भारत में कुछ समय से ज़रूरतमंदों को बिना शर्त हर महीने एक आधारभूत आय (बेसिक इन्कम) देने पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है. अटकलें तो यह भी हैं कि चुनावों के बाद आने वाले मुख्य बजट में ऐसे किसी क़दम की घोषणा हो सकती है. राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में तो बेरोजगारों को हर महीने एक निश्चित भत्ता देने का ऐलान हो भी गया है. इसे गरीबी दूर करने के एक कारगर उपाय के तौर पर देखा जा रहा है.

54 लाख जनसंख्या वाले यूरोपीय देश फ़िनलैंड में जनवरी 2017 से एक ऐसा ही प्रयोग चल रहा था. उसके आरंभिक परिणाम भारत के लिए भी दिलचस्प हो सकते हैं, हालांकि भारत की स्थिति फ़िनलैंड से बहुत अलग है.

फ़िनलैंड यूरोप के धुर उत्तर में उत्तरी ध्रुव के बिल्कुल पास बसा है. फ़रवरी के मध्य वाले इन दिनों यहां तापमान शून्य से पांच से लेकर 21 डिग्री सेल्सियस तक नीचे रहता है. देश के धुर दक्षिण में स्थित राजधानी हेलसिंकी में दिन का उजाला इन दिनों मात्र छह घंटे का है, जबकि धुर उत्तर में 17 जनवरी तक ध्रुवीय रात चल रही थी. वहां सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच अभी केवल डेढ़ घंटे का अंतर है.

आर्थिक एवं वित्तीय संकट की मार

सर्दियों में कड़ाके की ठंड, हर तरफ बर्फ ही बर्फ और अंतहीन लगती रातों वाला फ़िनलैंड, यूरोप सहित पश्चिमी देशों में 2008 से चल रहे आर्थिक एवं वित्तीय संकट की मार से उबर नहीं पा रहा था. बेरोज़गारी का अनुपात 2008 के 6.3 प्रतिशत से बढ़ते-बढ़ते 2016 में 9.3 प्रतिशत हो गया था. इससे समाज कल्याण और सामाजिक सुरक्षा का ख़र्च इतना बढ़ गया था कि सरकार को लीक से हट कर नए क़िस्म के उपाय ढूंढने पड़ रहे थे.

फ़िनलैंड के प्रधानमंत्री युहा सीपिला खुद एक उद्योगपति हैं. उन्हें सलाह दी गयी कि क्यों न देश में बिना शर्त आधारभूत आय वाली थ्योरी को आजमा कर देखा जाये. तय हुआ कि देश के सभी बेरोज़गारों को कोई आधारभूत आय देने के बदले, लकी ड्रा से चुने गये दो हज़ार बेरोज़गारों के साथ दो साल तक चलने वाला एक प्रयोग किया जाये. 25 से 58 साल तक की आयु के सभी बेरोज़गारों से कहा गया कि वे इस प्रयोग में शामिल होने के लिए आवेदन करें, आधारभूत आय के तौर पर उन्हें दो साल तक हर महीने 560 यूरो मिलेंगे (उस समय लगभग 40 हज़ार रुपये). जिनके बच्चे होंगे, उन्हें हर बच्चे के लिए बालभत्ता अलग से मिलेगा.

बिना किसी काम और शर्त के आय

आवेदकों से यह भी कहा गया कि न कोई दूसरी शर्त होगी और न उनसे कुछ पूछा जायेगा कि वे मिल रहे पैसे का क्या उपयोग कर रहे हैं. उनसे कोई अतिरिक्त कर वगैरह भी नहीं लिया जायेगा. इन दो वर्षों के दौरान उन्हें यदि कोई रोज़गार मिलता है या वे अपना ही कोई काम-धंधा शुरू करते हैं, तो इसका स्वागत किया जायेगा. उनसे कोई हिसाब-किताब नहीं मांगा जायेगा. उनकी आय में कोई कटौती भी नहीं होगी.

