न जाने कितनों को लाचार बनाने वाली महंगाई कभी-कभी खुद भी लाचार हो सकती है.
तोड़-मरोड़कर
तोड़-मरोड़कर
मैं - जा न! जा वहां!
महंगाई- न बाबा न!
मैं - चार साल हो गए, तू वहां गई ही नहीं.
महंगाई - वे मुझे पास फटकने नहीं देते. कैसे जाऊं!
मैं - तू बता फिर, अब मैं क्या खाऊं!
महंगाई - खा तो रहा है!
मैं - क्या!
महंगाई - मेरा भेजा!
मैंने उससे जाने के लिए सिर्फ कहा ही नहीं, बाकायदा उसे जोर लगाकर धकेला भी ताकि वह वहां पर चली जाए. लेकिन हम जैसों के धकेलने से वह कहां हिलने वाली.
यह कह महंगाई अट्टहास करने लगी. अपने हास्यबोध पर या मेरी हास्यास्पद स्थिति पर! शायद दोनों पर! जानते हैं आप, महंगाई को मैं कहां जाने के लिए कह रहा था! सच कहूं तो सिर्फ उससे कहा ही नहीं, बाकायदा उसे जोर लगाकर धकेला भी ताकि वह वहां पर चली जाए. लेकिन हम जैसों के धकेलने से वह कहां हिलने वाली. बल्कि उसके धक्के से हम जैसे कितने आज हाशिए पर आ गए हैं.
मुझे ही उल्टी गंगा बहाने की न जाने क्या सूझी! जिनके धकेलने से वह भागेगी वे संसद के अंदर ढपे हैं. संसद की कैंटीन की सुस्वादु थाली का आनंद ले रहे हैं. भोजन करते हुए वे अवश्य ही हमारे विषय में सोचते होगें कि इन्हें गरीबी रेखा से बाहर कैसे निकाला जाए. महंगाई से बचाने के लिए सरकारी आंकड़ों के कांटे से हम गरीबों को कैसे ऊपर उठाया जाए. कई दफा मैंने महंगाई को याद दिलाया कि चार साल से ऊपर हो गए मगर संसद की कैंटीन में तेरा गृहप्रवेश तक नहीं हुआ. मैंने उलाहना भी दिया कि क्या हमारे घरों पर ही डेरा डाले रहेगी! निगोड़ी तू टले तो हमारी भी दाल गले! इतना सब होने के बाद भी संसद की कैंटीन में घुसने की उसकी हिम्मत नहीं. उसने बस इतना कहा कि भइया सब्सिड़ी कुछ जगह छोड़े तो मुझे पांव रखने की जगह मिले. अब बता मैं क्या करुं!
महंगाई को यूं लाचार देखना सुखद लगा. सच कहूं तो यह सब जादू-सा लगा. महंगाई ‘डायन’ नहीं किसी बाल मजूदर की तरह मजबूर दिखी. कभी सपने में नहीं सोचा था कि वह भी लाचार हो सकती है! जैसे कभी सपने में नहीं सोचा था कि मांसाहारी थाली सिर्फ तैंतीस रुपये में मिल सकती है. दाल फ्राई सिर्फ चार रुपये में और बढ़िया वाला मसाला डोसा छह रुपये में. न चाहते हुए भी हमारा मन अपनी स्मृतियों की कंदराओ में भटकने लगता है, जहां महंगाई के हाथों मारे गए न जाने कितने पूर्वजों की अतृप्त आत्माएं कैद हैं.
कई दफा मैंने महंगाई को याद दिलाया कि संसद की कैंटीन में तेरा गृहप्रवेश तक नहीं हुआ. उसने बस इतना कहा कि भइया सब्सिड़ी कुछ जगह छोड़े तो मुझे पांव रखने की जगह मिले.
बढ़िया जम्हूरियत है! जब महंगाई हमारी कमर तोड़ती है, तो हमारे जनप्रतिनिधि संसद की सस्ती थाली पर टूटते हैं. हमसे-आप से रसोई गैस की सब्सिडी छोड़ने की भारी अपेक्षाएं है और सर्वशक्तिमान लोगों को सहूलियत देने के लिए ‘मानवीय आधारों’ की कमी नहीं.
मैं महंगाई से ही पूछता हूं.
बता हम जैसे क्या करें!
महंगाई - योग कर.
मैं - इससे क्या होगा!
महंगाई - शरीर निरोग होगा.
मैं - भूखे पेट?
यह सुनते ही महंगाई का मुंह बन गया.
संसद की सब्सिडी युक्त, महंगाई विहीन थाली को देखकर, नहीं उसके बारे में पढ़कर, हम-आप क्या करें! फौरी तौर पर दो विकल्प नजर आते हैं. या तो जम्हूरियत के इस खेल में जमूरे की तरह ताली बजाएं. या पिछले कई सालों से जो करते आ रहे हैं, वही करें. साथ में चाहें तो दांत भी किटकिटा सकते हैं.