इस उपन्यास का एक अंश :

‘तेरी यूनिवर्सिटी में रेप हुआ है, छात्रसंघ पर तेरी पार्टी का क़ब्ज़ा है, तुम लोगों को तो वाइस चांसलर की नींद उड़ा देनी चाहिए थी. उसका इस्तीफ़ा यूनिवर्सिटी के हर कोने से मांगा जाना चाहिए, पर नहीं...साहब तो नुक्कड़ नाटक करेंगे, फ़िल्मों में जाएंगे...फ़िल्मफेयर अवॉर्ड जीतेंगे...यह भांडगिरी बन्द कर और वाइस-चांसलर से इस्तीफ़ा मांग. मुझे इस कुर्सी पर अपना वाइस-चांसलर चाहिए. समझा? इस यूनिवर्सिटी में कोई बच्चा भी अगर छींके तो उसके लिए वाइस-चांसलर को जिम्मेदार बनाकर इस्तीफ़ा मांगो. हर छोटी-बड़ी बात पर वाइस-चांसलर के ख़िलाफ़ माहौल बनता दिखना चाहिए. तू माहौल बना, बाक़ी मुझ पर छोड़.’

‘जी...’

‘सुन, कल वाइस-चांसलर को इस मामले पर राज्यपाल जी ने बुलाया है. एक काम करो, उसे राजभवन में घुसने से रोको. मीडिया कवरेज अच्छी मिलेगी.’

‘जी...मैं कुछ प्लान करता हूं आज ही.’

‘करो और मुझे बताओ

...और हां, यह सुरेश कहां पीछे रह जाता है, उसे बोलो चुनाव लड़ना है तो सामने आकर लीड करे. ऐसे नहीं चल पाएगा कि राघवेन्द्र आए और मलाई ले उड़े. वैसे भी राघवेन्द्र वाइस-चांसलर के ख़िलाफ़ जाएगा नहीं, वजह तुम्हें पता है. उससे कहो कि मौक़े का फ़ायदा उठाए.’


उपन्यास : जनता स्टोर

लेखक : नवीन चौधरी

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन

कीमत : 199 रुपए


राजनीति खुद जितनी चीजों से प्रभावित होती है, उससे कहीं ज्यादा चीजों को प्रभावित करती है. खासतौर से कॉलेज और विश्वविद्यालयों में तो मुख्यधारा की राजनीति का सीधा दखल रहता है और छात्र राजनीति का यह सफर भी ज्यादातर मुख्यधारा की राजनीति में ही अपनी सद्गति को प्राप्त होता है! यह कहना गलत नहीं होगा कि विश्वविद्यालयों में होने वाली राजनीति, राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश के लिए प्राथमिक पाठशाला है.

‘कॉलेज पॉलिटिक्स’ वे सारे दांव-पेंच और गुर सिखा देती है, जो राष्ट्रीय राजनीति में जाने की बुनियादी जरूरतें हैं. यह उपन्यास उन्हीं सारे दांव-पेचों, षडयंत्रों, जातिवाद में आकंठ डूबे नेताओं और घिनौनी राजनीति पर से पर्दा उठाता है. ‘जनता स्टोर’ जयपुर कॉलेज की छात्र राजनीति के माध्यम से मुख्यधारा की राजनीति का काफी जीवंत चित्रण करता है.

उपन्यास के लेखक नवीन चौधरी एक व्यंग्यकार भी हैं. उनका यह मूल स्वभाव पूरे उपन्यास में जहां-तहां छोटी-छोटी चुटकियों के माध्यम से दिखाई पड़ता है. व्यंग्यात्मक लहजे के कारण बात का असर काफी बढ़ जाता है और किसी खास चीज पर करारी चोट भी हो जाती है. लोकतंत्र के खोखलेपन के साथ ही अलग-अलग जाति समूहों की खासियतों पर लेखक ने खासतौर से तंज किए हैं. कुछ उदाहरण -

‘लेकिन जिस तरह से हमारे ‘जनतंत्र’ से ‘जन’ के गायब होने पर भी उसे जनतंत्र कहा जाता है, वैसे ही जनता स्टोर बन्द होने पर भी इस मार्केट को आज भी जनता स्टोर कहा जाता है...’

या

‘बनिया भले ही दुनिया के किसी भी बैंक को निडर होकर चूना लगा जाए, पर लड़ाई-झगड़े से हमेशा डरता है.’

या

‘उस इलाके में जब कोई बच्चा पैदा होता तो उसे ऐसा टीका लगाया जाता है, जिससे बच्चे के ख़ून के RBI ‘रेड ब्लड सेल’ की जगह ‘राजपूत ब्लड सेल’ बन जाते थे और उस बच्चे को बड़ा होते-होते लगने लगता है कि वह राजा है और प्रजा की रक्षा उसका फर्ज है.’