25 दिसंबर 2016 को लॉटरी निकाल कर पूरे देश से आये आवेदनों में से दो हज़ार बेरोज़गारों को इस प्रयोग के लिए चुना गया. पहली जनवरी 2017 से प्रयोग शुरू हो गया. चुने हुए लोगों को अपनी तरफ से कुछ करे-धरे बिना हर महीने 560 यूरो मिलने लगे. सोचा यह जा रहा था कि एक निश्चित आधारभूत आय मिलने से लोगों की यह चिंता कम हो जायेगी कि उनका कल कैसे बीतेगा. वे इस आय से संतुष्ट हो कर बैठ नहीं जायेंगे, बल्कि अपनी आय बढ़ाने के कुछ दूसरे उपाय भी करेंगे.

सक्रियता और रचनात्मकता की अपेक्षा

माना जा रहा था कि जब लोग खुद ही सक्रियता और रचनात्मकता दिखायेंगे तो उन्हें बार-बार रोज़गार कार्यालयों के फेरे नहीं लगाने पड़ेंगे. इन कार्यालयों में काम का बोझ और उनके कर्चारियों की संख्या तब घटायी जा सकती है. दफ़्तरशाही के ख़र्च में जो कमी आयेगी, उसे समाज के लिए कल्याणकारी कार्यों की दिशा में मोड़ा जा सकता है. प्रयोग से यदि इन अनुमानों की पुष्टि हुई तो बाद में उसे राष्ट्रीय स्तर पर सबके लिए भी लागू किया जा सकता है.

फ़िनलैंड एक मंहगा देश है. सरकार भी जानती थी कि 560 यूरो मासिक आय बर्फीली ठंड वाले इस देश में ठीक-ठाक रहन-सहन के लिए पर्याप्त नहीं है. पर्याप्त होती इससे लगभग दुगुनी आय. लेकिन, सरकार यह भी नहीं चाह सकती थी कि बैठे ठाले के लिए इतना पैसा दिया जाये कि लोग कामचोर बन जायें, कुछ करने-धरने का नाम ही न लें. अतः आधारभूत आय उतनी ही हो कि अपनी आमदनी और अधिक बढ़ने के लिए निजी पहल और निजी उद्यमशीलता की आवश्यकता भी बनी रहे.

आरंभिक विश्लेषण के परिणाम

सारी दुनिया की आंखें छोटे-से फ़िनलैंड के इस अभिनव प्रयोग पर लगी हुई थीं. प्रयोग समाप्त होने के एक महीने बाद, इस प्रयोग की संचालक फ़िनलैंड की सामाजिक सुरक्षा सेवा ‘केला’ (केएएलए) ने बीती फ़रवरी को, सरसरे आरंभिक विश्लेषण के परिणाम बताये. इनके अनुसार, बिना शर्त आधारभूत आय से लाभान्वित हुए बेरोज़गार लोगों के स्वास्थ्य में तो उल्लेखनीय सुधार हुआ है, पर उनकी बेरोज़गारी में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई है.

बेरोज़गारों के एक अलग समूह की तुलना में, जिन्हें आधारभूत आय का लाभ नहीं मिल रहा था, इस आय को पाने वालों के बीच तनाव, चिंता तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं घटी हैं. ‘केला’ की एक महिला अधिकारी का कहना था, ‘वे भविष्य के प्रति कहीं अधिक आशावान बने हैं.’

इस प्रयोग के संयोजक ओहतो कनिनेन का कहना था, ‘आधारभूत आय पाने वाले कोई नया काम पाने में उन लोगों के समूह से बेहतर या बुरे नहीं सिद्ध हुए, जिन्हें यह लाभ नहीं मिल रहा था.’ साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह निष्कर्ष प्रयोग के केवल पहले वर्ष के तथ्यों और आंकड़ों पर आधारित है, दूसरे वर्ष का विश्लेषण अभी नहीं हो पाया है. संपूर्ण विश्लेषण संभवतः 2020 तक ही हो पायेगा.

