दिल्ली के प्रवर्तन निदेशालय के दफ्तर के बाहर रॉबर्ट वाड्रा की लैंड क्रूजर कार आकर रुकी तो पचास से ज्यादा कैमरों की दिलचस्पी कार से उतरने वाले रॉबर्ट वाड्रा में नहीं थी. वहां मौजूद पत्रकार और छायाकार दोनों ही कार में बैठीं प्रियंका गांधी पर नजर गड़ाए हुए थे. प्रियंका ईडी के दफ्तर के बाहर अपने पति को छोड़कर चली गईं और इसके बाद सीधे कांग्रेस मुख्यालय में दिखीं.

यह भी इत्तेफाक से कुछ ज्यादा ही था कि जब प्रियंका गांधी 24 अकबर रोड के अंदर दाखिल हो रहीं थीं ठीक उसी वक्त अभिषेक मनु सिंधवी और प्रियंका चतुर्वेदी जैसे प्रवक्ता वहां प्रेस कांफ्रेंस कर रहे थे. कांग्रेस कवर करने वाले खांटी पत्रकारों ने भी यह नहीं सोचा था कि कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी अपने स्टार महासचिव प्रियंका गांधी की एंट्री उस वक्त करवाएगी जब वहां उनके पति पर ही प्रेस कांफ्रेंस चल रही होगी.

जब प्रियंका गांधी 24 अकबर रोड में अपने कमरे में जा रहीं थीं तो उनसे एकाध पत्रकारों का सामना हो गया. उनसे प्रियंका ने दो लाइनें कहीं - रॉबर्ट वाड्रा उनके पति हैं और वे अपने परिवार के साथ हैं.

यह भी इत्तेफाक से कुछ ज्यादा ही है कि 20 से ज्यादा छोटे-बड़े कमरों वाले कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को एक अदद कमरा तक नहीं दिया गया है. मंगलवार को राहुल गांधी के बगल वाला कमरा प्रियंका गांधी वाड्रा को दिया गया था. लेकिन अगले ही दिन उसी कमरे के बाहर ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी नेम प्लेट लगा दिया गया. अब उस कमरे के एक कोने में प्रियंका गांधी बैठती हैं और दूसरे में ज्यातिरादित्य सिंधिया.

प्रियंका गांधी के आने से पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया 24 अकबर रोड आए थे, उनके पद संभालने से लेकर पूजा करने तक की पूरी सूचना मीडिया को घंटों पहले दे दी गई थी. लेकिन प्रियंका गांधी के बारे में ज्यादातर पत्रकारों को तब भनक लगी जब वे चुपचाप अपने कमरे में आकर बैठ गईं. प्रियंका की टीम से जुड़े एक अहम सूत्र की मानें तो बार-बार ऐसा हो रहा है जिससे एहसास होता है कि प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी एक समान ही ट्रीट करना चाहती है.

सुनी-सुनाई है कि प्रियंका गांधी के कुछ करीबी नेताओं ने यह पैरवी शुरू कर दी है कि उन्हें सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश नहीं पूरे देश में प्रचार की जिम्मेदारी दी जाए. इन नेताओं की मांग है कि चुनाव प्रचार अभियान समिति जैसी कोई व्यवस्था की जाए जिसकी मुखिया प्रियंका गांधी हों. लेकिन ये नेता भी तब चकित रह गए जब इनकी मांग पर ज्यादा गौर नहीं किया गया. प्रियंका के सियासत में आने के बाद से प्रदेश अध्यक्षों ने अभी से अपने प्रदेश के लिए उनके प्रचार की तारीखें मांगनी शुरू कर दी है. महाराष्ट्र से यह मांग सबसे ज्यादा उठ रही है. लेकिन सभी प्रदेश अध्यक्षों को कहा जा रहा है कि अभी सिर्फ पूर्वी उत्तर प्रदेश तक ही प्रियंका को सीमित रखा जाएगा इसलिए ऐसी मांगें ना भेजी जाएं.

