वैसे तो देश के सभी राज्यों में ही लोकसभा चुनाव के मद्देजनर सियासी सरगर्मियां तेज हो रही हैं, लेकिन इनमें भी पश्चिम बंगाल का राजनीतिक पारा कुछ ज्यादा ही चढ़ा दिख रहा है. हाल में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा कोलकाता पहुंचे हुए थे. इस दौरे का मकसद था आम चुनाव की तैयारियों का जायजा लेना. इस दौरान विपक्षी दलों ने राज्य में चुनाव की निष्पक्षता को लेकर चिंता जताई. कांग्रेस का कहना था कि चुनाव से एक महीने पहले राज्य में ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा बल तैनात कर दिए जाने चाहिए. पार्टी का मानना है कि इससे मतदान से पहले लोगों में सुरक्षा को लेकर विश्वास की बहाली हो पाएगी.
उधर, भाजपा ने भी इसी तरह की मांग की. बल्कि उसने एक कदम आगे जाकर यह भी कहा कि इन सुरक्षा बलों का नियंत्रण राज्य प्रशासन के हाथ में नहीं रहना चाहिए. भाजपा ने इन चुनावों की निगरानी के लिए केंद्रीय पर्यवेक्षक तैनात करने की भी मांग की. वाम दलों ने भी आम चुनाव के दौरान हिंसा की आशंका जताई.
इन दलों के इस रुख के पीछे की वजह बीते साल पंचायत चुनाव को माना जा रहा है. तब राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच बड़ी संख्या में हिंसक झड़पों की खबरें आई थीं. इस दौरान मतदान को भी प्रभावित करने की कोशिशें की गई थीं. साथ ही ये आरोप भी लगे थे कि सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के कार्यकर्ताओं ने दूसरे दलों के उम्मीदवार को नामांकन पर्चा तक नहीं भरने दिया. हालांकि अपने-अपने क्षेत्र में प्रभावशाली अन्य दलों के उम्मीदवारों ने भी इसी तरह की कोशिशें की थीं. लेकिन ऐसा करने वालों में ज्यादातर टीएमसी के उम्मीदवार ही थे. चुनावी नतीजे इसकी पुष्टि करते दिखे थे. करीब एक-तिहाई सीटों पर टीएमसी के उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए थे.
विपक्ष की मानें तो लोक सभा चुनाव के दौरान भी ऐसा हो सकता है. उसके मुताबिक राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सरकारी मशीनरी पर अपने नियंत्रण के जरिये अपने हित साध सकती हैं. उधर, कोलकाता आए मुख्य चुनाव आयुक्त ने विपक्षी दलों को भरोसा दिलाया कि किसी को वोट डालने से रोका न जा सके, इसके लिए हरमुमकिन इंतजाम किया जाएगा.
लेकिन विपक्षी दलों के इतर पश्चिम बंगाल के आम लोग आम चुनाव की निष्पक्षता को लेकर क्या सोचते हैं? सत्याग्रह ने जमीन पर जाकर मतदाताओं के मन की बात टटोलने की कोशिश की. इनमें से अधिकांश का मानना था कि आम चुनाव में हालात पंचायत चुनाव से अलग होंगे. मालदा जिले के खिड़की गांव में रहने वाले हुसैन कहते हैं, ‘केंद्र वाले चुनाव में किसी तरह की धांधली नहीं हो पाएगी. इसमें बड़ी संख्या में बाहर से फोर्सेज तैनात होता है. इसलिए इसमें किसी भी धांधली नहीं चल सकती है.’ पेशे से मछुआरे हुसैन ने यह भी बताया कि पंचायत चुनाव के दौरान टीएमसी के लोगों ने उनके भाई के साथ मारपीट की थी जिसने उस चुनाव में कांग्रेस को वोट देने की बात मानी थी.

चुनावों को प्रभावित करने में सत्ताधारी टीएमसी के लोगों के शामिल होने की बात केवल हुसैन ही नहीं करते. ऐसे ज्यादातर लोगों में टीएमसी के खिलाफ जाने को लेकर एक तरह का डर भी दिखता है. इसकी वजह से वे खुलकर अपनी बात जाहिर करने से भी बचते हैं. यहां तक कि मालदा के बलूरघाट में भाजपा के सदस्य मुकुल रॉय से जब उनकी तस्वीर की मांग की जाती है तो वे आशंका जाहिर करते हैं कि पहचान जाहिर होने पर टीएमसी के लोग उनकी पिटाई भी कर सकते हैं. फरक्का के इंसान शेख कहते हैं, ‘पंचायत चुनाव में तृणमूल के नेता मतदाताओं से कहते थे कि बूथ पर जाते वक्त उन्हें दीदी का उन्नयन (विकास) भी दिखेगा, उसे ध्यान में रखना है. इस बात का मतलब चेतावनी होता था.’
वहीं, मालदा जिले के ही अदीना इलाके में रहने वाले दिलीप मंडल आम चुनाव में साफ-सुथरे चुनाव की उम्मीद जाहिर करते हैं. वे कहते हैं, ‘इस बार किसी की धांधली नहीं चल पाएगी. सेंटर से फोर्स होने की वजह से कोई गलत नहीं कर सकता.’ ई-रिक्शा चालक दिलीप चुनाव में धांधलियों के खिलाफ लोगों में एकजुटता का दावा भी करते हैं. वे कहते हैं, ‘इस बार चुनावों में किसी की भी गुंडागर्दी नहीं चलेगी. मानुष (लोग) का मन जिसको वोट करने का करेगा, उसको देगा.’

