भारतीय टीम के कप्तान विराट कोहली सिर्फ़ क्रिकेट के मैदान पर ही नहीं बल्कि सोशल मीडिया के भी चैंपियन हैं. वे दुनिया के किसी भी कोने में हों, इंस्टाग्राम पर अपनी तस्वीर डालना कभी नहीं भूलते. ख़ासकर अपनी पत्नी और बॉलीवुड स्टार अनुष्का शर्मा के साथ.

पिछले हफ़्ते की ही बात है. न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ तीन वनडे जीतकर उन्होंने अनुष्का शर्मा के साथ छुट्टियां मनाने का फ़ैसला किया. जल्द ही एक लेक के किनारे दोनों की रोमैंटिक तस्वीर सोशल मीडिया पर आ गई. इंस्टाग्राम पर इस तस्वीर को 38 लाख से ज़्यादा लोगों ने लाइक किया और इस पर 25 हज़ार से भी ज़्यादा कमेंट्स आए.

विराट कोहली और उनकी पत्नी के ऐसे लम्हों को पसंद करने वालों की कमी नहीं है. लेकिन कुछ लोगों को यह ठीक नहीं लगा कि अनुष्का शर्मा भारतीय क्रिकेट टीम के दौरों पर इस तरह जाती हैं जैसे बीसीसीआई ने उन्हें ‘गोद’ ले लिया हो. फिर इससे जुड़ी कुछ ख़बरें भी आईं. इनके मुताबिक खिलाड़ियों के परिवारों की मौजूदगी लंबे विदेश दौरों पर बीसीसीआई के लिए मुसीबत बन गई है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ बीसीसीआई के अधिकारी इनके लिए सुविधाएं जुटाते-जुटाते थक जाते हैं. खिलाड़ी अपने परिवारों पर होने वाला तमाम ख़र्चा तो ख़ुद ही उठाते हैं लेकिन उनकी जरूरतों का ध्यान इन अधिकारियों को ही रखना पड़ता है. जिन खिलाड़ियों के बच्चे हैं वे उनकी ‘नैनी’ यानी आया को भी अपने साथ ले जाते हैं. कुछ खिलाड़ियों के दूर के रिश्तेदार तक टीम के साथ जुड़े रहना चाहते हैं. इन सबके लिए मैच की टिकटों का इंतज़ाम भी करना पड़ता है. टीम मैनेजर्स की शिकायत ख़ासकर उन खिलाड़ियों से है जो सीरीज़ भर एक भी मैच नहीं खेलते, लेकिन दौरे पर उनके परिवार भी उनके साथ रहते हैं.

मामला पेंचीदा है. खिलाड़ियों के परिवार बरसों से विदेशी दौरों पर उनके साथ जाते रहे हैं. कभी कम तो कभी ज़्यादा समय के लिए. पिछले कुछ सालों में इसके लिए कई बार नियम बनाए और बदले गए हैं. विदेश में खिलाड़ियों की पत्नियों के साथ होने पर पाबंदी भी लगाई जा चुकी है. वजह यह बताई गई कि परिवार या गर्लफ़्रेंड्स के साथ होने से क्रिकेटर्स का ध्यान भटक सकता है. कुछ समय पहले तक दौ़रे पर सिर्फ़ दो हफ़्तों के लिए पत्नी या गर्लफ़्रेंड को साथ रखने की अनुमति थी. हालांकि कप्तान विराट कोहली की गुज़ारिश पर यह नियम बदल दिया गया.

शादी से पहले भी अनुष्का शर्मा उनके विदेश दौरों का हिस्सा रहा करती थीं और टीम बस में स़फ़र भी करती थीं. उस वक्त कई बार उन्हें विराट कोहली की अच्छी-बुरी फ़ॉर्म के लिए ज़िम्मेदार माना गया. लेकिन अगर परिवार के साथ रहते टीम लगातार जीत रही हो, खिलाड़ी ख़ुश हों और अच्छा प्रदर्शन कर रहे हों तो? क्या यह सच नहीं है कि हर इंसान ज़िंदगी की छोटी-बड़ी चुनौतियां झेलने के बाद हर रोज़ अपने जीवन साथी के पास लौटना चाहता है, अपने बच्चों के साथ खेलना चाहता है. फिर अगला दिन कितना भी मुश्किल हो, उसका सामना करने की ताक़त आ जाती है. यक़ीनन क्रिकेटर्स भी किसी से अलग नहीं हैं, चाहे उनकी चुनौतियां अलग हों. अहम यह है कि खिलाड़ी अपनी ज़िम्मेदारी किस तरह से निभाते हैं.

