साल 2003 में मशहूर कोरियोग्राफर रेमो डी’सूजा निर्देशित एक फिल्म आई थी ‘एबीसीडी – एनी बडी कैन डान्स’. जैसा कि फिल्म के टाइटल से पता चलता है कि इसका संदेश था कि डान्स कोई भी कर सकता है और मज़ेदार यह है कि विज्ञान इस बात को शत-प्रतिशत सच मानता है. यहां तक कि नाचने को मनुष्य द्वारा अपना अस्तित्व बनाए रखने की कोशिश का अहम हिस्सा भी माना जाता है. हालांकि इसके बावजूद हममें से कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो कुशलता से नाच पाते हैं, पर हां, नाचने का मजा तो हर कोई ले ही सकता है. अब यहां सिर-पैर वाला एक सवाल सिर उठाता है कि आखिर मनुष्य नाचता क्यों है या थकाने वाला काम होते हुए भी उसे नाचने में आनंद क्यों आता है?

कला के मनोविज्ञान से जुड़े कुछ शोध कहते हैं कि पांच महीने का बच्चा भी बीट्स पहचान सकता है और उस पर हाथ-पैर हिला सकता है. हालांकि वैज्ञानिक इस बात पर संशय जताते हैं कि नाचना किसी की जन्मजात कुशलता हो सकती है लेकिन वे इसे शारीरिक गतिविधियों के समन्वय से जोड़कर जरूर देखते हैं. कहने का मतलब है कि अगर किसी के पास यह क्षमता हो कि वह अपने शरीर को जैसे चाहे लचक दे सके तो वह नाचने की पहली योग्यता पार कर लेता है. और इसके बाद प्रैक्टिस तो है ही.

इसके अलावा एन्थ्रोपोलॉजिस्ट या मानवशास्त्रियों की मानें तो ह्यूमन जेनेटिक्स के कुछ तार भी इससे जुड़ते हैं. बताया जाता है कि प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य नाचने का इस्तेमाल मुश्किल वक्त में आपसी मेलजोल बढ़ाने और संवाद करने के लिए किया करता था. संभवतः यही कारण है कि सामाजिक मेल-जोल के कार्यक्रमों में नाच-गाने का इंतजाम भी किया जाता है.

जहां तक थकाने वाला होने के बावजूद नाचने में आनंद लेने का सवाल है, तो उसकी सबसे बड़ी वजह इसका संगीत से जुड़ा होना भी है. दरअसल संगीत मस्तिष्क के ऑर्बिटोफ्रंटल कॉर्टेक्स को सक्रिय करता है. यह हिस्सा आंखों के ठीक पीछे होता है और आनंद की अनुभूति के लिए उत्तरदायी होता है. ऑर्बिटोफ्रंटल कॉर्टेक्स, दिमाग के मूल यानी सेरेबेलम से कनेक्ट होता है. सेरेबेलम शरीर की मोटर एक्टिविटीज यानी अंगों के आपसी को-ऑर्डिनेशन और टाइमिंग को नियंत्रित करता है.

शरीर को गतिवान करने वाली और आनंद देने वाली तंत्रिकाओं के एक साथ सक्रिय होने के चलते लोग संगीत बजते ही अनचाहे भी थिरकने लगते हैं. ऐसे में ऊर्जा खर्च होने या मेहनत करने का एहसास कम होता है और यही वजह है कि संगीत के साथ एक्सरसाइज करना या किसी और एक्सरसाइज की तुलना में, डांसिंग एक्सरसाइज करना आसान होता है.

नाचने के साथ एक बात यह भी अच्छी होती है कि किसी और को नाचते हुए देखकर भी आनंद लिया जा सकता है. ऐसा कॉर्टेक्स में मौजूद मिरर न्यूरॉन्स के सक्रिय होने के चलते होता है. मिरर न्यूरॉन्स, वे तंत्रिकाएं होती हैं जो संवेदना या समानुभूति का एहसास करवाती हैं. यहां पर यह भी बताते चलते हैं मिरर न्यूरॉन्स ही हैं जिनके कारण एक्शन फिल्में देखते हुए लोग-हाथ पैर चलाना शुरू कर देते हैं.