कुछ समय पहले खबर आई कि खराब होते सामाजिक माहौल के चलते सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों के लिए निष्पक्ष फ़ैसले लेना मुश्किल होता जा रहा है. यह हैरत और चिंता की बात है क्योंकि न्याय की अवधारणा का आधार ही निष्पक्षता है. अगर यह निष्पक्षता ही कसौटी पर है तो प्रेमचंद के ‘पंच परेम्श्वर’ को पढ़ा जाए या फिर मोहम्मद करीम छागला की जीवनी को.

एमसी छागला बॉम्बे हाई कोर्ट के न्यायाधीश थे. कह सकते हैं कि भारतीय न्यायपालिका में वे एक तरफ़ हैं और बाकी दूसरी तरफ. किसी अन्य न्यायाधीश का भारत के सामाजिक, राजनैतिक और संवैधानिक परिदृश्य में उतना प्रभाव नज़र नहीं आता, जितना उनका. एमसी छागला पहले वकील थे और फिर न्यायाधीश बने. रिटायरमेंट के बाद वे एक अंतराष्ट्रीय अदालत के जज हुए. फिर भारतीय राजदूत और उच्चायुक्त और इसके बाद केंद्रीय मंत्री. आखिर में सब छोड़-छाड़कर जीवन के अंतिम दिनों में वे फिर से वकालत करने लगे.

एमसी छागला कानून और कोर्ट को कितनी अहमियत देते थे इसकी बानगी के रूप में तीन किस्से याद किए जा सकते हैं. पहला किस्सा महाराष्ट्र का है. नवनियुक्त गवर्नर का स्वागत होना था. प्रोटोकॉल के तहत हर गणमान्य को उनसे पहले राजनिवास पर उपस्थित होना था. बतौर मुख्य न्यायाधीश छागला और उनके सहयोगी जज कोर्ट की कार्यवाही ख़त्म होने के बाद ही पहुंचे. इसी तरह एक बार उन्हें अमेरिका के मुख्य न्यायाधीश की बॉम्बे एयरपोर्ट पर अगुवानी करनी थी. एमसी छागला ने सरकार से कह दिया कि वे कोर्ट का समय पूरा होने के बाद ही जायेंगे. तीसरा किस्सा तब का है जब लार्ड माउंटबेटन पहली बार बॉम्बे आ रहे थे. एक बार फिर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए एमसी छागला उनके स्वागत के लिए नहीं गए. वजह वही, कोर्ट का वक्त.

कम ही लोगों को पता होगा कि 30 सितंबर 1900 को मुंबई (तब बंबई) के एक कारोबारी परिवार में जन्मे एमसी छागला
का असली उपनाम मर्चेंट था. अपने दादा से उन्होंने एक बार कहा कि ‘मर्चेंट’ शब्द उन्हें नहीं भाता. दादा ने उन्हें ‘छागला’ नाम दे दिया. अपनी आत्मकथा ‘रोज़ेज़ इन दिसंबर’ में उन्होंने इसका जिक्र किया है. उनके मुताबिक ‘छागला’ का गुजराती में मतलब होता है प्यारा बच्चा!

एमसी छागला की वैचारिक शख्सियत को हम तीन भागों में बांट सकते हैं- सभी समुदायों को साथ रखकर राष्ट्रप्रेम का पालन, निजी स्वतंत्रता और लोकतंत्र के अंतर में निहित मनुष्य की निजता के लिए प्रेम, और व्यक्ति बनाम राज्य और व्यक्ति बनाम व्यक्ति के बीच न्याय का पालन.

एमसी छागला ने 1922 में अपनी वकालत शुरू की थी. शुरुआती 7-8 साल उन्होंने दिक्कतों में गुज़ारे. रोज़ कोर्ट जाना, लाइब्रेरी में ख़ाली बैठे रहना. न काम न काज. अपनी जीवनी में वे लिखते हैं कि ऐसा भी दौर आ गया जब फ़ाके काटने की नौबत आई. फिर धीरे-धीरे कुछ काम मिलने लगा और 1941 तक वे ख़ासे मशहूर हो गए. फ़रवरी 1941 की एक शाम उनके जीवन की सबसे यादगार शाम थी जब बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायधीश सर जॉन ब्युमोंन ने उन्हें हाई कोर्ट का न्यायाधीश बनने का ऑफ़र दिया. कुछ साल बाद, 15 अगस्त 1947 को एमसी छागला बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बनाये गए. वे देश के पहले मुख्य न्यायाधीश भी थे. आपको बता दें कि तब सुप्रीम कोर्ट नहीं बना था. उसकी स्थापना 26 जनवरी, 1950 को हुई थी.

