‘देशभर की अन्य घुमंतू जातियों की तरह हम कलंदरों की पहचान, हमारे और बाकी लोगों के बीच ऐसी खाई बन चुकी है जिसे पार कर पाना हाल-फिलहाल हमारे लिए नामुमकिन नज़र आता है.’ कुछ इन्हीं शब्दों से कलंदर नूर मोहम्मद अपनी बेबसी और शिकायत के मिले-जुले भावों को हमारे सामने बयां करते हैं. राजस्थान के टोंक शहर से ताल्लुक रखने वाले मोहम्मद का कहना है कि कलंदरों की इस बदहाली के पीछे सिर्फ और सिर्फ सरकार और उसकी नीतियां जिम्मेदार हैं. पिछले कई सालों से नूर मोहम्मद सामाजिक संस्थाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की मदद से कलंदरों के उत्थान और हक़ के लिए लगातार आवाज़ उठाते रहे हैं.

अपने समुदाय के इतिहास और उसके मौजूदा हाल का ख़ाका खींचते हुए वे बताते हैं, ‘हमारे बुजुर्ग एक गांव से दूसरे गांव जाकर भालू का खेल करते थे. लेकिन 1970 के दशक में सरकार ने इसे ग़ैरकानूनी घोषित कर दिया. वन विभाग और पुलिस वाले तंग करने लगे तो धीरे-धीरे हमने सभी भालुओं को छोड़ दिया. मगर उसके बाद हमारे सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो गया. हमारी बदकिस्मती है कि सरकार ने भालू का तो ख्याल रखा, लेकिन भालू का खेल दिखाने वालों का क्या होगा, यह फ़िक्र करने की जहमत कभी नहीं उठाई.’

वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद कलंदरों पर जानवरों के साथ क्रूरता करने के आरोप लगने लगे थे. लेकिन नूर मोहम्मद कुछ अपवादों को छोड़ इस बात से साफ इंकार करते हैं. वे कहते हैं, ‘भालू और बंदर हमारी रोजी-रोटी का ज़रिया थे. हमारे बच्चे और रीछ, दोनों के एक साथ बीमार हो जाने की स्थिति में पहले रीछ का इलाज करवाया जाता था. मन्नतें मांगी जाती थीं. उसके नाम की चादरें चढ़ाई जाती थीं.’

वे कहते हैं, ‘जिस ज़माने में गरीबों के पास मनोरंजन का कोई साधन नहीं था, तब हमारे पुरखे मजमा लगाकर उनका दिल बहलाते थे. सरकार चाहती तो उस बेहतरीन हुनर को किसी न किसी रूप में जिंदा रखा जा सकता था. लेकिन सरकार की अनदेखी ने हम में से कइयों को भीख मांगने और कचरा बीनने तक के लिए मजबूर कर दिया. इनमें बड़ी संख्या हमारे बुजुर्गों की है, जो मजदूरी नहीं कर पाते.’

इस समुदाय से जुड़ी एक बड़ी विडंबना यह भी है कि इसे मिलने वाली थोड़ी बहुत सरकारी मदद अकसर ही प्रशासन की लालफीताशाही और नासमझी की भेंट चढ़ जाती है. जानकार बताते हैं कि पहचान पत्र और भामाशाह कार्ड न होने की वजह से इन लोगों को नरेगा जैसी मजदूरी का भी मौका नहीं मिलता. और न ही इन्हें खाद्य सुरक्षा जैसी मूलभूत योजनाओं का लाभ मिल पाता है. सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक अभी तक इस समुदाय के एक तिहाई परिवारों को ही बीपीएल श्रेणी में शामिल किया जा सका है.

