अमेरिका ने मध्यवर्ती दूरी की परमाणु मिसाइलों पर रोक लगाने वाली रूस के साथ हुई 32 वर्ष पुरानी ‘आईएनएफ’ (इंटरमीडिएट न्यूक्लियर फ़ोर्स) संधि से खुद को अस्थायी रूप से अलग कर लिया है. यह घटना बीते हफ्ते की है लेकिन इसकी पृष्ठभूमि बीते साल ही तैयार हो गई थी जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया था कि रूस इस संधि का ईमानदारी से पालन नहीं कर रहा. उनकी सरकार ने दिसंबर में कह दिया था कि अगर रूस अगले 60 दिनों में इस संधि के पालन की तरफ नहीं लौटता तो अमेरिका इस संधि से पीछे हट जाएगा.

इसके बाद एक फ़रवरी को राष्ट्रपति ट्रंप और उनके विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अब अपने आप को इस संधि से बंधा हुआ महसूस नहीं करता. वाशिंगटन में एक पत्रकार सम्मेलन बुलाकर विदेशमंत्री पोम्पियो ने इसकी औपचारिक पुष्टि करते हुए कहा, ‘यह संधि सैन्य-दृष्टि से हमारे लिए नुकसानदायक हो गई है. रूस वर्षों से बेशर्मी के साथ इसका उल्लंघन कर रहा है. इससे हमारा यह कर्तव्य बन जाता है कि हम इसका समुचित उत्तर दें.’

आशा की एक क्षीण किरण

हालांकि पोम्पियो ने यह नहीं कहा कि इस घोषणा के साथ अमेरिका ‘आईएनएफ’ संधि को पूरी तरह त्याग रहा है या उसे मृत घोषित कर रहा है. आशा की एक क्षीण किरण जीवित रखते हुए उन्होंने कहा कि रूस ने यदि अगले छह महीनों में अपनी नीति में कोई सुधार नहीं किया तो अमेरिका इस संधि को त्याग देने के लिए बाध्य हो जाएगा.

अमेरिका की ओर से इस घोषणा के दूसरे ही दिन रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी यह कहने में कोई देर नहीं लगाई कि यदि ‘हमारे अमेरिकी साथी संधि में अपनी भागीदारी स्थगित कर रहे हैं तो हम भी अपनी भागीदारी स्थगित कर देते हैं... इस बारे में हमारे सभी सुझाव पहले की ही तरह अब भी मेज़ पर रखे रहेंगे. वार्ताओं के लिए दरवाज़े भी खुले रहेंगे.’

इस दौरान पुतिन ने कटाक्ष भी किया कि ‘हम तब तक प्रतीक्षा करेंगे जब तक हमारे (अमेरिकी) साथी इस विषय पर हमारे साथ बराबरी के स्तर पर सार्थक वार्ताएं करने लायक परिपक्व नहीं हो जाते.’ उन्होंने चेतावनी दी कि अब रूस भी नए हथियार बनाने में जुट जाएगा.

आईएनएफ संधि तीन दशक से चली आ रही थी

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और भूतपूर्व सोवियत कम्युनस्ट पार्टी के महासचिव मिख़ाइल गोर्बाचोव ने 8 दिसंबर 1987 के दिन अमेरिका के राष्ट्रपति भवन व्हाइट हाउस में आईएनएफ संधि पर हस्ताक्षर किए थे. यही वजह है कि इसे ‘वॉशिंगटन निरस्त्रीकरण संधि’ के नाम से भी जाना जाता है. एक जुलाई 1988 के दिन मॉस्को में अंतिम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर के साथ यह संधि प्रभावी हुई थी.

‘आईएनएफ’ संधि भूमि पर से छोड़ी जा सकने वाली ऐसी सभी परमाण्विक ही नहीं, ग़ैर-परमाण्विक मिसाइलों पर भी रोक लगाती है, जिनकी मारक दूरी 500 से 5,500 किलोमीटर के बीच है. लेकिन समुद्र से छोड़ी जा सकने वाली ऐसी ही प्रणालियां इस संधि के दायरे में नहीं आतीं. इस तथाकथित मध्यवर्ती दूरी को संधि का मुख्य आधार बनाने के पीछे एक बड़ा कारण था.

