हम यूरोपीय, लातीनी अमरीकी, अमरीकी कविता आदि की बात तो करते हैं, अकसर एशियाई कविता की नहीं. उसकी जगह अकसर चीनी, जापानी, भारतीय कविता की. इसकी एक वजह तो यह है कि एशियाई कविता का शास्त्र जितना बहुल है उतना कहीं और की कविता का नहीं. अकेले एशिया में जापानी कविता का सौन्दर्यबोध गंध से, भारतीय कविता का स्वाद से, अरबी कविता का कहन से निकलता है. उन्हें एकत्र किया जा सकता है पर कोई एशियाई कविताशास्त्र संग्रहित शायद ही किया जा सके.

किसी ने ऐसी कोशिश की हो तो पता नहीं. एक और कारण यह है कि एशिया के कई देश पश्चिम से आक्रांत रहे हैं. वे अपने एशियाई पड़ोसियों से कहीं अधिक पश्चिमी साहित्य के बारे में उत्सुक और जानकारी रखते हैं. पश्चिम से साक्षात्कार ने एशिया के कई देशों की कविता को आधुनिक रूपाकार और संवेदना देने का काम किसी हद तक किया भी है. जहां तक एशियाई काव्यरूपों का सवाल है, स्वयं एशिया में सबसे अधिक प्रभाव जापानी हाइकू और भारतीय महाकाव्य ‘रामायण’ का पड़ा है. यह एशियाई बहुलता को देखते हुए बेहद नाकाफ़ी है.

अपरिचय के इस विंध्याचल की बाधा हटाने के लिए बहुत कम संगठित पहल हुई है. पहल करने की क्षमता कुल तीन देशों में ही हो सकती थी और है. चीन,जापान, भारत. एशिया में सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से सबसे प्रभावशाली होने के कारण. लेकिन इनमें से किसी ने कोई सुचिन्तित क़दम इस मामले में नहीं उठाया है. नतीजतन न भारत में एशियाई आधुनिक साहित्य के बारे में कोई व्यापक समझ या विशेषज्ञता है, न इन दो देशों में आधुनिक भारत के बारे में. इक्का-दुक्का विश्वविद्यालयों में कुछ विभाग हैं और जब-तब, वह ज़्यादातर अंग्रेज़ी से, अनुवाद हुए हैं पर इन सबसे कोई प्रभावशाली उपस्थिति नहीं बन पायी है.

इस सुखद स्थिति में एक पहल रज़ा फ़ाउण्डेशन 15-17 फ़रवरी 2019 को दिल्ली में रज़ा उत्सव के अंतर्गत करने जा रहा है. इस बार रज़ा कविता द्वैवार्षिकी एशियाई कविता पर एकाग्र है जिसमें लगभग 21 देशों के कवि भाग लेंगे. 21 एशियाई देशों के कवि और 7 कवि भारत के.

म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, आर्मेनिया,उजबेकिस्तान, जार्जिया, अफ़गानिस्तान, फिलिस्तीन, इज़रायल, भूटान, दक्षिण कोरिया, जापान, चीन, ईरान आदि से कवि आ रहे हैं. अंग्रेज़ी-हिंदी अनुवादों के साथ काव्यपाठ होगा और तीन सत्रों में ‘स्वतंत्रता और असहमति’, ‘सत्यातीत समय में कविता का सत्य’ और ‘कविता और हिंसा’ विषयों पर कविगण चर्चा भी करेंगे. फिलिस्तीन कवि नज़वान दरवेश की एक पंक्ति है कि ‘उम्मीद की जगहें हमेशा आरक्षित हैं.’ चीनी यांग लिआन की उक्ति है ‘कविता को उदासीन सुंदरता में डूबने से इनकार करने की’और कोरियाई कवि को उन का वक्तव्य है कि उनकी ‘कविता का कोई पूर्ण विराम नहीं होगा न कल, न परसों.’ आयोजन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सहयोग से वहीं होने जा रहा है.

