दिल्ली स्थित इंडिया गेट को बने आज 88 साल पूरे हो गए हैं. यह स्मारक राजधानी के मुख्य आकर्षणों में से एक है जहां रोज़ाना सैकड़ों-हज़ारों लोग घूमने आते हैं. इंडिया गेट देश के शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए बनाया गया था. इस कारण देशवासियों का इस स्मारक से भावनात्मक लगाव है. इन दिनों इसे लेकर सोशल मीडिया पर एक मैसेज वायरल है.

एक वर्ग विशेष इंडिया गेट को लेकर दावा कर रहा है कि इस शहीद स्मारक पर किसी ‘संघी’ यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सदस्य का नाम नहीं है. फ़ेसबुक, ट्विटर और वॉट्सएप पर वायरल इस संदेश के मुताबिक इंडिया गेट पर अंकित शहीदों के नामों में सवर्ण नामों की संख्या केवल 598 है और संघी तो एक भी नहीं है. मैसेज में लिखा है :

‘दिल्ली के इंडिया गेट पर कुल  95,300 स्वतंत्रता सेनानियों के नाम हैं जिनमें...

मुसलमान - 61,395

सिख - 8,050

पिछड़े - 14,480

दलित - 10,777

सवर्ण - 598

संघी - 00’

वायरल मैसेज
वायरल मैसेज

सोशल मीडिया यूज़र्स बड़ी संख्या में इस मैसेज को शेयर कर रहे हैं. ऐसा करते हुए वे आरएसएस व उसके सदस्यों और सवर्णों को निशाने पर ले रहे हैं. इस संदेश पर ठहरकर गौर करें तो समझ आता है कि यह सब बिना सोचे-समझे एक भ्रामक जानकारी पर यक़ीन करने की वजह से हो रहा है. इंडिया गेट पर लिखे नामों को संघ से जोड़ने का कोई तुक नहीं है और ऐसा करने वालों को इस स्मारक का थोड़ा सा इतिहास जान लेना चाहिए.

इंडिया गेट का अनावरण 1933 में आज ही के दिन किया गया था. उस समय तक औपचारिक रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (1925 से) सक्रिय हो चुका था. इसके बावजूद ऐसे किसी सैनिक का नाम इंडिया गेट पर नहीं लिखा है, जो कभी संघ का सदस्य रहा हो. सिर्फ इन जानकारियों के हिसाब से यह बात कही जा सकती है. लेकिन एक और जानकारी पर गौर करें तो साफ समझ आता है कि यह दावा पूरी तरह भ्रामक है. दरअसल इंडिया गेट के निर्माण की शुरुआत 10 फ़रवरी, 1921 को हुई थी. यानी आरएसएस बनने के चार साल पहले ही इसकी नींव डाली जा चुकी थी.

1914 से 1918 के बीच हुए पहले विश्व युद्ध और 1919 में हुए आंग्ल-अफ़ग़ानिस्तान युद्ध के समय ब्रिटिश आर्मी की ओर से लड़ते हुए हज़ारों भारतीय जवान शहीद हुए थे. उन्हीं की याद में 1921 में इस स्मारक के निर्माण का काम शुरू हुआ था. और यह काम 12 फ़रवरी, 1933 को मुकम्मल हुआ जब स्मारक आम लोगों के लिए खोल दिया गया. इन जानकारियों से साफ़ है कि इंडिया गेट के इतिहास का आरएसएस के इतिहास कोई लेना-देना नहीं है.

इस वायरल मैसेज में इंडिया गेट पर अंकित नामों की संख्या 95,300 बताई गई है. यह जानकारी भी ग़लत है, और शहीद सैनिकों की असल संख्या व स्मारक पर अंकित कुल नामों की संख्या से ज़्यादा है. इस बारे में कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्ज़ कमीशन (सीडब्ल्यूसीजी) की वेबसाइट विश्वसनीय स्रोतों में से एक है. इसके मुताबिक़ इंडिया गेट पर खुदे नामों की संख्या 13,220 है. और सभी नाम भारतीय नहीं हैं. सीडब्ल्यूजीसी के मुताबिक़ इनमें से कुछ नाम ब्रिटिश सैनिकों व अधिकारियों के भी हैं. इनकी संख्या 959 है. जाहिर है कि वायरल मैसेज तुक्का लगाकर तैयार किया गया है, इसलिए उसमें यह जानकारी नहीं है.

प्रथम विश्व युद्ध और आंग्ल-अफ़ग़ानिस्तान युद्ध में मारे गए ब्रिटिश भारतीय सैनिकों की संख्या 75,000 हज़ार के आसपास है. लेकिन ऐसा कोई स्रोत मिलना मुश्किल है जिससे सभी सैनिकों की जाति पता चल सके. हालांकि उस दौर के भारतीय समाज की बुनावट से मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि इनमें मुस्लिम और वंचित जातियों के सैनिकों की संख्या काफ़ी ज़्यादा रही होगी. फिर भी अगर किसी स्रोत से जातिवार नाम मिल भी जाएं तो 13,000 से ज़्यादा नाम पढ़कर सबकी जाति बताने के लिए अच्छे ख़ासे शोध की ज़रूरत होगी. हां, फ़र्ज़ी मैसेज बनाने के लिए किसी शोध की ज़रूरत नहीं होगी.