पांच से दस मिनट का कीमती समय

अमेरिका और उसके नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन के पश्चिमी यूरोपीय सदस्य देश नहीं चाहते थे कि 1980 के दशक वाले सोवियत संघ के पास ऐसी मिसाइलें हों जो पांच से दस मिनटों में ही पश्चिमी यूरोप पहुंचकर बर्लिन, पेरिस या लंदन जैसे शहरों को जमींदोज़ कर दें. मिसाइल दागे जाने के बाद इतने कम समय में, सारे संदेहों से परे, उनकी अचूक पहचान करते हुए उनकी कोई काट निकालना या पश्चिमी यूरोप की जनता को अपने बचाव की समय रहते चेतावनी देना संभव नहीं था.

1980 वाले दशक में अकेले सोवियत संघ ने ही अपनी पश्चिमी सीमा के निकट ऐसी परमाणु मिसाइलें तैनात नहीं की थीं. उनका मुंहतोड़ जवाब देने के लिए अमेरिकी नेतृत्व वाले नाटो सैन्य संगठन के पश्चिमी यूरोपीय देशों में भी 7,300 परमाणु बम और उन्हें ले जाने वाली अमेरिकी मिसाइलें तैनात थीं. जाहिर है कि इनके निशाने पर सोवियत संघ था. तब दोनों पक्ष परमाणविक बारूद के एक ऐसे ढेर पर बैठे हुए थे, जिसमें किसी भी छोटी-सी चिंगारी से भयंकर विस्फोट हो सकता था.

तब जर्मनी में सबसे अधिक अमेरिकी हथियार तैनात थे

जर्मनी उस समय एक विभाजित देश था. सोवियत संघ को निशाना बनाते हुए सबसे अधिक अमेरिकी परमाणु हथियार, नाटो सैन्य संधि के अंतर्गत, तत्कालीन पश्चिमी जर्मनी की भूमि पर जमा किए गए थे. इतिहासकारों का अनुमान है कि उनकी कुल संख्या 5,000 से अधिक थी. अमेरिका के अलावा एक अज्ञात संख्या में ब्रिटेन और फ्रांस के परमाणु हथियार भी पश्चिमी जर्मनी में बने 130 अधिक से बंकरों में रखे गए थे. दूसरी ओर सोवियत संघ ने भी अपनी पश्चिमी सीमा के अलावा, पू्र्वी जर्मनी में कम से कम चार स्थानों पर 54 परमाणु बम और उनके लिए आवश्यक रॉकेट तैनात कर रखे थे.

इस सब से जर्मन जनता बहुत बेचैन थी. आम लोगों को ही नहीं, सैन्य-विशेषज्ञों को भी डर लगने लगा कि ग़लती से या हड़बड़ी में तुरंत मुंहतोड़ जवाब देने के चक्कर में यदि नाटो ही सबसे पहले अपना कोई परमाणु हथियार चला बैठे तब क्या होगा! इसके चलते तब पश्चिमी जर्मनी में परमाणु हथियार विरोधी एक प्रबल शांति-आंदोलन उठ खड़ा हुआ.

तीसरे विश्व युद्ध से यूरोप बाल-बाल बचा

इन्हीं हालात में 1983 की पतझड़ ऋतु के दौरान यूरोप तीसरे विश्व युद्ध में फंसते-फंसते बचा था. तब नाटो का एक बड़ा युद्धाभ्यास चल रहा था. इसकी वजह से सोवियत सेना को लगा कि नाटो का हमला होने जा रहा है और वहां की सरकार ने अपनी परमाणु हथियारों वाली इकाई को तैयार रहने के निर्देश दे दिए. इसी के साथ ब्रिटेन में रूसी गुप्तचर सेवा ‘केजीबी’ के जासूसों से पूछा गया कि क्या वहां ख़ून की मांग बढ़ गई है? जब पता चला कि ऐसा नहीं है, तब जाकर रूसियों की जान में जान आई. ख़ून की मांग बढ़ने का अर्थ होता कि युद्ध में संभावित घायलों के लिए ख़ून जमा किया जा रहा है, यानी सोवियत संघ पर हमला बस होने ही वाला है!