घुमंतू समुदायों से जुड़ी प्रमुख समस्या यह भी है कि जनजाति होने के तमाम मापदंडों पर खरा उतरने के बावजूद इनमें से अधिकतर समुदाय अन्य पिछड़ा या सामान्य वर्ग में शामिल किए गए हैं. वहीं कलंदरों के मामले में यह चुनौती और बड़ी हो जाती है. नूर मोहम्मद कहते हैं, ‘राजस्थान में बत्तीस घुमंतू जातियां हैं, पर कलंदर, मसेत, बहरूपिया और मिरासी मुस्लिम जातियों को सरकार घुमंतू नहीं मानती. इसलिए सरकार जब घुमंतुओं को कोई लाभ देना चाहती है तो हमारी इनमें गिनती ही नहीं होती.’

दैनिक जीवन से जुड़ी अपने लोगों की अन्य समस्याओं से रूबरू करवाने के लिए नूर मोहम्मद हमें बस्ती ले जाते हैं जो कि शहर के बहीर इलाके में स्थित है. यह जगह कलंदरों की बसाहट के लिहाज से देश की सबसे बड़ी बस्तियों में शामिल मानी जाती है. यहां तकरीबन सौ कच्चे घरों और सत्तर झुग्गियों में दो सौ कलंदर परिवार रहते हैं. इनकी आबादी एक हजार के आस-पास है.

आमतौर पर ऐसी दूसरी बस्तियों की तुलना में यहां की झुग्गियां और उनके आस-पास की जगह खासी साफ-सुथरी दिखती है. हालांकि सार्वजनिक रास्तों पर गंदगी के खूब ढेर लगे हैं, जिन्हें हटाना नगर परिषद का जिम्मेदारी है. यहां हर झुग्गी के बाहर आपको एक नज़ारा आम दिखता है. बिन बुनी खाटों पर बंधी साड़ियां और उस पर सजावट करती महिलाएं और उनके बच्चे. स्थानीय भाषा में इस काम को आरीतारी या आरातारी कहा जाता है.

आरातारी करते बच्चे
आरातारी करते बच्चे

हमारे आने की सूचना मिलने पर यहां के अधिकतर पुरुष अपनी रोजी पर नहीं गए ताकि बस्ती से जुड़ी समस्याओं को विस्तार से बता सकें. लेकिन यहां की ज्यादातर महिलाएं बातचीत करते समय भी अपना काम रोकने की इच्छुक नहीं दिखतीं. ऐसा इसलिए नहीं है कि उन्हें बस्ती की दिक्कतों से कुछ लेना-देना नहीं. असल में उनकी चुनौतियां पुरुषों से कहीं ज्यादा हैं. दिहाड़ी के अलावा उन्हें दिन ढलने से पहले ही जंगल से लकड़ियां लाने और गृहस्थी की अन्य दैनिक जिम्मेदारियों की भी फ़िक्र रहती है.

इन तमाम बातों का ज़िक्र करते हुए 45 वर्षीय नज़मा के चेहरे पर निराशा के भाव झलकने लगते हैं. वे बताती हैं कि चार बेटियों के साथ मिलकर दिनभर में अधिकतम दो साड़ियों का काम हो पाता है जिनके लिए उन्हें चार सौ रुपए मिलते हैं. यानी इनमें से प्रत्येक को पूरे दिन काम करने के बदले हद से हद अस्सी रुपए मजदूरी के तौर पर मिल पाते हैं. अपने प्रति सरकार के रुख़ का ज़िक्र करते हुए नज़मा की आवाज में तल्खी साफ महसूस की जा सकती है. वे कहती हैं, ‘नेताओं को हमारी याद सिर्फ चुनावों में ही आती है. कोई कहता है कमल को वोट दो और कोई कहता है पंजे को. बदले में मदद का आश्वासन मिलता है. हम हर बार वोट भी देते हैं. लेकिन हमारी कोई सुनवाई नहीं होती.’

नज़मा की सबसे छोटी बेटी शबाना पांचवीं में पढ़ती है, लेकिन काम ज्यादा होने पर उसे कई बार स्कूल से छुट्टी करनी पड़ती है. शबाना बताती है, ‘पढ़ने के लिए रात को ही समय मिल पाता है. लेकिन तब लाइट नहीं होती.’ इन्हीं सब वजहों से शबाना की चार बड़ी बहनों को न चाहते हुए भी स्कूल छोड़ना पड़ा है.