शायदकी वापसी

हममें से कुछ को याद होगा कि जब एक बड़े झूठ के आधार पर कि वह चुपचाप परमाणु अस्त्र बना रहा है अमरीका और ब्रिटेन ईराक पर हमला करने के बहुत नज़दीक पहुंच गये थे. तब स्थिति की भयावहता को समझकर ऐन वक़्त पर यह उम्मीद बची हुई थी कि शायद कुछ रास्ता निकल आये और युद्ध टल जाये. उस समय मैंने एक कविता लिखी थी. ‘उम्मीद ने चुना है एक छोटा सा शब्द ‘शायद’. ऐसा हुआ नहीं और भीषण हमला हुआ और एक देश को हर तरह से तबाह कर दिया गया.

फिर थोड़े दिन बचे हैं लोकसभा के चुनाव को और झूठों की दैनिक झड़ी लगी हुई है. देश का भविष्य क्या होगा यह दांव पर है. उसके लोकतंत्र का, उसके संवैधानिक मूल्यों का, उसके नागरिक जीवन में समरसता का, उसकी अनेक संस्थाओं का जो तंत्र को लोक की निगरानी में रखती है. मन में फिर यह शब्द ‘शायद’ घुमड़ रहा है. जिस तरह से झूठ-हिंसा-हत्या-घृणा-धर्मान्धता-साम्प्रदायिकता का माहौल फैलाया जा रहा है उससे तंग आकर भारतीय जन शायद अपने विवेक का प्रयोग करे यह उम्मीद करने का मन बनता है.

पहले सच्चाई के लिए कई आंकड़े पेश किये जाते रहे हैं ख़ासकर अपने विरोधियों के बारे में. अब अपने बारे में आंकड़ों को प्रकाशित करने से रोका जा रहा है. विकास की दर, बेरोजगारी के आंकड़े आदि सभी दबाये जा रहे हैं या उनके साथ सर्वथा अनैतिक छेड़छाड़ कर उन्हें सत्ता अपने अनुकूल बनाने का लगातार प्रयत्न कर रही है और हम यह होता मन मारकर देख रहे हैं. यह देखना कुछ गंभीरता से सोचने और उसके अनुसार कर्म करने में शायद बदल सकता है.

इस शायद के रास्ते कई अड़ंगे हैं. पढ़ा-लिखा वर्ग अधिकांशतः लोक-लुभावन उपायों के आकर्षण की चपेट में बना हुआ है. उसे लगता है कि अभी और समय दिया जाना चाहिये. इस वर्ग का अन्तर्विरोध स्पष्ट है. वह लाभ पाने-उठाने के लिए अधीर है, किसी भी क़ीमत पर धन कमाने के लिए आतुर है पर सत्ता को और समय देने में उसे पर्याप्त संकोच नहीं हो रहा है. कहने को यह बड़ा मध्यवर्ग लोकतंत्र का मूलाधार है. पर लगता यह है कि उसकी लोकतंत्र को बचाने या सशक्त करने में दिलचस्पी बहुत कम है. वह शायद ही विकल्प का सपना देखे और उसे सच बनाये.

ऐसे में लोकतंत्र को बचाने, विकल्प खोजने और उसके अनुसार अपना रास्ता चुनने का काम वंचित-पीड़ित, विकास से निष्कासित और विस्थापित, करोड़ों की संख्या में बेरोज़गार, हर दिन हिंसा का शिकार होती स्त्रियां, अपना सीधा-सरल जीवनयापन करने से बाधित आदिवासी और तरह-तरह से दोयम दरज़े के नागरिक बनाये जा रहे अल्पसंख्यक और गरीब से ग़रीबतर होते किसान ही होंगे जो विकल्प खोजेंगे. शायद ऐसा गठबन्धन मतदाताओं का हो पाये और देश की राजनीति बदले, जवाबदेह और ज़िम्मेदार बने. इस मुक़ाम पर ऐसा होगा या नहीं कह पाना मुश्किल है. शायद हां, शायद नहीं. शायद वापस तो आ रहा लगता है पर उसके मार्ग में बाधाएं अपार हैं.