बॉम्हे हाई कोर्ट के उच्च न्यायाधीश के तौर पर एमसी छागला ने कई यादगार फ़ैसले सुनाए. एक दफ़ा उनके सामने हिंदू बहुविवाह का केस आया. दलील थी कि जब मुसलमान कई विवाह कर सकते हैं तो फिर हिंदुओं को भी यह अधिकार मिलना चाहिए. छागला ने निर्णय देते हुए कहा ‘बहुविवाह निजता हो सकती है पर संविधान में सिर्फ़ एक ही विवाह का प्रावधान होना चाहिए. अदालत मुसलमानों के भी बहुविवाह की पक्षधर नहीं है. कानून सभी के लिए एक होना चाहिए.’ एमसी छागला का आगे कहना था कि वे सामाजिक न्याय की सरकार की पहल में हिंदुओं से की जा रही शुरुआत के पक्षधर हैं और आने वाले समय में यह पहल हर धर्म के मानने वालों पर लागू होनी चाहिए.

मशहूर कानूनविद नानी पालकीवाला ने भी अपनी किताब ‘वी द पीपल’ में एमसी छागला को याद किया है. उनका कहना था कि आयकर नियमों पर छागला का काम ब्रिटिश जज रॉलेट से भी बड़ा है. एमसी छागला द्वारा दिए निर्णयों से उनकी बुद्धिमता और सुसंस्कृत दिमाग का पता चलता है जो दूरदर्शी और कानून को लेकर मानवीय दृष्टिकोण रखने वाला था. आज बेंचों के फ़ैसले बहुमत के आधार पर तय किये जा रहे हैं लेकिन, एमसी छागला के दौरान बेंचें एकराय से फ़ैसले देती थीं.

जहां तक दबाव का सवाल है तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई से कई बार उनका सैद्धांतिक टकराव हुआ. एमसी छागला किसी दबाव में नहीं आये और न्याय को सर्वोपरि मानते हुए अपना काम करते रहे. शराबबंदी को लेकर दोनों में एक राय नहीं थी. एमसी छागला का मानना था कि सरकार को किसी व्यक्ति की निजता पर चोट करने का अधिकार नहीं है, कौन क्या खाए-पीये यह उसकी अपनी पसंद है. किस्सा है कि एक बार दोनों किसी मेहमान के यहां डिनर पर थे. उस दिन एमसी छागला ने सरकार के ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला दिया था. मोरारजी ने उन्हें वहां देखा तो वे उखड़ गए. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि क्या वे हमेशा ही सरकार विरोधी फ़ैसले देते रहेंगे. इस पर एमसी छागला ने आपा खोते हुए, मेज़बान और अन्य मेहमानों की मौजूदगी में कहा कि बेहतर होगा मोरारजी अपना काम करें और हाई कोर्ट को अपना काम करने दें. खुल्लम-खुल्ला हुई यह बहस अगले दिन अखबारों की सुर्ख़ियों में थी.

मोरारजी देसाई के साथ हुए टकराव का छागला ने अपनी जीवनी में भी खुलकर जिक्र किया था. मोरारजी देसाई के एक पत्र के जवाब में उन्होंने लिखा था, ‘आप और मैं कोई मायने नहीं रखते. हमारी व्यक्तिगत मान्यताएं भावी पीढ़ी के भविष्य के सामने कहीं नहीं टिकतीं. ख़ुदा के वास्ते हम कोई ऐसा काम न करें जो देश के भविष्य के लिए ठीक न हो.’

सैद्धांतिक मतभेद होने के बावजूद एमसी छागला मोरारजी के कायल थे. किस्सा है कि एक बार उन्होंने जज की नियुक्ति के लिए एक ऐसे वकील का नाम मोरारजी को भेजा जो हिंदू महासभा से जुड़ा था. मोरारजी बोले कि कट्टर विचारधारा वाले व्यक्ति को जज कैसे बनाया जा सकता है. एमसी छागला ने जवाब दिया कि वे सिर्फ उसकी कार्यकुशलता और न्याय निष्पादन की क्षमता को परखते हैं, उन्हें राजनैतिक या धार्मिक विचारधारा से सरोकार नहीं है. एमसी छागला ने यह बात सर जॉन ब्युमोंन से सीखी थी. इंडियन नेशनल कांग्रेस से राजनैतिक प्रतिबध्दता होने के बावजूद ब्युमोंन ने छागला की क़ाबिलियत को देखते हुए ब्रिटिश सरकार से उन्हें न्यायाधीश बनाये जाने की सिफ़ारिश की थी.

1958 में एमसी छागला ने न्यायप्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए एक अभूतपूर्व काम किया. भारतीय जीवन बीमा निगम वाला केस यकीनन उनके जीवन के सबसे अहम केसों में से एक था. मामले की सुनवाई खुले में हुई, लाउडस्पीकर लगवाए गए ताकि लोग अदालती कार्रवाई सुन सकें. जवाहरलाल नेहरू इस बात से ख़फ़ा हो गए थे. एमसी छागला ने वित्त मंत्री टीटी कृष्णामचारी को इस मामले में दोषी पाया था. नेहरू को न चाहते हुए भी उनसे इस्तीफ़ा मांगना पड़ा.

