कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के पास वित्त मंत्रालय का प्रभार भी है. इस हैसियत से आठ फरवरी को विधानसभा में 2019-20 का बजट पेश करते हुए वे वित्त प्रबंधन के कुछ मूलभूत और स्वाभाविक समीकरण बता रहे थे. मसलन, पैसा कितना कहां से आएगा. किसको (विभाग को) कितना दिया जाएगा. क्या महंगा होगा, क्या सस्ता. ऐसी ही कुछ और बातें. लेकिन जब वे यह सब बता रहे थे लगभग उसी समय सदन के बाहर भी ऐसा ही वित्तीय प्रबंधन चल रहा था. यह सियासत में दल-बदली का वित्तीय प्रबंधन था, जो गाहे-बगाहे हर पार्टी को छू जाता रहता है. शायद यही वज़ह थी कि बजट भाषण के वक़्त एचडी कुमारस्वामी के चेहरे पर आश्वस्ति के भाव नजर नहीं आ रहे थेे.

इस बारे में आगे कोई बात करने से पहले कर्नाटक विधानसभा की कुर्सियों के समीकरण जान लेना ज़रूरी है. एक मनोनीत सदस्य को मिलाकर यहां 225 विधानसभा सीटें हैं. यानी कि सरकार बनाने लायक बहुमत के लिए यहां 113 सदस्यों का समर्थन ज़रूरी है. बीते साल विधानसभा चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी को सबसे ज़्यादा 104 सीटें मिली थीं. लेकिन वह सरकार नहीं बना पाई. विधानसभा में दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस है. उसके पास 80 सीटें हैं. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी पर इस समय जेडीएस (जनता दल-सेकुलर) के एचडी कुमारस्वामी हैं, जिनकी पार्टी को सिर्फ 37 सीटें ही मिली थीं. सियासी मज़बूरियां ही हैं जिनके चलते कांग्रेस फिलहाल जेडीएस की नंबर-दो साझीदार की तरह उनकी सरकार में शामिल है.

यानी एचडी कुमारस्वामी 120 सदस्यों के समर्थन के साथ मुख्यमंत्री की जिस कुर्सी पर बैठे हैं उसके तीन पाये कांग्रेस के हैं. जबकि एक जेडीएस व उसके तीन सहयोगियों का. इनमें एक निर्दलीय है, दूसरी बहुजन समाज पार्टी जिसने जेडीएस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था, तीसरी केपीजेपी (कर्नाटक प्रज्ञवंत जनता पार्टी). कर्नाटक विधानसभा में इन तीनों के एक-एक विध्यक हैं. यानी ये सब मिलकर भी कांग्रेस की सदस्य संख्या के सिर्फ आधे यानी 40 ही हो पाते हैं. संभवत: यही वहां की बड़ी समस्या भी है, जो इस समय दिख किसी और सूरत में रही है. सो अब किस्सा आगे...

मुख्यमंत्री भाजपा पर उनकी सरकार को अस्थिर करने का आरोप लगा रहे हैं

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने बजट पेश करने से एक दिन पहले मीडिया के सामने एक सनसनीख़ेज़ आरोप लगाया. उन्हाेंने कहा, ‘भाजपा मेरी सरकार गिराने की कोशिश कर रही है.’ कुमारस्वामी ने एक ऑडियो टेप भी जारी किया. इसमें गुरमितकल से जेडीएस विधायक नागनगौड़ा कंडकूर के पुत्र शरनगौड़ा और येद्दियुरप्पा के बीच कथित बातचीत थी. इसमें एक अन्य आवाज़ हासन से भाजपा विधायक प्रीतम गौड़ा की भी सुनी गई. येद्दियुरप्पा और प्रीतम बातचीत के दौरान शरनगौड़ा से कह रहे हैं कि वे अपने पिता को भाजपा का समर्थन करने के लिए मनाएं. इसके एवज़ में भाजपा उन्हें (नगनगौड़ा को) 25 करोड़ रुपए और मंत्री पद देगी.

