निर्देशक : आनंद सुरापुर

लेखक : होमी अदजानिया, राजेश देवराज

कलाकार : फरहान अख्तर, अन्नू कपूर, कमल सिद्धू, झिलमिल हजारिका, वेलेंटीना कार्नेलुटी

रेटिंग : 2/5

पुरानी, अंजान और सस्ते बजट की इंडी फिल्मों को देखने की एक ट्रिक होती है. अगर आप सहिष्णु होकर उनकी कमियों को नजरअंदाज करते चलें तो फिल्म देखकर कुछ न कुछ हासिल करते ही हैं. बनने के 10 साल बाद अब जाकर रिलीज हो पाई ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ को देखने के लिए भी यही ट्रिक इस्तेमाल करनी चाहिए. क्योंकि फरहान अख्तर की बतौर अभिनेता इस पहली फिल्म को अगर आप आज के नजरिए से देखेंगे तो शर्तिया निराश होंगे. इसे ऐसे देखिए जैसे 10-12 साल पुरानी छूटी हुई इंडी फिल्मों को उत्सुकतावश आज लैपटॉप या टेलीविजन पर देखते हैं.

फरहान अख्तर का पात्र आदि कॉन्ट्रेक्टर फिल्म में प्रोडक्शन कंट्रोलर का काम करता है और फिल्में शूट करने वाले क्रू को उनकी जरूरत की चीजें हर कीमत पर मुहैया कराता है. चाहे वे हाथी मांगें, गांजा मांगें, या फिर बंदर. कोई उसे बताता है कि पोप की नगरी वेनिस में एक आर्ट गैलरी के मालिक को मिट्टी के अंदर सर दबाकर लंबे समय तक सांस रोक सकने वाला हिंदुस्तानी फकीर चाहिए. यूरो में मिलने वाली कीमत के लालच में आदि यह बेईमानी वाला काम हाथ में ले लेता है.

बनारस में न मिलकर ऐसा फकीर इस नायक को मुंबई में ही इमारत रंगने का काम करते हुए मिलता है! जल्द ही हिंदू के भेष में यह मुस्लिम और साथ ही नकली फकीर (अन्नू कपूर) उसके साथ वेनिस जाता है और यहीं आकर एक दिलचस्प कहानी एक मजबूत पटकथा में नहीं बदल पाती.

कहा जा रहा है कि होमी अदजानिया (‘बीइंग सायरस’, ‘कॉकटेल’ और ‘फाइंडिंग फैनी’ के निर्देशक) एक बार सच में किसी फकीर को हिंदुस्तान से वेनिस ले गए थे और उनके इसी अनुभव को लेखक राजेश देवराज ने पटकथा का रूप दिया है. लेकिन साफ तौर पर यह पटकथा लेयर्ड नहीं है और इंटरवल के बाद अन्नू-फरहान व अन्नू-वेलेंटीना के बीच के कुछ सुंदर दृश्यों के अलावा साधारण लिखाई की मारी है.

फिल्म का शिल्प भी उन अनगढ़ देसी इंडी फिल्मों जैसा है जिसे कि नागेश कुकनूर की ‘हैदराबाद ब्लूज’ (1998) के बाद कई सारे स्वतंत्र निर्देशकों ने अपनाया था. अर्बन शहरों की कहानी कहने के लिए हैंड-हैल्ड कैमरा उठाया था और अंग्रेजीदां नायकों को आंतरिक यात्राओं पर निकलते हुए दिखाया था.

विज्ञापन फिल्मों की दुनिया से आए निर्देशक आनंद सुरापुर ने ‘द फकीर...’ को 10 साल पहले इसी इंडी मिजाज की नैचुरलिस्टिक फिल्ममेकिंग स्टाइल का उपयोग कर बनाया है और आपको इसकी कई तकनीकी खामियां सामने-सामने नजर आ जाती हैं. एक सीन तो इतना हास्यास्पद है कि बताए बिना रहा नहीं जा रहा! नायक और छोटे-से गैरप्रभावी रोल में नायिका कमल सिद्धू कार में सफर कर रहे होते हैं और आपको साफ-साफ दिखता है कि कार सड़क पर नहीं चल रही बल्कि उसे किसी ऊंचे प्लेटफॉर्म या ट्रॉली पर रखकर चलते हुए दिखाया जा रहा है. यहां कैमरावर्क और निर्देशकीय कमी इतने उच्च स्तर की है कि आसपास की दुकानों की छत और कार की छत एक ऊंचाई पर नजर आती है. जैसे फिल्म ने ट्रैक्टर के टायर कार में लगा दिए हों! भाई, ये 2008 के आसपास बनी फिल्म है या 1908 के आसपास की?

