाथ को लोग देखना-सुनना चाहते थे. ममता जितना जनसभाओं को रोकेंगी, मोदी जी उतना आगे बढ़ेंगे.’ वहीं, पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव गणेश दास का मानना था कि पंचायत चुनाव में मतदाताओं को काफी डराया-धमकाया गया था, इस वजह से लोग अपना गुस्सा दिखाने के लिए भी भाजपा की जनसभाओं में जुट रहे हैं. गणेश दास की इस बात से बुजुर्ग महिला करुणा मंडल भी सहमत दिखती हैं.

पुरुलिया की जनसभा से पहले ममता बनर्जी ने आदित्यनाथ पर निशाना साधा था. उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पहले अपना राज्य संभालने की सलाह दी थी. इस संदर्भ में करुणा कहती हैं, ‘यह पार्टी के लोग को काम है कि किसको बुलाना है और किसको नहीं.’

लोकसभा चुनाव से पहले राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और इसकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी भारतीय जनता पार्टी के बीच जनसभाओं को लेकर टकराव की कहानी न तो यहां से शुरू होती है और न ही फिलहाल यह खत्म होती हुई दिख रही है. बीते महीने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा मालदा से चुनावी अभियान की शुरूआत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और आदित्यनाथ की कई जनसभाएं यहां हो चुकी हैं. इन्हें लेकर न सिर्फ दोनों पार्टियों के बीच हिंसक टकराव सामने आ चुके हैं बल्कि जनसभाओं को लेकर हो रहा चल रहा टकराव कानूनी लड़ाई का रूप भी ले चुका है.

यहां तक कि आठ फरवरी को होने वाली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभा के विरोध में भी छह किसानों ने प्राथमिकी दर्ज की है. जलपाईगुड़ी के इन किसानों का खेत प्रस्तावित सभास्थल के पास ही है. इस वजह से उन्हें इस बात की आशंका है कि जनसभा में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने पर उनकी फसलों को नुकसान हो सकता है. इन किसानों का कहना है कि भाजपा कार्यकर्ता उनके घर आकर सादे कागज पर दस्तखत ले गए थे.

हालांकि टीएमसी के स्थानीय नेता मनोज रॉय का का दावा है कि सभास्थल के पास के सभी किसान उनकी पार्टी के समर्थक है. ऐसे में वे देखेंगे कि भाजपा यहां कैसे सभा करती है. इससे पहले नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित सभा को रोकने के लिए तृणमूल ने संबंधित स्थल पर क्रिकेट टूर्नामेंट कराने की बात भी कही थी.

बीते हफ्ते राजनाथ सिंह की जनसभा को लेकर भी ऐसा ही विवाद हुआ था. उन्हें दो फरवरी को कूचबिहार के माथाभंगा में एक जनसभा को संबोधित करना था. इसके लिए भाजपा ने मेला मैदान की मांग की थी. लेकिन, प्रशासन ने इसे खारिज कर दिया. इसके बाद पार्टी के दो कार्यकर्ताओं ने जनसभा के लिए अपनी करीब 20 बीघे की जमीन उपलब्ध कराई थी. शनिवार को ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी दुर्गापुर में एक रैली संबोंधीत करनी थी और इसके लिए भी खेती की जमीन पर ही जनसभा स्थल तैयार किया गया था. बताया जाता है भारी भीड़ की संभावना को देखते हुए इसके लिए आस-पास के जंगलों को भी साफ करना पड़ा था.

राज्य में भाजपा की जनसभाओं को लेकर ममता बनर्जी की सरकार द्वारा कथित रुकावट को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ‘अलोकतांत्रिक और फासीवादी’ बताते हैं. वे इन मामलों को चुनाव आयोग के पास ले जाने की बात भी कहते हैं. रविशंकर प्रसाद का यह भी कहना था कि आदित्यनाथ के हेलिकॉप्टर को उतरने से रोकने का एकमात्र कारण तृणमूल कांग्रेस की घबराहट और डर है.

कई जानकारों का भी यह कहना है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा का आक्रामक चुनावी अभियान टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ाता हुआ दिख रहा है. ऐसे में वे इससे निपटने के लिए हर जरूरी-गैर जरूरी पैंतरे आजमा सकती हैं. इनके मुताबिक जनसभाओं को लेकर पार्टियों के बीच इस तरह का संघर्ष हालिया इतिहास में देखने को नहीं मिला है और आने वाले समय में ऐसी घटनाएं और भी बढ़ सकती हैं. अगर ममता बनर्जी की सरकार प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और भाजपा अध्यक्ष के साथ ऐसा कर सकती है तो बाकी के नेताओं के मामले में वो किसी भी हद तक जा सकती है. और ऐसा भी माना ही जाता है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को राजनीति में हर तरह के दांव-पेंच आजमाने से कोई गुरेज नहीं है.

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव का रंग बाकी राज्यों से काफी अलग देखने को मिलने वाला है.