24 अकबर रोड में यह खबर भी गर्म है कि प्रियंका का सियासत में आना कोई पूर्व नियोजित कार्यक्रम नहीं था जैसा कि राहुल गांधी ने अमेठी में दावा किया था. सुनी-सुनाई है कि उन्हें रॉबर्ट वाड्रा की वजह से सक्रिय राजनीति में आना पड़ा. कांग्रेस के एक ही एक बुजुर्ग नेता कुछ पत्रकारों से पूछते हैं कि यह कैसे संभव हो सकता है कि जब प्रियंका गांधी विदेश में हों तब उन्हें महासचिव बनाने का ऐलान हो और जब उनके पति से पूछताछ चल रही हो तब वे महासचिव के तौर पर अपने काम की शुरुआत करें. यही बुजुर्ग नेता बरसों के अनुभव का हवाला देते हुए कहते हैं कि या तो यह रॉबर्ट वाड्रा को मुश्किल से बचाने के लिए है या फिर प्रियंका गांधी के नाम पर सेंटीमेंट जगाने के लिए.

कांग्रेस की खबर रखने वाले एक सूत्र बताते हैं कि पिछले कुछ हफ्तों में दिल्ली में जो हुआ वह प्रियंका की सियासी एंट्री के अंदर की कहानी बयां करता है. कांग्रेस नेतृत्व को यह डर है कि देर-सबेर रॉबर्ट वाड्रा पर शिकंजा कस सकता है. ऐसा हो उससे पहले ही प्रियंका गांधी को सीमित भूमिका में सियासत में लाया गया है ताकि वे सियासत भी कर सकें और रॉबर्ट वाड्रा को छूने से पहले सरकार सौ बार सोचे. कांग्रेस के ही एक नेता बातों-बातों में बताते हैं कि अभी तक राहुल गांधी कैंप के कई नेता यह तय नहीं कर पाए हैं कि छोटी बहन के सियासत में आने से उन्हें फायदा होगा या नुकसान.

इन नेताओं में से कुछ का मानना है कि प्रियंका अगर तेजी से प्रचार पर निकलीं तो राहुल की छवि पर भारी पड़ेंगी. इसलिए उनका कद जान-बूझकर लो प्रोफाइल रखा जाए. इन्हीं नेताओं की दलील है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी एक साथ मंच साझा करने से भी बचें. अगर ऐसा हो भी तो तो वे सिर्फ राहुल का परिचय बताएं और ज्यादा लंबा भाषण न दें. इन नेताओं की दलील है कि राहुल गांधी इस वक्त प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं इसलिए अपनी पार्टी में ही नंबर दो जैसे नहीं दिखने चाहिए. पूर्वी उत्तर प्रदेश या बाकी देश में भी भाई-बहन की मिली-जुली रैलियों से ज्यादा रोड शो पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है ताकि दोनों साथ भी दिखें और तुलना करने की गुंजाइश भी न रहे. 2004 के वक्त ऐसी ही रणनीति सोनिया गांधी के लिए भी बनाई गई थी. उस वक्त भी कांग्रेस पार्टी ने रैली से ज्यादा रोड शो में अपनी ताकत झोंकी थी.

हालांकि प्रियंका गांधी के करीबी कुछ नेता इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते हैं. इन्हें लगता है कि उन्हें कमजोर बताकर या बनाकर कोई फायदा नहीं होगा. क्या फर्क पड़ता है कि कौन भाषण देता है, या ज्यादा भीड़ जुटाता है. कुछ भी करके पार्टी जीते प्रधानमंत्री राहुल गांधी ही बनेंगे. इसलिए पार्टी को खुलकर प्रियंका गांधी को सामने लाना चाहिए.

लेकिन सुनी-सुनाई एक यह भी है कि प्रियंका गांधी के लिए ऐसी मजबूत वकालत करने वाले नेता इस वक्त 24 अकबर रोड में कम ही हैं.