मोदी सरकार का अंतरिम बजट आए 15 दिन हो गये हैं. अंतरिम बजट में किसानों और मध्यम वर्ग के लिए लोकलुभावन घोषणाओं की भरमार है. प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के मंत्री तक इनके प्रचार में लगे हैं. जानकारों का भी एक तबका मान रहा है कि अंतरिम बजट में किसानों, कामगारों और मध्यम वर्ग के लिए की गई घोषणाओं का मोदी सरकार को चुनावी फायदा मिल सकता है. लेकिन मोदी सरकार ने चुनाव को देखते हुए बजट में जो घोषणायें की हैं, क्या वे वाकई चुनाव में उसे कुछ बड़ा फायदा पहुंचाने वाली हैं?

बजट में तीन घोषणायें सबसे महत्वपूर्ण कही जा सकती हैं. पहली किसानों को हर साल नगद 6000 रुपये देने की घोषणा. दूसरी, पांच लाख रुपये तक की कर योग्य आय होने पर कर से मुक्ति. तीसरी, असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए 3000 रु की पेंशन की योजना. मोदी सरकार के बजट को अगर चुनावी माना जाए तो वह इन्हीं योजनाओं के इर्द-गिर्द घूमता है.

अगर चुनावी लिहाज से देखें तो मोदी सरकार की सबसे बड़ी चिंता किसान हैं. मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावों में हार के बाद यह चिंता और बढ़ी है. ये तीनों कृषि प्रधान राज्य हैं और यहां खेती-किसानी से जुड़ें चुनावी मुद्दे खासी अहमियत रखते हैं. कांग्रेस द्वारा इन राज्यों के चुनाव में किसान कर्ज माफी की घोषणा ने चुनाव पर कितना असर दिखाया, यह अलग विश्लेषण की बात हो सकती है. लेकिन इसने भाजपा के लिए जरुर मुश्किल खड़ी कर दी.

भाजपा ने इसकी काट के लिए किसानों को 6000 रुपये सालाना देने की घोषणा की है और यह अमल में आती हुई भी दिखे, इसके लिए सारी परंपराओं को ताक पर रखकर इसे अगले वित्तीय वर्ष के बजाय दिसंबर 2018 से ही लागू कर दिया है.

मोदी सरकार की पूरी कोशिश है कि वह चुनाव से पहले किसान निधि की दो किस्तों के 4000 रुपये किसानों के खातों में ट्रांसफर कर दे. ऐसे में नौकरशाही 12000 करोड़ किसानों तक धन पहुंचाने के लिए अपनी एड़ी- चोटी का जोर लगा रही है. लेकिन इसे पाने के लिए किसानों को अपने खसरा-खतौनी एकत्र करने और तहसील आदि के भ्रष्टाचार से जूझने की जरूरत भी होगी. इसके बाद प्रति माह मिलने वाले सिर्फ 500 रुपये क्या किसी किसान को इतना प्रभावित कर सकते हैं कि वह अपना वोट इन्हें दिलाने वालों को दे दे?

इसके अतिरिक्त गांवों में जोतों के बंटवारे कुछ इस तरह के होते हैं कि परिवार के मुखिया के जीवित रहते ही उसके बेटे या अन्य सगे संबंधी जमीन का बंटवारा कर उस पर किसानी कर रहे होते हैं. जबकि जमीन एक आदमी के नाम ही होती है. ऐसे में या तो पैसे उसके खाते में ही आएंगे जिसके नाम जमीन होगी, या फिर जमीन दो हेक्टेयर से ज्यादा होने पर इसे जोतने वाले सभी लोग किसान निधि योजना से ही बाहर हो जाएंगे. सरकार को यह अंदाजा हो या न हो लेकिन गांवों में इस पर चर्चा शुरु हो गई है. जाहिर है कि अगर किसानों को नगद पैसे देने की योजना कुछ चुनावी लाभ देगी भी तो उसका दो और दो चार का गणित वैसा नहीं होने वाला, जैसा भाजपा के रणनीतिकार सोच रहे हैं. जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं हैं, वहां पर अड़चनें और भी ज्यादा होंगी.

इसके अलावा किसानों को नगद देने की योजना अपने स्वरुप में उतनी भी नई नहीं है. तेलंगाना किसानों को आठ हजार सालाना और उड़ीसा की सरकार सलाना दस हजार नगद किसानों को देने की योजना चला रहे हैं. अभी यह भी साफ नहीं है कि क्या इन राज्यों के किसानों को दोनों योजनाओं का लाभ मिलेगा या केंद्र और राज्य सरकार कुछ अंशदान तय करेंगे. अगर इन दोनों राज्यों के किसानों को दोनों योजनाओं का लाभ मिला तो संभव है कि राज्यों में लोकसभा चुनाव से पहले ही किसानों को नगदी देने की योजनाओं की होड़ शुरु हो जाए. जानकार मान भी रहे हैं कि गैर भाजपा राज्य सरकारें आर्थिक तंगी के बाद भी लोक सभा चुनाव की आचार संहिता से पहले किसानों के लिए कुछ बड़ी घोषणायें कर सकती हैं.