निजी प्रयास के उत्साह की कमी रही

प्रयोगकर्ता सोच रहे थे कि सामान्य बेरोज़गारी भत्ता पाने वालों की तुलना में आधारभूत आय पाने वाले बोरोज़गार, कोई नया रोज़गार पाने या अपना ही कोई कारोबार शुरू करने के प्रति अधिक उत्साह दिखायेंगे. लेकिन ऐसा बहुत कम हुआ. फ़िनलैंड में सामान्य बेरोज़गारी भत्ता 550 यूरो मासिक है. कोई अतिरिक्त आय होने पर वह कम हो जाता है या नया काम मिलते ही बंद हो जाता है, जबकि आधारभूत आय कोई नया काम मिलने पर भी पूरे दो साल चलती रहती. उसका चलते रहना कोई नयी नौकरी तलाशने या अपना कोई कारोबार शुरू करने की प्रेरणा होना चाहिये था. पर, प्रयोग के पहले वर्ष के आरंभिक विश्लेषण से यही आभास मिलता है कि ऐसा बहुत कम ही देखने में आया.

फ़िनलैंड के इस बहुचर्चित प्रयोग में शामिल होने की जिन दो हज़ार बेरोज़गारों की लॉटरी लगी थी, उनके बैंक खातें में चार दिसंबर 2018 को अंतिम बार 560 यूरो जमा हुए. उनमें से अब तक केवल 20 लोगों ने अपने अनुभव मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक किये हैं. इन सबके अनुभव कुल मिलाकर अच्छे रहे हैं. उदाहरण के लिए, 35 वर्षीय सीनी मार्त्तिनेन, बेरोज़गार होने से पहले, फ़िनलैंड की एक कंप्यूटर फ़र्म की ओर से एडिनबर्ग़, कोपेनहेगन और ब्रसेल्स में लोगों को कंप्यूटर से काम करने की ट्रेनिंग दिया करती थीं. पिता को अजलाइमर (भुलक्कड़पन) रोग हो जाने के कारण 2016 में उन्हें स्वदेश लौटना पड़ा.

लॉटरी लगने का पत्र खोला ही नहीं

स्वदेश लौटते ही सीनी की नौकरी चली गई. कोई नया काम-धंधा नहीं मिल रहा था. इसलिए उन्होंने आधारभूत आय वाले प्रयोग में भाग लेने के लिए आवेदन कर दिया. कुछ दिन बाद एक चिट्ठी आयी. चिट्ठी का लिफ़ाफा किसी सरकारी पत्र जैसा लग रहा था इसलिए सीनी मार्त्तिनेन उसे पहले खोला ही नहीं. कुछ दिन बाद जब कभी खोला, तो पाया कि उनका नाम लॉटरी में निकला है और उन्हें दो साल तक हर महीने 560 यूरो मिला करेंगे. चार महीने बाद, अप्रैल 2017 में उन्हें एक प्रतिष्ठान में 3000 यूरो की नौकरी भी मिल गयी. साथ-साथ आधारभूत आय भी पिछले दिसंबर महीने तक चलती रही.

हस्तशिल्पी युहा यैर्विनेन से सैकड़ों पत्रकार बात कर चुके हैं. उन्हें अपने जीवन में कई तरह के काम मिले और छूटे. हर बार कुछ नया तलाशना पड़ा. कुछ नया मिलने तक बेरोज़गारी भत्ता पाने के लिए उन्हें रोज़गार ऑफ़िस के चक्कर लगाने और सवालों के जवाब देने पड़े. एक निजी कारोबार का छह साल पहले दीवाला भी निकल गया. आधारभूत आय वाले प्रयोग के लिए उनके नाम भी लॉटरी खुली. इस आय के पैसे से यैर्विनेन ने ओझैती-सोखैती करने वालों के लिए ढोल-डमरू जैसे सामान बनाने का कारोबार शुरू किया. इन्हें वे इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में बेचते हैं. यैर्विनेन का कहना है, ‘मेरे पास अब इतना काम है कि मैं उसी से पार नहीं पा रहा हूं.’