यूं तो जाति व्यवस्था को समाज का कोढ़ बताया जाता है, लेकिन उसे असल में खत्म करने की सिर्फ मौखिक कवायदें की जाती हैं. साथ ही जाति कार्ड भारतीय राजनीति में आज भी सबसे ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाता है. कोई कितना भी खुद के जाति, वर्ग, धर्म से ऊपर होने की बात कहे, लेकिन राजनीति के मैदान में आते ही सबसे पहले वह जातिकार्ड से खेलना सीखता है. बल्कि यह कहना गलत नहीं होगा कि जाति और वर्ग की सबसे ज्यादा अहमियत नेताओं के लिए ही है. उच्च जातियां अपनी जातिगत शान के नाम पर कैसी घोर अमानवीय और क्रूर हरकतें बड़ी शान से करती हैं, उपन्यास में इसका बड़ा सटीक उदाहरण मिलता है. एक झलक -

‘हुकुम, कमाल कर दिया. राजपूतों की मूछ और ऊंची कर दी आपने. यूनिवर्सिटी के जाटों को अब समझ आ गया कि शेर से मुक़ाबला क्या होता है...हेड कांस्टेबल राजेन्द्र सिंह ने जीप में देखते हुए पूछा- ‘शिकार कठे गया बना?’

‘कौन-सा शिकार?’

‘वही जाट...हमें दे दो. हम संभाल लेंगे...’

‘छोड़ दिया उसे.’

‘...क्या बोलूं हुकुम! आपने तो छोड़ दिया जाट को और वहां पूरी यूनिवर्सिटी में हंगामा मच गया है कि ढूंडा ने जाट को किडनैप कर लिया...अगर लोगों को यह पता लग गया कि हमने किडनैपिंग नहीं की है तो बहुत बेज़्ज़ती हो जाएगी.’

‘वह तो ठीक है, पर किडनैपिंग के केस में गए तो जमानत नहीं मिलेगी. यूनिवर्सिटी का चुनाव लड़ना है अगले साल.’

‘पर बना, आपणी शान की ख़ातिर केस किडनैपिंग का ही होना चाहिए, चांटे मारने का कोई केस हुआ?’

जो लोग राजनीति के रग-रेशों को गहराई से पहचानते हैं वे यह भी जानते हैं कि अपराध जगत और राजनीति का रिश्ता कुछ वैसा ही है, जैसा जेल और नियमित अपराधी का होता है. स्थिति तो यहां तक पहुंच गई है कि बड़े अपराधी जेल के भीतर से बाहर के अपराध जगत पर नियंत्रण रखते हैं. और इन पहुंचे हुए अपराधियों का जेल के भीतर और बाहर जाना, जेल के नियमों पर नहीं बल्कि जेल प्रशासन और नेताओं के साथ उनके संबंधों पर निर्भर करता है. छात्र और मुख्यधारा की राजनीति के इर्द-गिर्द घूमता यह उपन्यास ऐसे अपराधियों से भी हमें मिलवाता है, जिनके लिए जेल कोई कैदखाना न होकर सराय जैसा बना हुआ है. यहां वे जब चाहे भीतर-बाहर आ जा सकते हैं. ऐसे ही एक मौके की झलक जहां अपराधी खुद शान से बता रहा है कि वह जब चाहे जेल से बाहर जा सकता है -

‘मयूर ने पूछ लिया- ‘वह शक्ति सिंह की पिटाई वाला क्या मामला है? मैंने कुछ सुना तो था, पर पता नहीं था कि आप ही थे पीटने वाले. वैसे आप तो जेल में थे न? फिर कैसे पीटा?’

प्रशांत मुस्कुराया और बोला- ‘जेल में कब रहना है और कब बाहर, यह मेरी मर्जी पर है. 15 दिन बाद बीमार पडूंगा, रात को मिलूंगा सवाई मानसिंह अस्पताल के पीछे थड़ी पर. मिलने का मन हो तो आ जाना और हां डरना मत किसी से, यह शहर अपना ही है. ज़रूरत हो कभी तो बताना.’

इस उपन्यास में ‘जनता स्टोर’ वह बाजार है, जहां कभी इसी नाम से कोई दुकान हुआ करती थी. अब वह दुकान तो वहां नहीं है, लेकिन वह बाजार आज भी कॉलेज और मुख्यधारा की राजनीतिक सरगर्मियों और गतिविधियों का केंद्र बना हुआ है. उपन्यास शुरू से ही उत्सुकता जगाने में सफल होता है और बीच-बीच में छोटे-छोटे ट्विस्ट के साथ पाठकों की रूचि बनाए रखता है.

बड़े स्तर की राजनीति द्वारा छात्रशक्ति का दुरुपयोग, छात्रों के अपने जातिगत अहंकारों की लड़ाई, प्रेम त्रिकोण, छात्र-चुनाव, हिंसा, साजिशें, हत्याएं, बलात्कार जैसे इस उपन्यास के स्थाई चित्र बन गए हैं. उपन्यास में इस सबका काफी प्रमाणिक चित्रण किया गया है जो कि पाठकों को भारतीय राजनीति की बहुत स्पष्ट, बेबाक और क्रूर तस्वीर दिखाता है. किसी भी तरह की राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को, छात्र और राष्ट्रीय राजनीति के आपसी गठजोड़ से बुना गया यह उपन्यास पसंद आएगा.