पास की झुग्गी में चूल्हे पर खाना बना रही शाइन कहती हैं, ‘हमारे परिवार के पास न तो राशन कार्ड है और न ही हमें गैस मिली है.’ उनकी यह बात प्रधानमंत्री मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘उज्ज्वला’ से जुड़े दावों पर सवाल खड़े करती है. शाइन की मानें तो पिछले दो साल में उन्होंने गैस कनेक्शन के लिए कई बार आवेदन किया. लेकिन उन्हें गैस कनेक्शन नहीं मिला.

शाईन
शाईन

टोंक की इस कलंदर बस्ती में उज्ज्वला ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार के स्वच्छता अभियान के तहत शौचालय निर्माण से जुड़े ज़ारी आंकड़ों पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं. सरकारी आंकड़ों की मानें तो बीते दिसबंर तक देश में करीब साढ़े आठ करोड़ शौचालय बनवाए जा चुके हैं और देश के 76 प्रतिशत गांव खुले में शौच की समस्या से मुक्त (ओडीएफ) हो चुके हैं. लेकिन यहां के अधिकतर घरों में शौचालय नहीं हैं. नफ़ीसा (38 वर्षीय) इस बारे में अपनी परेशानी साझा करती हैं, ‘जंगल में पाखाना करने जाओ तो लोग-बाग देखते हैं. अच्छा नहीं लगता. ज़माना ख़राब है. बहन-बेटियां जब तक वापस नहीं आतीं, फिक्र सताती रहती है. लेकिन क्या करें मज़बूरी है. न तो सरकार खुद शौचालय बनवाती है. और न बनाने देती है.’

कलंदर बस्ती के गुसलखाने
कलंदर बस्ती के गुसलखाने

इन लोगों के सामने एक बड़ी समस्या यह भी आ खड़ी हुई है कि जिस जगह पर ये पीढ़ियों से रहते आने का दावा करते हैं, बहीर के उस हिस्से को बीते कुछ सालों से वन विभाग अपना बताने लगा है. निजी स्रोतों से जुटाई जानकारी के आधार पर बस्ती के कुछ लोगों का कहना है कि इस भूमि पर वन विभाग का दावा संदेहास्पद है. वहीं, दूसरी तरफ विभाग भी अपनी पर अड़ा है और इन्हें यहां पक्के निर्माण नहीं करने देता.

इन सभी पहलुओं के चलते यहां रहने वाली सईदा की हताशा, नाराज़गी बनकर हम पर उतरती है. वे कहती हैं, ‘महीने दो महीने में सरकार के लोग अलग-अलग आंकड़े और फोटो ले जाते हैं. लेकिन हमारा हाल जस का तस है. ज्यादा से ज्यादा पेपर में हमारा नाम छप जाएगा, लेकिन हमारे पास मदद नहीं आएगी.’

यदि कलंदर पुरुषों की बात करें तो पुश्तैनी धंधा छिन जाने के बाद उनके सामने रोज़गार की बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है. यहां रहने वाले आसिफ़ मियां बताते हैं, ‘हम तो कोई दूसरा काम नहीं जानते थे. लेकिन हमने जैसे-तैसे नई पीढ़ी को पढ़ाया-लिखाया ताकि वो अपने पैरों पर इज्जत से खड़ी हो सके. पर उन्हें भी कोई रोजगार नहीं मिला. बस्ती में बीस-पच्चीस पढ़े लिखे बेरोजगारों को देख हमारी सारी उम्मीद धरी की धरी रह जाती हैं.’