इस बीच अगर कोई भूल-चूक हो जाती तो एक परमाणु युद्ध के रूप में नाहक ही तीसरा विश्व युद्ध छिड़ जाता. जर्मनी उसकी मुख्य रणभूमि बनता और पूरा यूरोप मटियामेट हो जाता. यह चिंता केवल जर्मनी को ही नहीं, ब्रिटेन, फ्रांस, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे उसके सभी पश्चिमी पड़ोसियों को भी सता रही थी. इस चिंता से उन दिनों उपजे शांति-आंदोलनों ने ही बाद में पश्चिमी यूरोप की पर्यावरणवादी ग्रीन पार्टियों का रूप लिया.

आईएनएफ संधि और जर्मनी के एकीकरण में गोर्बाचोव का अपूर्व योगदान रहा

जनता का दबाव झेल रही पश्चिमी यूरोप की सरकारों को अमेरिका को समझाना पड़ा कि उसे सोवियत संघ से कोई समझौता कर पश्चिमी यूरोप पर से युद्ध के बादल छांटने होंगे. इन देशों के सौभाग्य से, बहुत ही खुले मन-मस्तिष्क और उदारवादी विचारों वाले मिख़ाइल गोर्बाचोव, मार्च 1985 में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता बने. उनके आने के दो वर्षों से भी कम समय में ही मध्यवर्ती दूरी वाली मिसाइलों के निर्माण और उनकी तैनाती पर रोक लगाने की ‘आईएनएफ’ संधि पर वांशिगटन में हस्ताक्षर हो गए.

यही नहीं, संधि के दो ही वर्षों के भीतर ही नौ नवंबर 1989 को जर्मनी के विभाजन का प्रतीक बन गयी बर्लिन दीवार भी ढहा दी गई. कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी और पूंजीवादी पश्चिमी जर्मनी का चार दशकों से असंभव-सा लग रहा एकीकरण भी रातों-रात संभव हो गया. इस सब का श्रेय तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रीगन और उनके उत्तराधिकारी जॉर्ज बुश से अधिक सोवियत नेता गोर्बाचोव को ही जाता है.

लेकिन अमेरिका अपने वादे से मुकर गया

इस ऐतिहासिक घटनाक्रम से जुड़ी एक सच्चाई यह भी है कि जर्मनी के एकीकरण के समय नाटो के मुखिया अमेरिका ने गोर्बाचोव को एक ऐसा वचन दिया था, जिससे वह बाद में मुकर गया. वचन यह था कि जर्मनी के एकीकरण के बाद नाटो का पूर्वी यूरोप की दिशा में विस्तार नहीं किया जाएगा. जर्मनी की पूर्वी सीमा ही नाटो की भी पूर्वी सीमा होगी. लेकिन हुआ ये कि तीन अक्टूबर 1990 को जर्मनी का औपचारिक एकीकरण होने के दो ही महीनों के भीतर, 26 दिसंबर 1990 को 15 राष्ट्रीयताओं के संघराज्य सोवियत संघ का विघटन हो गया. संघटक गणराज्य उससे अलग होते गए. बच गया केवल रूसी संघ. वही अब भूतपूर्व सोवियत संघ का क़ानूनी उत्तराधिकारी है.

सोवियत संघ का विघटन होते ही गोर्बाचोव को अपना पद त्याग देना पड़ा. इसके साथ ही सोवियत नेतृत्व वाले पूर्वी यूरोप के कम्युनिस्ट देशों का ‘वार्सा संधि संगठन’ भी भंग हो गया. इसके सदस्य रहे भूतपूर्व कम्युनिस्ट देश देखते ही देखते नाटो की सदस्यता पाने के लिए मचलने और अपने यहां अमेरिकी सैनिकों व हथियारों को देखने के लिए तड़पने लगे. इस उथल-पुथल का लाभ उठाने के लिए अपने वादे को भुलाते हुए नाटो गुट का पूर्वी यूरोप की तरफ निर्बाध विस्तार करना और वहां अपने प्रक्षेपास्त्र तैनात करना अमेरिका के लिए मुंहमांगा वरदान बन गया.