कला-विनोद

सिर्फ़ इंडिया आर्टफ़ेयर की बात नहीं है हालांकि इस बार वह कुछ फीका लग रहा था. गैलरियां कम थीं. लेकिन इस आयोजन के बाहर कम से कम तीन एकल प्रदर्शनियां हुई हैं और अभी चल रही हैं. पहली लाड़ो सराय की एक गैलरी में बहुत दिनों बाद गोपी गजवानी की प्रदर्शनी. गोपी चुपचाप बरसों से अमूर्तन पर अडिग कलाकार हैं जिनका रंगबोध अनूठा है. उनके अमूर्तन निष्क्रिय या अनमने अमूर्तन नहीं होते- उनमें रंगों के बहुत संवेदनशील प्रयोग के कारण जीवन स्पन्दित होता है. इस प्रदर्शनी में उनके रेखांकन भी हैं. उनमें शक्ति है और सधा हुआ लालित्य भी. एक तरह की मोहक रम्यता.

दूसरी एकल प्रदर्शनी श्रीधराणी कला वीथिका त्रिवेणी में रामेश्वर बूटा की है. ब्रूटा सामग्री के साथ हमेशा कुछ न कुछ प्रयोग, कभी-कभार खिलवाड़ करते रहे हैं. इस बार उन्होंने अपनी कृतियों के लिए एक विशेष क़िस्म का कांच चुना है. सारी प्रदर्शनी, बहुत अच्छे अर्थ में, एक तिलिस्म सा लगती है. कांच पर सुघर अमूर्तन- कहीं-कहीं रूपाकार भी. ब्रूटा कई बार विकृति से अपनी कृति ढालते रहे हैं. इस बार ऐसा कम है. उनमें अपनी दृष्टि पर हर हालत में इसरार बना रहा है और इस इसरार ने कुछ नये रूपरंग खोजे हैं. कहा जा सकता है कि यह उनकी कला में एक नया मोड़ उपस्थित करती है.

तीसरी प्रदर्शनी अर्पिता सिंह की किरण नादार म्यूजियम में आयोजित है और कई महीने चलेगी. रूबीना करोड़े ने बहुत समझ और जतन से इस प्रदर्शनी को संग्रथित किया है. यह प्रदर्शनी एक बार फिर रूबीना को इस समय भारत में सक्रिय संग्राहकों में सबसे ऊपर रखती है. उन्होंने जो कमाल पहले नसरीन मोहमदी, हिम्मत शाह और विवान सुन्दरम की बड़ी प्रदर्शनियों के संग्रथन में किया था, वह इस प्रदर्शनी से और अधिक विश्वसनीय और प्रामाणिक हो गया है.

अर्पिता सिंह की प्रदर्शनी तीनों में सबसे बड़ी है. वह एक तरह का पुनरवलोकन उपस्थित करती है. सामान्य अर्थों में अर्पिता अमूर्तन की कलाकार नहीं हैं. वे आकृतियों और आकारों से, फिर भी, अमूर्तन गढ़ती-रचती हैं. इस प्रदर्शनी में एक कक्ष उनके बाक़ायदा अमूतनों पर भी एकाग्र है. यह काफ़ी पहले का काम है और कम से कम मुझे पहली बार देखने का अवसर मिला.

अर्पिता सिंह एक बेचैन कलाकार हैं जिनकी बेचैनी हम तक सीधे पहुंचती है और हमें भी बेचैन करती है. हमारे आसपास जो हिंसा है और हरसू और हर पल हमें घेरे है उसकी बहुत गहरी पकड़ अर्पिता के यहां है. उनकी एक बड़ी कलाकृति में हरीतिमा का बड़ा वितान है और बीच-बीच में फूल की तरह नज़र आते शव हैं, उनके जो किसी मुठभेड़ में मारे गए हैं. उनकी कई कृतियों में हथियारों से लैस सैनिक आदि नज़र आते हैं. हमारे समय में बढ़ती सैनिक और सिविल हिंसा का शायद अर्पिता सिंह से बेहतर, ज़्यादा विश्वसनीय और प्रामाणिक चित्र-गाथाकार कोई और नहीं है.