घुमंतुओं पर हुए अलग-अलग शोध बताते हैं कि सदियों से स्वच्छंद रहकर कला व खेल-तमाशे से जुड़े इन लोगों को किसी दूसरे के अधीन रहकर काम करना खासा असहज करता है. शायद यही कारण है कि इस बस्ती के कई लोगों ने कोई और रोजगार रास न आने पर बस-ट्रेन में अंगूठी, दंतमंजन जैसी चीजें बेचने का काम शुरू कर दिया. लेकिन इस बात के भी अपने अलग नुकसान सामने आने लगे. इस बारे में बात करते हुए नवाब मियां हमें बताते हैं, ‘हमारे पीछे से गुंडे-बदमाश झुंड के झुंड में बस्ती में आकर दादागिरी करते हैं. हमारी महिलाओं से बदतमीजी करते हैं. बच्चों को डराते-धमकाते हैं. कहीं कोई सुनवाई नहीं होती.’ वे आगे कहते हैं, ‘कमाने जाएं तो यहां का डर सताता रहता है, यहां रुकते हैं तो रोटी के लाले पड़ जाते हैं.’

देशभर के विमुक्त-घुमंतुओं की यही स्थिति है

जो हाल बहीर के इन कलंदरों का है, तकरीबन वही कहानी देशभर के बाकी घुमंतुओं की भी है. इसकी बुनियाद भी आजादी के समय ही पड़ गई थी. भारतीय संविधान की प्रारूप समिति में हाशिए पर मौजूद हर तबके को उचित प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई थी. लेकिन घुमंतुओं के मामले में ऐसा नहीं हुआ. इसलिए इन लोगों को प्रभावित करने वाले कानूनों के बनते समय इन लोगों का पक्ष रखने वाला कोई नहीं था.

विमुक्त-घुमंतुओं के लिए संघर्षरत संगठन ‘नेशनल अलाइंस ग्रुप फोर डी-नोटिफाइड एंड नोमेडिक ट्राइब्स’ के सदस्य विकास साथो संविधान निर्माण के दौरान हुई इस चूक की बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ‘चूंकि इन समुदायों के पास मतों की संख्या ज्यादा नहीं थी, इसलिए सरकारों ने इनके हक़ की बात भी नहीं सुनी. इनके पुश्तैनी रोजगारों को तो छीन लिया गया, लेकिन उसके बदले इन्हें कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं हुआ. ये आजाद लोग थे जिन्हें बांधने की कोशिश की गई. अपनी प्रवृत्ति से विपरीत जीवन जीने को मज़बूर किया गया. इस तरह के बदलावों को लाने के लिए लंबे समय और धीरज की दरकार थी. लेकिन एकदम से इस बारे में कानून बना देने से विमुक्त-घुमंतुओं को बड़ा नुकसानदायक हुआ है.’

इस चर्चा को आगे ले जाते हुए सामाजिक कार्यकर्ता दक्षिण छारा बताते हैं कि कोई प्रतिनिधित्व न होने की वजह से कई घुमंतू समुदायों को अनुसूचित जनजाति के बजाय अन्य पिछड़ा वर्ग और सामान्य वर्ग में शामिल कर लिया गया जो कि एक ऐतिहासिक गलती है. वे कहते हैं, ‘अब यदि इन समुदायों को सही मायने में आगे बढ़ाना है तो इनके लिए अलग से उपवर्ग बनाकर, विशेष योजनाओं का लागू किया जाना ही प्रभावी उपाय होगा.’

गुजरात में विमुक्त-घुमंतुओं के हितों की बात उठाने वाले थिएटर समूह ‘बुद्धन’ के निर्देशक छारा विमुक्त-घुमंतुओं के हितों के नाम पर गठित किए गए आयोगों और उनके सदस्यों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़ा करते हैं. 2005 में यूपीए-I सरकार द्वारा गठित किए गए रेंके आयोग का ज़िक्र करते हुए छारा कहते हैं, ‘जो रिपोर्ट छह महीने में पेश की जानी थी, उसे पेश करते-करते इस आयोग ने तीन साल का वक़्त ले लिया. इसलिए ही इस आयोग की सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया जा सका.’ छारा का आरोप है कि आयोग के सदस्यों ने खुद को मिल रही सुविधाओं और भत्तों को सिर्फ लंबे समय तक कायम रखने के लिए ही इस रिपोर्ट को देर से प्रस्तुत किया.