हालांकि, बांग्लादेश की सीमा से लगे कस्बे गौड़ के मोहम्मद मुश्ताक शेख चुनावों में पार्टियों द्वारा धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल की आशंका से इनकार नहीं करते. वे कहते हैं, ‘जिसके पास ज्यादा पैसा और गुंडा होगा, जीत का सेहरा भी उसी के माथे पर सजेगा.’ शेख और कुछ दूसरे लोगों की बातों से संकेत मिलता है कि चुनावों के दौरान गड़बड़ी की आशंका सिर्फ टीएमसी की तरफ से नहीं है, अन्य दलों के नेता और कार्यकर्ता भी इसमें शामिल हो सकते हैं.

चुनावों में गड़बड़ी की शिकायतें पश्चिम बंगाल में आम हैं. लेकिन इन पर पुलिस का क्या रुख रहता है? सत्याग्रह से बातचीत में ज्यादातर लोग जो कहते हैं उसका लब्बोलुआब यह है कि पुलिस तो खुद ही इसमें शामिल होती है. हालांकि, वे सीधे-सीधे तो नहीं कहते लेकिन, उनकी बातें यही संकेत देती हैं कि पुलिस तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता के रूप में काम करती है. पिछले साल पंचायत चुनावों के दौरान भी राज्य पुलिस की भूमिका सवालों के घेरे में रही थी.
सुनील अरोड़ा ने इस महीने की शुरुआत में चुनाव तैयारियों को लेकर कोलकाता में जो बैठक बुलाई थी उसमें कोलकाता के पुलिस आयुक्त राजीव कुमार मौजूद नहीं थे. इस पर मुख्य चुनाव आयुक्त ने नाराजगी जताई थी और राज्य के मुख्य सचिव से इस बारे में जवाब तलब किया था. इसके बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पुलिस आयुक्त के छुट्टी पर होने की बात कहकर आयोग से माफी मांगी थी. राजीव कुमार को मुख्यमंत्री का करीबी अधिकारी माना जाता है और राज्य के सियासी पारे में जिस उफान की बात रिपोर्ट की शुरुआत में हुई उसका लेना-देना इन्हीं से है. हाल में सीबीआई की एक टीम शारदा चिटफंड घोटाले के सिलसिले में राजीव कुमार से पूछताछ करने कोलकाता स्थित उनके घर पहुंची थी. लेकिन पुलिस ने उल्टे इस टीम को हिरासत में ले लिया. इसके बाद ममता बनर्जी भाजपा शासित केंद्र सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते हुए धरने पर बैठ गई थीं.
बीते तीन हफ्तों के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा नेतृत्व की सक्रियता बताती है कि 2019 के चुनाव के मद्देनजर उसके लिए यह राज्य कितना अहम हो गया है. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद लोकसभा की सबसे अधिक (42) सीटें यहीं हैं. 2014 में मोदी लहर के बाद भी भाजपा इनमें से सिर्फ दो सीटें ही जीत पाई थी. हालांकि, बीते चार वर्षों के दौरान उसने अपना दायरा काफी बढ़ाया है और अब उसे सत्ताधारी टीएमसी की सबसे बड़ी प्रतिद्वंदी कहा जा रहा है. उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन के बाद भाजपा को सबसे अधिक उम्मीद पश्चिम बंगाल से दिख रही है. इस लिहाज से पार्टी ने 42 में से 21 यानी आधी सीटों पर जीत हासिल करने का लक्ष्य रखा है. इसे हासिल करने के लिए भाजपा चुनावों में धांधली को भी बड़ा मुद्दा बनाती हुई दिख रही है. वह इसका हवाला देकर ममता बनर्जी सरकार को फासीवादी और अलोकतांत्रिक बताने की कोशिश करती दिख रही है.
उधर, भाजपा के अलावा कांग्रेस और वामदलों के लिए पश्चिम बंगाल में 2019 का चुनाव अपने-अपने अस्तित्व को बचाने का भी संघर्ष दिखता है. इन दलों के अधिकांश नेता और कार्यकर्ता सत्ताधारी टीएमसी और अपना प्रभाव बढ़ा रही भाजपा में शामिल हो चुके हैं. इस लिहाज से इन दलों के लिए निष्पक्ष चुनाव कहीं अधिक जरूरी दिखते हैं. इंसान शेख कहते हैं, ‘वाम दलों में अब केवल लाल झंडा उठाने वाले बूढ़े लोग बचे हैं. कांग्रेस की ताकत भी पहले से कम हुई है.’ इन दलों के नेताओं द्वारा चुनाव आयोग के सामने की गई फरियाद से भी इसका संकेत मिलता है.
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