येद्दियुरप्पा ने इस ऑडियो टेप को ‘फ़र्ज़ी’ बताकर ख़ारिज़ कर दिया लेकिन बजट के अगले दिन नौ फरवरी को कांग्रेस ने भी भाजपा पर ऐसा ही आरोप लगा दिया. राजधानी बेंगलुरु में कांग्रेस के प्रदेश प्रभारी केसी वेणुगोपाल और पार्टी के मीडिया विभाग के राष्ट्रीय प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला ने मीडिया से बातचीत के दौरान कहा, ‘हमारे 18 विधायकों को भाजपा 10-10 करोड़ रुपए का लालच दे रही है. विधानसभा अध्यक्ष (ये कांग्रेस विधायक हैं) को तो 50 करोड़ रुपए का प्रलोभन दिया गया है. विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की इस साज़िश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येद्दियुरप्पा शामिल हैं.’

आरोप हैं तो इनके पीछे कुछ ठोस वज़हें भी हैं

मुख्यमंत्री कुमारस्वामी और कांग्रेस अगर विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की आशंका जता रहे हैं तो इसके पीछे ठोस वज़ह भी है. जानकारों का मानना है कि भाजपा ने अब तक राज्य में सरकार बनाने की उम्मीद नहीं छोड़ी है. हालांकि ऊपर से वह इससे लगातार इंकार कर रही है. हालांकि येद्दियुरप्पा ख़ुद यह कहते हैं कि उनकी पार्टी राज्य की जेडीएस-कांग्रेस सरकार को गिराएगी नहीं. यहां तक कि उन्होंने बजट सत्र के दौरान सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने की योजना भी रद्द कर दी. लेकिन इसी सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि येद्दियुरप्पा ज्योतिष आदि पर काफ़ी भरोसा करते हैं. और खबरों के मुताबिक उनके बारे में कुछ ज्योतिषियों ने यह भविष्यवाणी की है कि वे मार्च के महीने तक फिर मुख्यमंत्री बन सकते हैं.

कांग्रेस और जेडीएस के आरोपों का दूसरा आधार यह है कि कांग्रेस के कम से कम चार विधायक - रमेश जरकीहोली, उमेश जाधव, महेश कुमतल्ली और बी नागेंद्र - लगातार पार्टी विधायक दल की बैठक और बजट सत्र से नदारद रहे हैं. कहीं-कहीं ऐसे कांग्रेस विधायकों की संख्या नौ भी बताई जा रही है. लेकिन चार विधायकों की पुष्टि ख़ुद कांग्रेस विधायक दल के नेता सिद्धारमैया ने ही की है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि इन विधायकों पर दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करने के लिए पार्टी विधानसभा अध्यक्ष से कहेगी. इसके अलावा एक कांग्रेस विधायक जेएन गणेश फ़रार हैं. उन पर भाजपा के साथ जाने के मसले पर अपनी ही पार्टी के एक अन्य विधायक पर जानलेवा हमला करने का आरोप है.

इस तरह पांच विधायकों के बारे में इस वक़्त यह माना जा सकता है कि ये संभवत: कांग्रेस के पाले से निकल चुके हैं. वैसे सिद्धारमैया की ही मानें तो चार कांग्रेसी विधायक और हैं जो पूरे बजट सत्र से अनुपस्थित रहने वाले हैं. हालांकि ये सभी पहले से इसकी सूचना दे चुके हैं. इसके अलावा मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने अभी हाल ही में तीन कांग्रेसी विधायकों को निगम-मंडलों में भी नियुक्त किया है. उनके बारे में माना जा रहा था कि वे भी बाग़ियों से मिल सकते हैं. लिहाज़ा उन्हें रोकने के लिए आनन-फानन में ये नियुक्तियां की गईं हैं. यानी यही वे कुछ घटनाक्रम हैं जो तरह-तरह की अटकलों और आरोप-प्रत्यारोपों को हवा दे रहे हैं.