इन आरोपों का आधार पूछने पर छारा दावा करते हैं कि रेंके आयोग के सदस्यों की तरह वे भी बंगाल की प्रसिद्ध साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता महाश्वेता देवी के समूह का हिस्सा थे, जिनकी अनुशंसा पर ही इस आयोग का गठन किया गया था. छारा का यह भी कहना है कि रेंके आयोग ने उनसे भी समाज के हितों के लिए कई ज़मीनी सुझाव मांगे थे.

रेंके आयोग के बाद घुमंतू जनजातियों के चिन्हीकरण और इनके कल्याण के लिए गठित किए गए ‘इदाते कमीशन’ (2015) से बतौर शोधार्थी जुड़ी रह चुकीं सामाजिक कार्यकर्ता मारिया सलीम भी कुछ-कुछ दक्षिण छारा जैसी ही बात दोहराती हैं. इस कमीशन के असफल होने के कारणों का ज़िक्र करते हुए वे कहती हैं, ‘आयोग ने ऊटपटांग तथ्यों के आधार पर अपनी रिपोर्ट तैयार की. कमीशन की पाठ्यसामग्री को तैयार करने में जो जानकारी इस्तेमाल की गई वह न सिर्फ पुरानी थी, बल्कि गलत भी थी.’

मारिया आगे जोड़ती हैं, ‘बाद में हम लोगों ने तीन महीने दिन-रात एक कर इन समुदायों के हालात पर देशभर में जमीनी अध्ययन किया. लेकिन जब उसे विस्तृत रूप देने का समय आया तो केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय ने उसे इसलिए रोक दिया कि कमीशन के लिए मुकर्रर अवधि का तीन चौथाई भाग पहले ही बीत चुका था. इसलिए इस अध्ययन को पूरा करने का कोई महत्व नहीं रहा.’ मारिया यह भी बताती हैं कि अपने तकरीबन पूरे कार्यकाल में इदाते कमीशन के अध्यक्ष भीखू रामजी इदाते, अपने गृहराज्य महाराष्ट्र में ही टिके रहे जबकि उन्हें एक राष्ट्रीय आयोग की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

हमसे हुई चर्चा में दक्षिण छारा इस बात की भी फ़िक्र जताते हैं कि देश के राजनैतिक दल विमुक्त-घुमंतू जनजातियों के नाम पर हरसंभव सियासी फ़ायदा उठाने से बाज नहीं आते. इसकी बानगी के तौर पर छारा हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 265 नए समुदायों को विमुक्त-घुमंतू की श्रेणी में शामिल करने की घोषणा का ज़िक्र करते हैं. 1948 में गठित हुई अयंगर कमेटी के हवाले से छारा कहते हैं, ‘पहले विमुक्त-घुमंतू समुदायों की देशभर में संख्या 147 थी जो बाद में बढ़कर 198 पहुंच गई. अब कुछ ही समुदाय बचे होंगे जो इस दायरे में आने से रह गए. लेकिन 265 जैसी संख्या का कोई तुक नहीं है.’ उनके मुताबिक सरकार ने ऐसा करके चुनावों से पहले कई अन्य समुदायों को विमुक्त-घुमंतू श्रेणी में मिल रहे लाभों का प्रलोभन देकर लुभाने की कोशिश की है. छारा की मानें तो इन 265 में से अधिकतर समुदाय उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं.

इस बारे में बात करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता और घुमंतू जनजातियों के लिए सक्रियता से काम करने वाली संस्था ‘मुक्तिधारा’ के सचिव रतन कात्यायनी बताते हैं कि जनजातियों के सामने विकास की चुनौती है, पर उनके पास कम से कम कानूनन पहचान तो है. लेकिन विमुक्त-घुमंतु समुदायों में से कइयों के पास तो भारतीय होने तक का कोई सबूत नहीं है.’ कात्यानी आगे जोड़ते हैं, ‘ये लोग पेड़ों के नीचे पैदा होते हैं, और वहीं मर जाने हैं. लेकिन किसी पर इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता. इन लोगों के लिए विकास जैसी बातें, भद्दे मजाक से कम नहीं हैं.’