लेकिन, एक पुरानी फिल्म को पुरानी मानकर जब आप देखते हैं तो ऐसी तकनीकी खामियों को नजरअंदाज करने में तकलीफ महसूस नहीं होती. तकलीफ इस बात की ज्यादा होती है कि निर्देशक ने लंबे फॉर्मेट की कहानी को वह कसावट नहीं दी जो फीचर फिल्मों की पहली डिमांड होती है.

नैचुरलिस्टिक फिल्ममेकिंग स्टाइल अपनाने के बावजूद फिल्म में यथार्थवाद की कमी साफ मालूम होती है और कई सीन अनाड़ी निर्देशन के उदाहरण बनते हैं. वेनिस जैसे खूबसूरत शहर को अच्छे से शूट नहीं किया जाता और होटल के कमरे व रेस्टोरेंट वाले इनडोर सीन तो जैसे वेनिस की जगह सस्ते मुंबई होटल में शूट मालूम होते हैं. अन्नू कपूर – और कुछ हद तक फरहान अख्तर – के अलावा न आप किसी दूसरे किरदार से जुड़ पाते हैं और न ही अध्यात्म की दुनिया का ढोंग सामने लाने वाली कहानी से गहरा कनेक्ट कर पाते हैं.

भले ही टिमटिमाने वाला अभिनय नहीं है, लेकिन फरहान अख्तर का काम आंखों को अखरता नहीं. जिस तरह के स्मार्ट अर्बन किरदार वे अपनी फिल्मों में लिखते आए थे (‘दिल चाहता है’) और हीरो बनने के बाद शुरुआत में निभाते आए थे (‘रॉक ऑन’, ‘कार्तिक कॉलिंग कार्तिक’), ठीक वैसा ही ‘सेफ’ किरदार वे बतौर अभिनेता अपनी इस पहली फिल्म में भी निभाते हैं. बाद में चलकर उन्होंने अपने अभिनय और आवाज के थ्रो पर काफी काम किया, यह बात भी इस पुरानी फिल्म को देखकर दोबारा समझ आती है.

कोई और निर्देशक होता तो फकीर का दिलचस्प रोल निभाने वाले अन्नू कपूर को बहुत बेहतर तरीके से इस्तेमाल करता. लेकिन कुछ नैचुरलिस्टिक फिल्ममेकिंग स्टाइल की सीमा होती है कि वो कद्दावर अभिनेताओं को भी बांधकर रख देती है, और फिर कुछ निर्देशकीय कौशल की कमियां होती हैं कि वे मशहूर स्टारों को केंद्र में रखने के चलते ‘असली’ नायकों को थोड़ा पीछे कर देते हैं. इन दिनों ‘द फकीर…’ से जुड़ी सारी खबरें फरहान अख्तर के ही इर्द-गिर्द घूम रही हैं और अन्नू कपूर को बस एक फुटनोट बनाकर रख दिया गया है.

इन्हीं फुटनोट अन्नू कपूर के लिए आपको ‘द फकीर…’ देखनी चाहिए. यह उनके सर्वश्रेष्ठ अभिनय में शामिल रोल तो नहीं है, लेकिन कम संवादों वाले गरीब सत्तार के रोल में वे अपने दुख और उदास चेहरे से आपका दिल जीत लेते हैं. उनके कई मोनोलॉग शानदार हैं और जब-जब वे इस सवाल का जवाब देते हैं कि आखिर मिट्टी के अंदर कैसे सांस रोककर लेट लेते हैं, तब-तब उन जवाबों से देखने वाले का दिल पसीज उठता है. ‘वेनिस की मिट्टी भारी है’ वाले सीन में और हिंदी नहीं समझने वाली वेलेंटीना से अपना मुश्किल बचपन साझा करते वक्त वे वही कद्दावर अभिनेता बन जाते हैं, जिनका सही उपयोग करना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को बिलकुल नहीं आता.

यहां ये भी बताने का बहुत मन हो रहा है कि सैफ अली खान ने ‘कालाकांडी’ (2018) में जो पीले रंग का फर ओढ़ा था न, लगता है उसकी प्रेरणा फिल्मकार को ‘द फकीर ऑफ वेनिस’ से मिली थी. इसके एक सीन में गुलाबी रंग का फर वाला कोट ओढ़कर अन्नू कपूर क्या मस्त झूमते हैं!