लेकिन इन घटनाक्रमों के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का पहलू भी हो सकता है

कांग्रेस-जेडीएस और कई जानकारों के मुताबिक इस उठापटक के पीछे भाजपा है क्योंकि सरकार गिरने में उसका कई तरह से फ़ायदा है. अगर किसी तरह कांग्रेस-जेडीएस के 18-20 विधायक इस्तीफ़ा दे देते हैं तो विधानसभा की सदस्य संख्या इतनी हो जाएगी कि वह 104 विधायकों के साथ ही सरकार बना सकती है. और अगर कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लग गया तो वह भी लोक सभा चुनाव के लिहाज़ से भाजपा के लिए अच्छी ख़बर ही माना जा सकता है.

लेकिन इसमें दूसरा पहलू कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई का भी है. दरअसल कांग्रेस के रमेश जरकीहोली उत्तर कर्नाटक के बेलगावी क्षेत्र के कद्दावर विधायक हैं. इतने कि उनके अपने समर्थक विधायकों की संख्या ही 14 के आसपास बताई जाती है. वे इस समय दो कारणों से नाराज़ हैं. पहला, बीते साल दिसंबर में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में इन्हें हटाकर इनके छोटे भाई सतीश को मंत्री बना दिया गया. दूसरा, पार्टी और सरकार में इस वक़्त इनके प्रबल प्रतिद्वंद्वी डीके शिवकुमार की ज़्यादा अहमियत है. शिवकुमार कुमारस्वामी सरकार के गठन के समय से ही उसके संकटमोचक बने हुए हैं. कहा जा रहा है कि रमेश ख़ुद तोे कांग्रेस छोड़ने के मूड में हैं ही, राज्य की सरकार गिराकर वे अपने प्रतिद्वंद्वियों को भी सबक सिखाने का मन बना चुके हैं. और जानकारों की मानें तो भाजपा इस आग में बस घी डालने का काम ही कर रही है.

तो क्या सरकार गिरेगी?

अभी परिस्थितियां निश्चित रूप से राज्य की जेडीएस-कांग्रेस सरकार के लिए काफी मुश्किल नज़र आ रही हैं. फिर भी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तीन-चार पहलुओं को ध्यान में रखना उचित हो सकता है. पहला, एक साथ या आगे-पीछे भी 18-20 विधायकों को इस्तीफ़ा देने के लिए राज़ी कर लेना आसान काम नहीं है. कोई भी विधायक लोक सभा चुनाव से ठीक पहले इस तरह का ज़ाेख़िम शायद ही लेगा. दूसरा, कर्नाटक का संघर्ष पार्टियाें का कम बड़े नेताओं का निजी टकराव ज़्यादा है. फिर चाहे सिद्धारमैया और कुमारस्वामी हों या शिवकुमार और रमेश जरकीहोली. या फिर येद्दियुरप्पा और सिद्धारमैया. सो यह निजी संघर्ष अपने-अपने हितों के मद्देनज़र ही आगे बढ़ने की संभावना ज़्यादा है, जो कि सियासत में अक्सर ही दाएं-बाएं होते रहते हैं. तीसरी बात यह कि सरकार की सेहत पर लोक सभा चुनाव के दौरान और बाद में बनने वाली परिस्थितियों का संभवत: सबसे ज़्यादा असर हो सकता है. फिर चाहे वह सीटों और टिकटों का बंटवारा हो या चुनाव में प्रदर्शन.

यानी अगर कोई बड़ा उलटफेर न हुआ तो कर्नाटक के इस नाटक का पटाक्षेप अभी आने वाले दो-तीन महीनों में तो होता नहीं दिखता. वैसे यहां दो तथ्य सिर्फ़ यूं ही याद रखे जा सकते हैं. एक - लोक सभा चुनाव के नतीज़े संभवत: मई के पहले या दूसरे सप्ताह तक आ सकते हैं. और दूसरा - एचडी कुमारस्वामी की सरकार 22 मई को अपना पहला साल पूरा करेगी. अगर कर पाई तो?