हमारा संविधान कहता है कि आम नागरिक के अधिकारों की रक्षा सरकार की ज़िम्मेदारी है - कार्यपालिका इस जिम्मेदारी का पालन करे और सुप्रीम कोर्ट इसकी निगरानी. भारत का मार्गदर्शक उसका संविधान कई विद्वानों की देन है. इन्हीं में से एक थे कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी. कानूनविद, शिक्षाविद, लेखक और इतिहासकार केएम मुंशी ने संविधान में व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सबसे ऊंचा दर्ज़ा दिलाने की पैरवी की थी.

गुजरात के भरुच में जन्मे केएम मुंशी के बारे में कहा जाता है कि अगर वे राजनीति में न आते तो अपने दौर के मशहूर वकीलों में शुमार किए जाते. आज़ादी के पहले होने वाले प्रांतीय चुनावों में जीतकर वे बॉम्बे (मुंबई) प्रोविंस के गृह मंत्री नियुक्त हुए थे. आज़ादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें संविधान सभा में शामिल किया. केएम मुंशी प्रारूप (ड्राफ्टिंग) समिति के सदस्य बनाए गए. संविधान के गठन के लिए कई सारी छोटी-छोटी पर अहम समितियां बनाई गई थीं. केएम मुंशी किसी भी मेंबर की तुलना में सबसे ज़्यादा (छह) समितियों के अध्यक्ष थे.

इससे पहले, और आज़ादी के तुरंत बाद हुए राज्यों के विलयों में भी उनका योगदान रहा. मोहम्मद अली जिन्ना की शह पर हैदराबाद का निज़ाम भारत में विलय के लिए राज़ी नहीं था. भारत सरकार और हैदराबाद के बीच किसी निर्णय पर न पंहुचने की हालत में ‘यथास्थिति संधि’ यानी ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट’ हुआ. दोनों पक्षों ने अपने-अपने एजेंट नियुक्त किए. सरदार पटेल ने केएम मुंशी को दिल्ली का प्रतिनिधि बनाकर हैदराबाद भेजा. सरदार पटेल के वे विश्वस्त थे. अब चाहे इसलिए कि दोनों गुजराती थे या फिर पटेल के साथ उन्होंने बारदोली के आंदोलन में हिस्सा लिया था.

हैदराबाद में केएम मुंशी प्रतिनिधि कम और ‘जासूस’ ज़्यादा थे. वहां से निज़ाम की सारी करतूतों की जानकारी वे सरदार पटेल को भेजते. इन्हीं जानकारियों के आधार पर सरदार पटेल इस नतीजे पर पहुंचे कि निजाम के साथ बातचीत का कोई फायदा नहीं. इसके बाद ऑपरेशन पोलो चलाया गया और इस रियासत का बलपूर्वक भारत में विलय किया गया. हैदराबाद के विलय पर केएम मुंशी ने ‘एंड ऑफ़ एन इरा’ शीर्षक से किताब भी लिखी. वैसे उन्होंने कई किताबें लिखी हैं. इतिहास और साहित्य पर उनका बराबर का दखल था. वे भार्गव ब्राह्मण परिवार से थे और भार्गव ऋषि की संतान माने जाने वाले परशुराम पर लिखी उनकी किताब काफी चर्चित है.

सोमनाथ मंदिर पर राजेंद्र प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू का टकराव भारतीय इतिहास में धर्मनिरपेक्षता की वैचारिक यात्रा का अहम मोड़ है. सरदार पटेल ने केएम मुंशी को महमूद ग़ज़नवी द्वारा बार-बार लूटे और बाद में औरंगज़ेब द्वारा पूरी तरह से तहस-नहस किये गए मंदिर के जीर्णोद्धार कार्यक्रम का अध्यक्ष बनाया था. नेहरू नहीं चाहते थे कि डॉ प्रसाद इसके उद्घाटन कार्यक्रम की अध्यक्षता करें. उधर, प्रथम राष्ट्रपति का कहना था कि वे निजी हैसियत से इसमें शामिल हो रहे हैं. जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के राष्ट्राध्यक्ष को ऐसे कार्यक्रमों से दूर रहना चाहिए. डॉ राजेंद्र प्रसाद का तर्क था कि एक समुदाय विशेष की आहत भावनाओं पर मरहम लगाना धर्मनिरपेक्षता ही है. उन्होंने अपना फैसला नहीं बदला और कार्यक्रम की अध्यक्षता की.