जर्मनी में आज भी 37 हज़ार अमेरिकी सैनिक

आज स्थिति यह है कि जर्मनी के एकीकरण के तीन दशक बाद भी इस देश में अमेरिका के 11 मुख्य सैनिक अड्डे हैं. इसके साथ ही यहां क़रीब 37 हज़ार अमेरिकी सैनिक तैनात हैं और एक अज्ञात संख्या में अमेरिकी परमाणु अस्त्र भी मौजूद हैं. जर्मनी के रामश्टाइन में अमेरिका के बाहर उसका सबसे बड़ा वायुसैनिक अड्डा है और यहीं अमेरिकी वायुसेना का यूरोपीय मुख्यालय भी है. रामश्टाइन से ही सीरिया और अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी हवाई हमलों का संचालन और समन्वय तक होता है.

इस बीच जर्मनी के अतिरिक्त रूस की सीमा से सटे हुए पोलैंड, लातविया, एस्तोनिनया और लिथुआनिया में भी क़रीब 5000 नाटो सैनिक तैनात हैं, जिनमें से अधिकतर अमेरिकी हैं. मई 2016 से रोमानिया में अमेरिका का एक एंटी मिसाइल डिफेंस प्रणाली भी सक्रिय हो चुकी है. रूस और अमेरिका के बीच ऐसी प्रणाली को लेकर भी एक समझौता था लेकिन इससे अमेरिका 2002 में ही अलग हो चुका है. वहीं रूस 2007 में इससे पीछे हटा. इस संधि के तहत दोनों देशों के विशेषज्ञ एक दूसरे की ऐसी प्रणालियों निरीक्षण कर सकते थे. लेकिन यह संधि टूटने का ही परिणाम है कि अब दोनों देश एक-दूसरे के बारे में नहीं जानते कि कौन क्या कर रहा है. इससे दोनों के बीच संदेह और आशंकाएं बढ़ती रही हैं.

रोमानिया में तैनात एंटी मिसाइल डिफेंस प्रणाली पर विवाद

अमेरिका का कहना है कि रोमानिया में तैनात एंटी मिसाइल डिफेंस प्रणाली ईरानी या उत्तर कोरियाई मिसाइलों से बचाव करेगी. लेकिन रूस इस दावे को स्वीकार नहीं करता. उसके मुताबिक उसकी पश्चिमी सीमा के बिलकुल पास स्थापित की गई इस प्रणाली का लक्ष्य यदि वह नहीं है तो उसे रूस की नाक के नीचे ही तैनात क्यों किया गया. रूस का यह भी कहना है कि यह प्रणाली रूसी मिसाइलों को तो आकाश में पहुंचते ही नष्ट कर देगी, जबकि अमेरिकी मिसाइलें बेरोकटोक रूस पहुंचकर उसके शहरों को ध्वस्त करने में सक्षम हैं.

रूस की दिशा में आगे बढ़कर तैयारी करने की इस नई रणनीति को अमेरिका नाटो की एनहैन्स्ड फॉरवर्ड प्रेज़ेन्स (ईएफपी) कहता है. इस नीति के अधीन अमेरिका रूस की 1300 किलोमाटर लंबी सारी पश्चिमी सीमा पर नाटो के बहाने से अपनी ऐसी ज़ोरदार उपस्थिति चाहता है कि रूस की ओर से किसी हमले की हवा लगते ही तेज़ी से, कम से कम 50 हज़ार सैनिक मोर्चे पर पहुंचाए जा सकें या रूस पर मिसाइलों की बौछार की जा सके. ऐसे में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का यह कहना ग़लत नहीं है कि अमेरिका नाटो की आड़ लेकर अपने पैर पसारते-पसारते यदि रूस की ड्योढ़ी पर खड़ा हो जाए तो क्या वह तब भी चुपचाप तमाशा देखता रहे!