इसके अलावा राजनीतिक-आर्थिक जानकार मानते हैं कि किसानों के लिए इस तरह की योजनायें चुनावी लाभ में उत्प्रेरक का काम कर सकती हैं लेकिन एकाएक उसका नया आधार नहीं बनाती हैं. किसान नगद पैसे से प्रभावित हो सकता है, लेकिन वह इसकी वजह से बाकी दूसरे समीकरण बिल्कुल छोड़ दे ऐसा होना मुश्किल है. उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश,बिहार में मध्यम कृषक जातियां खेती के अलावा जाति जैसे कई कारकों से भी संचालित होती हैं. और सामाजिक समीकरणों को सिर्फ किसान निधि से प्रभावित करना बेहद मुश्किल दिखता है.

आयकर में मध्यम वर्ग को थोड़ी राहत जरुर मिली है. लेकिन नौकरीपेशा वर्ग की अब वह खुशी काफूर हो चुकी है जो वित्त मंत्री पीयूष गोयल का बजट सुनकर उसे मिली थी. पांच लाख तक ‘कर योग्य आय’ होने पर दी गई छूट को पांच लाख तक की आय का कर से मुक्त होना समझ लिया गया. जैसे-जैसे जानकारों ने इस मसले को पूरा समझा-समझाया इसके बाद उन नौकरीपेशा लोगों की उम्मीदें जाती रहीं जिनकी कर योग्य आय पांच लाख से ज्यादा बनती है. वित्त मंत्री ने जो उदाहरण देकर समझाया था कि कैसे दस लाख तक कमाने वाला अपना आयकर पूरा बचा सकता है, वह तभी संभव है जब आप अधिकतम बचत के साथ हेल्थ इंशोयरेंस और होम लोन आदि भी लें. जाहिर है कि यह आम तौर पर संभव नहीं होता. ऐसे में छह-सात लाख रुपये प्रति वर्ष कमाने वाले ज्यादातर लोगों को पुरानी दर पर ही आयकर देना पड़ेगा.

यह एक तकनीकी बात है. लेकिन मध्यम वर्ग आमतौर पर भाजपा का समर्थक है. ज्यादा टैक्स से वह नाखुश होता है और उसकी आवाज संचार माध्यमों में ज्यादा गूंजती भी है. लेकिन महज इस बात से उसका पूरा वोटिंग पैटर्न नहीं बदल सकता. इनकम टैक्स में छूट पर नौकरीपेशा लोगों का रुख मिलाजुला है. जानकार मानते हैं कि पांच लाख कर योग्य पर पूरा रिबैट छोटे कारोबारियों के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा जो अपने खर्चे को ज्यादा दिखाकर अपनी करयोग्य आय पांच लाख तक ले आएंगे. नौकरीपेशा वर्ग को अगर समूह के तौर पर देखें तो इस मामले में वह न खुशी, न गम जैसी स्थिति में दिखता है.

तीसरी, बड़ी योजना असंगठित क्षेत्र के कामगारों की पेंशन के बारे में है. इसमें प्रतिमाह 55 रुपये का योगदान करने पर 60 साल की उम्र के बाद 3000 रुपये मासिक पेंशन की घोषणा की गई है. असंगठित क्षेत्र में इस तरह की योजनाओं का भारत मेंं ठीक से अमल हमेशा दिक्कततलब रहा है. जानकार मानते हैं कि 60 साल के बाद पेंशन की बात सियासी लाभ के नजरिये से बहुत आकर्षण पैदा नहीं करती. इसके अलावा इसके क्रियान्वयन का ढांचा भी साफ नहीं है. इसलिए ऐसा नहीं लगता कि यह लोगों में इतनी उत्सुकता पैदा कर पाएगी. इसके अलावा 40 की उम्र से ज्यादा के लोगों को इस योजना के अलग नियमों ने चुनावी लिहाज से इसका आकर्षण और कम कर दिया है.

अंतरिम बजट मेें की गई घोषणायें चुनावी मकसद से की गई हैं, लेकिन ये घोषणायें चुनावों में अपने बलबूते कोई बड़ा असर डालती नहीं दिखती. हां, अगर किसी राजनीतिक-सामाजिक समीकरण को इनका साथ मिल जाए तो अलग बात है. लेकिन तब भी इन घोषणाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण वे राजनीतिक-सामाजिक घोषणाएं ही होंंगी.