‘अमौसा के मेला‘ में कैलाश गौतम जब लिखते हैं कि ‘एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा. कमरी में केहू, कथरी में केहू, रजाई में केहू, दुलाई में केहू.’ तो वे कुंभ के मेले की तस्वीर भर नहीं रच रहे होते हैं. उनकी यह कविता दरअसल मेले की रवायत, उसमें शरीक होने वाली बहुसंख्य आबादी की श्रद्धा और आस्था के रेखांकन के अलावा मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक नज़रिये से रचा गया सटीक आख्यान भी है. पढ़ने-सुनने वालों को उनकी कविता के भावों से तस्वीरें रचने की आज़ादी है- गुलब्बन की दुलहिन और चम्पा-चमेली ही नहीं, उनके जीजा और गोबरधन के सरहज के भावों की कल्पना आप ख़ुद कर सकते हैं, भले आप उस परिवेश से वाक़िफ़ न हों.

शंकर महादेवन की गाई प्रसून जोशी की कविता को अमौसा मेले का उत्तर आधुनिक संस्करण कहने में संकोच होता है, क्योंकि यह तीर्थ करने वालों की तरफ से नहीं, तीर्थ की मार्केटिंग करने वालों के लिए लिखी गई है, जिसमें ‘चलो चलो कुंभ चलो’ के आग्रह के साथ ही कुंभ चलने का हासिल ललचाता लगता है. यूपी टूरिज़्म ने मेले की मार्केटिंग के लिए इस बार जितने जतन किए, कुंभ गान उन्हीं में से एक है. रेडियो, सिनेमा, सोशल मीडिया पर लगातार बने हुए इस गान को सुनते-देखते हुए कई बार कुंभ के प्रतीक चिन्ह की याद भी आ जाती है. यह प्रतीक चिन्ह भी उसी मैकैन एरिक्सन ने बनाया है जिसने प्रसून जोशी प्रमुख हैं. इसमें स्नान करते, शंख फूंकते तीन साधुओं की छवि के साथ मंदिर हैं और सामने की ओर कलश.

कुंभ गान शंख ध्वनि से ही शुरू होता है, ‘जहां शंख प्राण तक गूंज उठें, जहां भक्ति लहर उठकर बोले…’. प्रतीक चिन्ह में दाईं ओर नदी के साथ तीर्थ यात्रियों की क़तार काफ़ी ग़ौर करने पर ही देखी जा सकती है, वह भी तब जब प्रतीक चिन्ह काफी बड़ा हो. कुंभ हो या माघ मेला, यहां जुटने वालों लाखों लोगों का आकर्षण नहान (स्नान) है, न कि मंदिर या साधु. हां, इससे हिंदुत्व की मुनादी का वह उद्देश्य ज़रूर पूरा होता लगता है, महीनों से नेता और अफ़सर जिस पर अड़े हुए हैं.

यूपी टूरिज़्म ने अपने प्रचार अभियान में अमिताभ बच्चन को भी शामिल किया है. कुंभ मेले को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल करने के यूनेस्को के ताज़ा फ़ैसले की जानकारी देते हुए वे लोगों को कुंभ में आने का न्योता दे रहे हैं. बता रहे हैं कि कुंभ में वे भी दो-तीन बार गए हैं और यह अद्भुत आयोजन है. यह भी कि यहां क़िले के पास लेटे हुए हनुमान जी का एक मंदिर है, जहां वे बचपन में अक्सर जाते थे और लौटते वक़्त दूध-जलेबी खाते थे. अरैल में ट्रैवल कंपनियों के स्विस कॉटेज, बेशुमार सेल्फ़ी पॉइंट्स, पांटून पुल, संस्कृति ग्राम, लेज़र के ज़रिए कुम्भ कथा और सांस्कृतिक कार्यक्रम, कॉफ़ी टेबल बुक्स, झांकियां, अम्यूज़मेंट पार्क, असली वाला अक्षय वट और भी जाने क्या-क्या! पर्यटन की अभूतपूर्व परिकल्पना.

कुंभ की सरकारी वेबसाइट पर तमाम जानकारियों के साथ ही ‘कुंभ पर अध्ययन’ पेज पर संदर्भ-ग्रंथ की सूची देखना कम दिलचस्प नहीं है. इस पेज पर दस किताबों का ज़िक्र है. इनमें से तीन आईएएस अफसरों की लिखी हुई हैं, हालांकि इनमें से दो लेखकों के नाम के साथ ही उनके आईएएस होने का उल्लेख है. कुंभ और कल्पवास के महत्व और संक्रामक बीमारियों की रोकथाम पर अंग्रेजी-हिन्दी में 13 पन्नों का एक शोध निष्कर्ष भी इस सूची में शामिल है. यों तो कुंभ पर लिखी किताबों और शोध-पत्रों की सूची काफी लंबी है. लेकिन मुमकिन है कि वेबसाइट के लिए उन्हीं का चयन ज़रूरी लगा हो जो महान मेला, विलक्षण घटना, साधु, अमृतपर्व, अमरत्व और पवित्र स्नान जैसे तत्वों की व्याख्या करते हों.