शस्त्रीकरण की नई होड़ शुरू हो सकती है

नाटो का विस्तार करते-करते अमेरिका जिस तेज़ी से रूस की ड्योढ़ी पर पहुंच गया है, उसके कारण न चाहते हुए भी रूस को शस्त्रीकरण की एक नई होड़ में दौड़ लगानी पड़ रही है. रूस का रक्षा-बजट नाटो के रक्षा-बजट के 10वें हिस्से के बराबर भी नहीं है. वहीं उसका उद्योग जगत तकनीकी दृष्टि से अमेरिका से कहीं पीछे है. जनसंख्या भी तेज़ी से बूढ़ी हो रही है. इसलिए अमेरिका से सीधे-सीधे टकराने में राष्ट्रपति पुतिन की कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती. वे भी जानते हैं कि जो कोई परमाणविक हमले की पहल करेगा, उसे तुरंत दूसरे पक्ष के वैसे ही हमले का सामना करना पड़ेगा. यानी परमाणु हथियारों का हर प्रयोग आखिरकार सुनिश्चित पारस्परिक अंत ही सिद्ध होगा.

दूसरी ओर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा से लेकर वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और नाटो के महासचिव येंस स्टोल्टनबेर्ग से लेकर यूरोपीय देशों के कई नेता तक यह कहते नहीं थकते कि रूस आईएनएफ संधि का लंबे समय से उल्लंघन कर रहा है. और अपने यूरोपीय भूभाग पर परमाणु हथियारों से लैस नए प्रकार की मिसाइलें तैनात कर रहा है. अमेरिका का दावा है कि नाटो में SSC-8 के नाम से पहचानी जानेवाली रूसी 9M729 मिसाइलें एक बड़ी संख्या में रूस के यूरोपीय भूभाग पर तैनात की हैं. इसके जवाब में रूस कहता है कि अमेरिका पूर्वी यूरोप में जिस प्रकार की मिसाइल डिफेंस प्रणाली तैनात कर रहा है, वह भी आईएनएफ संधि के विपरीत है.

अमेरिका के आईएनएफ संधि से पीछे हटने का एक बड़ा कारण चीन भी है

अमेरिकी मीडिया में ऐसी ख़बरें भी रही हैं कि अमेरिका 2013 से ही मध्यवर्ती दूरी की वैसी ही मिसाइलें बनाने और यूरोप में तैनात करने की सोच रहा था जिन पर आईएनएफ संधि रोक लगाती है. इस सोच के पीछे रूस ही नहीं, चीन भी एक बड़ा कारण बताया जाता है. चीन और संभवतः उत्तर कोरिया के पास भी ऐसी मिसाइलें हैं जो यूरोपीय देशों तक पहुंच सकती हैं. अमेरिका, रूस के साथ-साथ कम से कम चीन को भी किसी नई संधि में बांधना चाहता है लेकिन चीन ने अपने कानों में तेल डाल रखा है. वहीं यूरोपीय देश अब भी इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि ट्रंप प्रशासन ने आईएनएफ संधि से जुड़ा फैसला करने से पहले नाटो के अपने मित्र देशों से विचार-विमर्श क्यों नहीं किया.

ऐसे में यूरोप की जनता के लिए यह जानना और मानना सरल नहीं है कि सच्चाई क्या है? रूस और अमेरिका में से कौन कितना सच बोल रहा है और कितना झूठ? जनता की मुख्य चिंता यही है कि अगले छह महीनों में यदि रूस और अमेरिका आईएनएफ संधि की अर्थी उठा देते हैं और उनके बीच पिछले शीतयुद्ध जैसा एक नया शस्त्रीकरण शुरू हो जाता है, तो यूरोप का क्या होगा? क्या एक बार फिर 1980 वाले दशक जैसी भयावह स्थिति लौट आएगी और सब को किसी भी समय जानबूझकर या भूलचूक से परमाणु युद्ध छिड़ जाने की चिंता के साथ जीना पड़ेगा?