बीते गुरुवार को भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में रेपो रेट (कम अवधि के कर्ज पर आरबीआई द्वारा बैंकों से वसूली जाने वाली ब्याज की दर) को घटाकर 6.5 से 6.25 फीसदी कर दिया गया. केंद्रीय बैंक का यह फैसला खासा चौंकाने वाला रहा. अगस्त 2018 यानी करीब डे़ढ़ साल के बाद आरबीआई ने अपनी नीतिगत दरों में कमी की है.

एमपीसी की बैठक से पहले ब्लूमबर्ग पत्रिका द्वारा कराए गए सर्वे में ज्यादातर आर्थिक जानकारों ने कहा था कि आरबीआई अपनी नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं करेगा. इस सर्वे में शामिल 43 अर्थशास्त्रियों में से 32 का अनुमान था कि ब्याज दरें यथावत रहेंगी. लेकिन आरबीआई ने रेपो रेट में कटौती कर बाजार के जानकारों को चौंका दिया.

माना जाता है कि आरबीआई की मौद्रिक नीति में पूरा ध्यान महंगाई को नियंत्रित रखने पर होता है. फिलहाल महंगाई की दर आरबीआई के लक्ष्य - चार फीसद - से काफी नीचे चल रही है. खुदरा मुद्रास्फीति दिसंबर 2018 में 2.2 प्रतिशत थी जो अपने 18 माह के सबसे निचले स्तर पर है. ऐसे में अगर सैद्धांतिक तौर पर देखा जाए तो आरबीआई को कर्ज सस्ता करना ही चाहिए. तो फिर विश्लेषक यह राय क्यों दे रहे थे कि आरबीआई रेपो रेट को जस का तस रखेगा?

आर्थिक जानकारों का कहना था कि आरबीआई को महंगाई के पूरे परिदृश्य पर नजर रखनी होती है और एमपीसी की यह बैठक ऐसे समय में हुई जब बजट में किसानों और मध्यम वर्ग को खासी राहत दी गई है. ऐसे में अर्थव्यवस्था में खपत बढ़ने की उम्मीद है जो महंगाई को बढ़ा सकती है. इसके अलावा सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य बढ़ा दिया है और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने की आशंका भी है. इनकी वजह से भी महंगाई बढ़ सकती है. इसलिए यह माना जा रहा था कि आरबीआई अपनी कर्ज दर में कोई कमी नहीं करेगा. लेकिन एमपीसी की बैठक में फैसला इन अनुमानों से अलग हुआ.

पूर्व आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल के समय एमपीसी की बैठकों का सूत्र वाक्य केवल ‘महंगाई को नियंत्रण में रखना’ ही रहा करता था. अक्टूबर 2018 में जब डॉलर के मुकाबले रुपया 74 से भी ज्यादा पर पहुंच गया था तो सभी जानकार मान रहे थे कि आरबीआई कर्ज की दर बढ़ा देगा ताकि बाजार में रुपये की आपूर्ति कम और इसकी कीमत ज्यादा हो जाए. लेकिन उर्जित पटेल ने तब साफ कर दिया था कि आरबीआई का काम रुपये की विनिमय दर संभालना नहीं है और मौद्रिक नीति सिर्फ और सिर्फ महंगाई से तय होती है. लेकिन नये आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास के कार्यकाल की पहली एमपीसी में ही रेट में कमी कर दी गई है. और उसके पास इसके अपने तर्क हैं.

एमपीसी का मानना है कि मोदी सरकार ने अंतरिम बजट में किसानों को छह हजार रुपये प्रति वर्ष और मध्यवर्ग को आयकर में छूट देने के जो प्रावधान किये हैं उनसे मांग और महंगाई बढ़ तो सकती है लेकिन इसका असर दिखने में अभी समय लगेगा. ऐसे में आर्थिक वृद्धि के मकसद से उसने रेपो रेट कम किया है.

जहां तक राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.3 से 3.4 फीसद करने की बात है, एमपीसी ने इसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया है. कच्चे तेल की कीमतों के बारे में भी उसने बेहद आशावादी रवैया अपनाते हुए यह अनुमान लगाया कि दिसंबर को देखते हुए उसकी कीमतों में भी ज्यादा उछाल नहीं आने वाला है. जाहिर है कि महंगाई बढ़ने की जो भी वजहें हो सकती थीं, आरबीआई ने उनके प्रति वैसा रवैया नहीं रखा जैसा उर्जित पटेल के समय एमपीसी रखती थी.

आरबीआई के रेपो रेट कम करने से कर्ज सस्ते होंगे जिससे जनता भी खुश होंगी और चीजों की खपत बढ़ने से अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी. जाहिर सी बात है कि चुनावी साल में हर सरकार यही चाहती है. इसीलिए कुछ आर्थिक विशेषज्ञ एमपीसी के इस रेट कट को ‘इलेक्शन कट’ कह रहे हैं. इनका मानना है कि उर्जित पटेल के समय जो एमपीसी महंगाई कम करने के एकमात्र एजेंडे पर चल रही थी, वह अब सरकार की मर्जी के मुताबिक उसकी मदद करने वाले ढर्रे पर चल रही है.

एमपीसी की बैठक में रेट कट के खिलाफ वोट करने वाले सिर्फ दो लोग ही थे - आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य और एमपीसी के बाहरी सदस्य चेतन घाटे. जाहिर है कि इनके अलावा कमेटी में कुछ लोगों की राय पहले से बदल गई. इसे कुछ जानकार आरबीआई की स्वायत्ता से भी जोड़ कर देखते हैं. एक आर्थिक विशेषज्ञ के मुताबिक, ‘उर्जित पटेल के समय एमपीसी में जिन लोगों ने इस बात के लिए वोट दिया था कि आरबीआई को अर्थव्यवस्था के प्रति अपना ‘रुख नपा तुला और सख्त’ रखना चाहिए, वही फरवरी में रेट कट के लिए वोट कैसे कर सकते हैं. आखिर तीन महीनों में ऐसा क्या बदलाव आ गया है?’

वजह जो भी हो, एमपीसी का फैसला मोदी सरकार के लिए राहत भरा है. कहा यह भी जा रहा है कि अपने नये गवर्नर के कार्यकाल में आरबीआई जल्द ही मोदी सरकार को अंतरिम लाभांश के रूप में 28 हजार करोड़ रुपये देने वाला है. आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास इसे सरकार का अधिकार मानते हैं. नान बैकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) को आरबीआई पहले ही काफी राहत दे चुका है और वह तीन सार्वजनिक बैंकों के कर्ज देने पर लगी रोक भी हटा चुका है. इसके अलावा ओपन मार्केट आपरेशंस (ओएमओ) के जरिये भी आरबीआई बाजार में लगातार नगदी बढ़ा रहा है.

उर्जित पटेल के आरबीआई गवर्नर रहते हुए इन सारी चीजों को कठोर वित्तीय अनुशासन के दायरे में परखा जा रहा था. लेकिन, शक्तिकांत दास के आरबीआई गवर्नर बनने के बाद आरबीआई और सरकार की ताल एक लग रही है. क्या इसे सिर्फ इत्तेफाक माना जाए?