इसके बाद संदर्भ सूची में प्रो. कामा मैकलीन के कुंभ पर शोध का कोई उल्लेख नहीं होने पर कोई हैरानी नहीं होती, बल्कि इसकी वजह भी साफ समझ में आ जाती है. पिलग्रेमिज एंड पावरः द कुंभ मेला इन इलाहाबाद, 1765-1954 नाम की किताब में प्रो. मैकलीन कुंभ की प्राचीनता पर अपने शोध के निष्कर्ष में तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों, अंग्रेज़ हुक़्मरानों के स्वार्थ-समझ और प्रयागवाल पंडों और साधुओं की भूमिका के हवाले से कुंभ को ऐतिहासिक बताती हैं. किताब में कुंभ के इतिहास का वृहद विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि यह सन् 1857 के गदर के बाद उपजी स्थितियों में ब्रिटिश नियंत्रण को नकारने की प्रयागवालों (ब्राह्मण पंडों) की कोशिश का नतीजा है. इलाहाबाद में कुंभ का ज़िक्र न तो पुराणों में और न ही हिंदुस्तान आए विदेशियों के यात्रा वृतांत में कहीं मिलता है. प्रो. जेम्स जी के निबंध ‘द कन्शट्रक्शन ऑफ कुंभ मेला’ में भी यह बात कही गई है. तमाम शोधकर्ता सन् 1868 के सरकारी दस्तावेज़ में इलाहाबाद कुंभ के उल्लेख से पहले इसके बारे में कुछ नहीं पाते.

अपनी किताब ‘ब्रांच लाइन टु इटरनिटी’ में सन् 1960 के कुंभ मेले की यात्रा का जि़क्र करते हुए घुमक्कड़ बिल एटकिन ने लिखा है कि मेले में बाक़ी सब बहुत प्रभावशाली लगा सिवाय इसके आध्यात्मिक पहलू के, जो स्वत:स्फूर्त कम और नियोजित ज्यादा दिखता था. उन्होंने लिखा है, ‘वे जब भी किसी विदेशी (पैसे वाले) को देखते, साधु ऊपर की ओर आंखें चढ़ाकर बैठ जाते मानो ध्यान की उच्चतम अवस्था में हों और उनके चेले यह ड्रामा देखने के बदले पहले से दस्तखत की हुई रसीद देकर चंदा उगाहते.’

ज़ाहिर है कि ऐसे संदर्भ कुंभ की प्रचलित मान्यताओं, विश्वासों का खण्डन करते हैं तो इनके उल्लेख से बचा जाना ही बेहतर. इसी के बरक्स हम निर्मल वर्मा के उस रिपोर्ताज को भी याद कर सकते हैं, जो उन्होंने ‘सुलगती टहनी‘ शीर्षक से लिखा था और जो ‘कला का जोख़िम‘ नाम की उनकी किताब में शामिल है.

निर्मल वर्मा लिखते हैं, ‘वे जा रहे हैं – गंगा तट सूना पड़ता जा रहा है. विधवाएं, मरणासन्न बूढ़े, वह बंगाली लड़की जिसे सुबह के अंधेरे में देखा था. वे लौट रहे हैं. सबके हाथों में गीली धोतियां, तौलिए हैं, गगरियों और लोटों में गंगाजल भरा है. मैं इन्हें फिर कभी नहीं देखूंगा. कुछ दिनों में वे सब हिन्दुस्तान के सुदूर कोनों में खो जाएंगे. लेकिन एक दिन हम फिर मिलेंगे – मृत्यु की घड़ी में आज का गंगाजल – उसकी कुछ बूंदें – उनके चेहरों पर छिड़की जाएंगी. आंख खुलेगी. सम्भव है आज की सुबह बरसों बाद स्मृति पर अटक जाए – फूस के छप्पर, इलाहाबाद का किला, मेले पर उड़ती धूल – क्या याद आएगा? एक बूंद में कितनी स्मृतियां गले के भीतर ढरती जाएंगी. अंगूर का रस जिस तरह फर्मेण्ट होकर शराब बन जाता है, उसी तरह आज का यह पानी अरसे बाद अमृत बनेगा – हज़ारों स्मृतियों की धूप में पका हुआ...

...लेकिन अभी नहीं, अभी यह मैला पानी है जिसमें नयपाल जैसे लेखक केवल मैल और गंदगी देखते हैं. जो आदमी बाहर से देखता है वह सिर्फ ऊपरी सतह देख पाता है, लेकिन ऊपर की सतह नीचे के मर्म से जुड़ी है – हम कैंची से किसी अंधविश्वास को काटेंगे तो उसके साथ सच्चे विश्वास का मर्म भी उधड़ आएगा. किसी भी संस्कृति की धूल उसकी आत्मा से जुड़ी होती है – एक को हटाते ही खुद उसके मर्म का एक हिस्सा बाहर निकल आता है .. खून और मांस से लिथड़ा हुआ – ड्राइक्लीनर की उस चेतावनी की तरह जिसमें कहा जाता है कि कुछ धब्बे नहीं धोए जा सकते, क्योंकि उन्हें धोने से कपड़ा भी फट जाएगा. हम पांयचे उठाकर किसी संस्कृति के कीचड़ से क्यों न बच निकलें, दुर्भाग्यवश उसके सत्य से भी अछूते रह जाएंगे.’

अभी सिर्फ़ एक बात और. मौलिक सरकारी इंतज़ामों की फेहरिस्त में ‘हेली-टूरिज़्म’ का ज़िक्र हजम हो जाता अगर अरैल घाट पर पंडित राममूर्ति तिवारी से मुलाक़ात न हुई होती. सुल्तानपुर के पंडित राममूर्ति सन् 1959 में इलाहाबाद आ गए थे और तभी से अरैल घाट पर बैठते हैं. उन्होंने 1960 के अर्द्धकुंभ के बारे में बात करते हुए बताया था कि उस साल अरैल में हेलीपैड बना था. पांच रुपये देकर लोग हेलीकॉप्टर में सवार होकर मेले का एक चक्कर लगा सकते थे. हालांकि उसके बाद ऐसा इंतज़ाम कभी नहीं हुआ.