हालांकि इससे उपजी कड़वाहट के बावजूद जवाहरलाल नेहरू जानते थे कि छागला जैसे व्यक्ति देश के लिए पूंजी हैं. हाई कोर्ट से रिटायर होने के बाद वे अमेरिका में भारतीय राजदूत नियुक्त किये गए और फिर इंग्लैंड में भारतीय उच्चायुक्त. इन कार्यकालों के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री ने उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का प्रस्ताव दिया. पार्टी सदस्य बाहरी व्यक्ति के आने पर सहमत नहीं थे. बावजूद इसके और एलआईसी मामले में सरकार के विरुद्ध फ़ैसला लिखने के बाद भी नेहरू ने उन्हें पार्टी में शामिल किया.

तत्कालीन सांसद महावीर त्यागी ने उनके चयन पर नेहरू को ख़त लिखकर आपत्ति जताई थी. जवाब में उन्होने लिखा ‘छागला के नाम पर आपत्ति ग़लत है. उनका देशप्रेम और खुले विचार सर्वविदित हैं. बतौर अमेरिका में भारतीय राजदूत और लंदन में उच्चायुक्त के तौर पर उन्होंने देश का मान बढ़ाया है. वे ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें कोई भी काम दिया जाए वे उसमें सफल होंगे...गांधीजी भी छागला को उच्च विचारों वाला व्यक्ति मानते थे. मैं अपने जीवन काल में ऐसे कम ही लोगों से मिला हूं जो छागला जैसे धर्म निरपेक्ष वादी हैं. जब मैंने राष्ट्रपति को बताया कि मैं उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल करना चाहता हूं तो उन्होंने स्वयं उनकी तारीफ़ की.’

जहां नेहरू दूरदर्शी थे वहीं इंदिरा गांधी तात्कालिक लाभ में यकीन करती थीं. 1967 में इंदिरा ने कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में प्रांतीय भाषाओं में पढ़ाई कराने का प्रस्ताव पारित करवाया था. एमसी छागला ने इसका विरोध किया और मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया. नवंबर 1969 अहमदाबाद में दंगे हुए थे. संसद में इसके ख़िलाफ़ बोलते हुए उन्होंने अपने जीवन का सबसे यादगार भाषण दिया. उन्होंने कहा ‘भारतीय दर्शन का आधार हिंदू या मुसलमान नहीं बल्कि सहिष्णुता है...अगर हिंदुओं का कर्तव्य है कि वे अल्पसंख्यकों को साथ रखें तो अल्पसंख्यकों को भी हिंदुओं को यकीन दिलाना होगा कि वे देश का हिस्सा है. भरोसा दिलाना सिर्फ़ बहुसंख्यकों की ज़िम्मेदारी नहीं है. ये दोतरफ़ा कोशिश है. लाखों हिंदू मुसलमानों को शक़ की निगाह से देखते हैं. मुसलमानों को ये शक़ दूर करना होगा.’

इसी भाषण में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफार्म सिविल कोड पर उन्होंने कहा, ‘मैं ही नहीं, कई और मुसलमान इसके पक्ष में हैं. ये नियम या नीति निर्देशक तत्व नहीं है. इसे लागू किया जाना संविधान का निर्देश है. सरकार का यह कहना कि यह सबकी सहमति से होना चाहिए, ढुलमुल और ग़लत रवैया है. अगर इसका लागू किया जाना देशहित में है तो इसे लागू किया जाए. सरकार को एक वर्ग के कुछ लोगों की परवाह नहीं करनी चाहिए.’

1969 में इंदिरा गांधी सरकार ने मोरक्को की राजधानी रबात में हुए विश्व इस्लामिक सम्मलेन में भारतीय मुस्लिम शिष्टमंडल भेजा. विपक्ष ने इस बात पर सरकार की खिंचाई की. तत्कालीन वित्त मंत्री ने हल्के स्तर पर जाकर कहा कि कुछ मुसलमान दोस्तों की सलाह पर रबात में शिष्टमंडल भेजा गया था. एमसी छागला, जो कि कांग्रेस से अलग हो चुके थे, ने संसद में धर्म-निरपेक्षता की सबसे ऊंची मिसाल पेश करते हुए वित्त मंत्री से पूछा ‘मुसलमान दोस्तों से आपका आशय क्या है? ये बात कहकर आप धार्मिक द्वेष फैला रहे हैं. आप हिंदुओं को ये महसूस कराना चाहते हैं कि मुसलमानों के कहने पर ऐसा किया गया. ऐसे मसलों पर भारतीयों से राय ली जानी चाहिए, हिंदुओं और मुसलमानों से नहीं.