खैर, वापस केएम मुंशी पर लौटते हैं जिनका संविधान निर्माण में बहुत बड़ा योगदान है. ग्रैनविल ऑस्टिन की किताब ‘इंडियन कॉन्स्टीट्यूशन-कार्नर स्टोन ऑफ़ अ नेशन’ भारतीय संविधान पर एक प्रमाणिक ग्रंथ जैसी मानी जाती है. ऑस्टिन लिखते हैं कि भारत में संसदीय प्रणाली के स्वरूप पर केएम मुंशी के विचार आख़िरी बात साबित हुए. बहस यह थी कि भारत में अमेरिका वाली राष्ट्रपति केंद्रित व्यवस्था हो या इंग्लैंड की तरह ब्रिटिश पार्लियामेंट जैसी प्रणाली. केएम मुंशी का मानना था कि 1919 से जब भारत में ब्रिटिश संसदीय प्रणाली कारगर तरीक़े से काम कर रही है तो फिर इसे बदला न जाए. उनका कहना था कि राष्ट्रपति की हैसियत इंग्लैंड के राजा के बराबर ही हो जो मंत्रिमंडल की सलाह पर आवश्यक निर्णय ले. डॉ. राजेंद्र प्रसाद इस बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखते थे.

हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में विश्वास रखने वाले केएम मुंशी ने संविधआन में अल्पसंख्यकों को और अधिक अधिकार दिए जाने की मांग की थी. उनके द्वारा इस मुद्दे पर बनायी गयी प्रश्नावली को तमाम अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं को भेजा गया था. मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी का अधिकार छूटे नहीं. केएम मुंशी यह भी चाहते थे कि नागरिकों के लिए सेना में भर्ती अनिवार्य की जाए ताकि किसी आपात स्थिति में मुश्किल न हो.

इसी तरह केएम मुंशी का विचार था कि मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए शीर्ष न्यायालयों को रिट जारी करने का अधिकार होना चाहिए और संविधान में इसकी व्यवस्था की जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के बनाए जाने की सार्थकता पर उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य के मसलों की सुनवाई और राज्य के आदेश के ख़िलाफ़ अपील के लिए सुप्रीम कोर्ट आवश्यक है. यहां आपको याद दिला दें कि आजादी से पहले देश में उच्च न्यायालय ही थे. विवाद होने की स्थिति में इंग्लैंड की प्रिवी काउंसिल में अपील करनी होती थी.

केएम मुंशी की एक और अहम सिफारिश यह भी थी कि किसी भी व्यक्ति को पुलिस द्वारा ग़ैरक़ानूनी रूप से बंदी नहीं बनाया जाना चाहिए. उन्होंने पकड़े गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने का क़ानून बनाने की सिफ़ारिश की थी. इससे जुड़ी बहस पर उन्होंने कहा था कि उन्नत देशों में इसकी कल्पना भी नहीं की जाती. उन्होंने कहा कि भारत में कई साल तक अंग्रेज़ों की शासकीय व्यवस्था में नागरिक बिना किसी जुर्म के पकड़े जाते रहे हैं और पुलिस प्रशासन इसका आदी हो चुका है, इसलिए ऐसा करना अनिवार्य है.

कम में ज़्यादा समझने की बात यह है कि केएम मुंशी के व्यक्तित्व के काफ़ी पहलू थे. वे एक चित्रकार भी थे. इसके अलावा उन्हीं के प्रयासों से 14 सितंबर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. उन्होंने प्रेमचंद के साथ मिलकर हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘हंस’ का संपादन भी किया. संविधान की बात ऊपर हो ही चुकी. हालांकि विडंबना यह है कि जब संविधान का ज़िक्र आता है तो सिर्फ भीमराव अंबेडकर ही याद किये जाते हैं. केएम मुंशी या तेज बहादुर सप्रू जैसे विद्वानों का अक्सर ज़िक्र भी नहीं होता.

केएम मुंशी ने भारतीय विद्या भवन की शुरूआत की थी. आज इस संस्थान के छात्रों और शिक्षकों को छोड़ दें तो ज्यादा लोग उन्हें याद नहीं करते. ऐसा ही उनकी पत्नी लीलावती मुंशी के बारे में कहा जा सकता है जिनका सेंसर बोर्ड की स्थापना में अहम योगदान था. यह लीलावती ही थीं, जिन्होंने फ़िल्मों में महिलाओं की नग्नता के प्रदर्शन को रोकने के लिए 11,000 महिलाओं द्वारा दस्तख़त की गई याचिका संसद में पेश की थी.