मतसर्वेक्षण भी किया गया

आधारभूत आय पाने वाले और उसे नहीं पाने वाले बेरोज़गारों के बीच टेलीफ़ोन के माध्यम से एक मतसर्वेक्षण भी किया गया. पाने वालों में से 55 प्रतिशत ने कहा कि उनका स्वास्थ्य अब पहले की अपेक्षा अच्छा या बहुत अच्छा है. नहीं पाने वालों में ऐसा कहने वालों का अनुपात 46 प्रतिशत ही था. आधारभूत आय पाने वाले केवल 17 प्रतिशत बेरोज़गारों ने, इस आय के बावजूद, बहुत तनावग्रस्त होने की शिकायत की. नहीं पाने वाले बेरोज़गारों में यह अनुपात 25 प्रतिशत था. इस सर्वेक्षण से यह बात भी सामने आयी कि जिन्हें आधारभूत आय मिल रही थी, वे अपने एक बेहतर निजी भविष्य के प्रति अधिक आशावान थे.

इस प्रयोग पर अब तक क़रीब दो करोड़ यूरो का ख़र्च आया है. प्रयोग की समाप्ति पर फ़िनलैंड की समाज कल्याण मंत्री पिर्को मात्तिला ने कहा कि देशव्यापी आधारभूत आय शुरू करने का फ़िलहाल कोई विचार नहीं है फिर भी वे इस प्रयोग को बहुत सफल मानती हैं. इस प्रयोग से जो तथ्य और आंकड़े जुटाये गये हैं, उन से देश की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली (यानी स्वास्थ्य, रहन-सहन और जीवनस्तर) को सुधारने में सहायता मिल सकती है. फ़िनलैंड की वर्तमान सामाजिक सुरक्षा प्रणाली को बहुत ही जटिल और दफ्तरशाही माना जाता है.

आधारभूत आय के सही मॉडल की तलाश

फ़िनलैंड की सरकार वास्तव में आधारभूत आय का कोई ऐसा मॉडल चाहती है, जो बजट पर अतिरिक्त बोझ न बने और जिसे कर-राजस्व द्वारा ही चलाया जा सके. लेकिन 550 यूरो के न्यूनतम बेरोज़गारी भत्ते को ही देशव्यापी आधारभूत मासिक आय बनाने पर भी हर वर्ष क़रीब 11 अरब यूरो के बराबर अतिरिक्त धन जुटाना पड़ेगा. उसे जुटाने के लिए आयकर की दर कम से कम 43 प्रतिशत कर देनी पड़ेगी. यदि आधारभूत आय 750 यूरो मासिक हुई, तो आयकर की दर बढ़ कर 50.5 प्रतिशत हो जाएगी.

बहुत ठंडा और महंगा देश होने के कारण फ़िनलैंड में किसी हद तक ठीक-ठाक जीवनयापन के लिए वास्तव में प्रति वयस्क क़रीब 1500 यूरो की मासिक आय होनी चाहिये. सरकार यदि इसे संभव बनाना चाहेगी, तो उसे काम-धंधे में लगे लोगों से 79 प्रतिशत की दर से आयकर वसूलना होगा! इससे जो कुहराम मचेगा, उसकी कल्पना हर कोई कर सकता है.

सरकार की उहापोह

दूसरी ओर, फ़िनलैंड की सरकार के सामने यह धर्मसंकट भी है कि सभी उन्नत औद्योगिक देशों की तरह वहां के औद्योगिक जगत में भी मनुष्यों की जगह मशीनें लेती जा रही हैं. संवेदनाशून्य कंप्यूटर और वेदनाशून्य रोबोट मनुष्य की बुद्धि और शक्ति को विस्थापित कर रहे हैं. वे न तो कोई कर देते हैं और न ही सामाजिक सुरक्षा प्रणाली के लिए कोई अंशदान. ऐसे में, सरकार के लिए य़ह एक विकट प्रश्न बनता जा रहा है कि बिना किसी आधारभूत आय व्यवस्था के, मशीनों द्वारा विस्थापित हो रहे बेरोज़गारों के लिए मानवोचित जीवन सुनिश्चित भला कैसे किया जाए!