क्रिकेट की पिछली पीढ़ी में राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे खिलाड़ी लगभग हर दौरे पर अपने परिवार को साथ रखना पसंद करते थे. उस समय इन सबके बच्चे छोटे थे और टीम होटल में कुछ खिलाड़ियों के कमरों से रात भर बच्चे के रोने की आवाज़ आती थी. इस वजह से ये खिलाड़ी अपने कमरे अलग फ़्लोर पर बुक कराया करते थे ताकि बाक़ी टीम शोर से परेशान न हो.

अनिल कुंबले हों, वीवीएस लक्ष्मण या सचिन तेंदुलकर, इनके परिवार टीम बस में सफ़र करते शायद ही कभी नज़र आए हों. शायद विराट कोहली की कामयाबी ने टीम के अनुशासन को एक अलग अंदाज़ दे दिया है जिसमें ये चीज़ें उतनी गंभीर नहीं रहीं. ज़ाहिर है जब कप्तान कामयाब होता है तो टीम के लिए बनने वाले नियम उसकी मर्ज़ी और चाहत पर भी निर्भर करते हैं. लिहाज़ा कोहली को भी इस पहलू पर विचार करना चाहिए.

बीसीसीआई को एक पेशेवर तरीक़े से और जल्दी ही इसका हल निकालना होगा. इंग्लैंड में होने वाला अगला क्रिकेट वर्ल्ड कप अब कुछ ही महीने दूर है. वहां पर भारतीय क्रिकेट टीम के लाखों फ़ैन्स तो होंगे ही, वहां बसने वाले दोस्त भी होंगे और भारत से जाने वाले रिश्तेदार भी. इन सबकी ओर से टिकटों की भारी मांग होगी. इसके अलावा बोर्ड पर भारत से आने वाले वीआईपी दर्शकों का भी भारी दबाव होगा. इनमें नेता भी शामिल होंगे, बोर्ड के आला अधिकारी भी और फ़िल्मी हस्तियां भीं.

भारतीय टीम ने भी इंग्लैंड जाने से पहले बीसीसीआई से कई चीज़ों की मांग की है. इनमें अपनी मर्ज़ी का खाना और जिम तो हैं ही, खिलाड़ी यह भी चाहते हैं कि वे वेन्यूज़ के बीच बसों के बजाय ट्रेन से सफ़र करें ताकि उनके परिवार हमेशा साथ रहें. बीसीसीआई को इस तरह की जरूरतों और समस्याओं से एक-एक कर निपटना होगा. सबसे पहले उसे खिलाड़ियों से बातचीत कर उनका पक्ष समझना होगा. फिर उन्हें टीम मैनेजर्स के सामने आने वाली मुश्किलों से रू-ब-रू करवाना होगा. बोर्ड चाहे तो ‘फ़ैमिली-ट्रैवल’ की ज़िम्मेदारी एक अलग एजेंसी को भी दे सकता है ताकि परिवार टीम के साथ रहे और बीसीसीआई के ऊपर उसका अतिरिक्त बोझ भी न पड़े. वर्ल्ड कप एक लंबा टूर्नामेंट है जहां मैचों के बीच हफ़्ते भर का फ़ासला भी हो जाता है. ऐसे में वह टीम के लिए ‘फ़ैमिली-डे’ भी तय कर सकता है.

अगर बोर्ड और खिलाड़ी इसका सही बैलेंस बना लें तो वर्ल्ड कप में मैदान और मैदान से बाहर दोनों जगह की शानदार तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी होंगी और हमारी यादों का हिस्सा भी बन जाएंगी.