पिछले दिनों वेनेजुएला में प्रमुख विपक्षी नेता खुआन गोइदो ने खुद को देश का अंतरिम राष्ट्रपति घोषित कर दिया. साथ ही उन्होंने दुनियाभर के देशों से उनको समर्थन देने की अपील भी की. उनका कहना था कि वेनेजुएला में जारी आर्थिक संकट और अराजकता को दूर करने के लिए चुनाव करवाना जरूरी है, इसलिए सभी देश उनका साथ दें. इसके बाद अमेरिका ने उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर मान्यता दे दी और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की सरकार के खिलाफ कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए.

अमेरिका के बाद लैटिन अमेरिका और यूरोप के कई देशों ने भी गोइदो के नाम पर अपनी सहमति जता दी. इसके बाद माना जा रहा था कि निकोलस मादुरो अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते अब कुछ ही घंटों में सत्ता छोड़ देंगे. लेकिन इसके बाद रूस और चीन ने मादुरो का साथ देने का ऐलान कर दिया. रूस ने कहा कि वह वेनेजुएला में अमेरिका के हर तरह के हस्तक्षेप का कड़ा जवाब देगा. रूस और चीन का समर्थन मिलने के बाद मादुरो ने अमेरिका पर जमकर हमला बोला और उससे राजनयिक संबंध तोड़ने की घोषणा कर दी.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के यह कहने पर कि वे वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करने पर विचार कर रहे हैं, मादुरो ने ट्रंप प्रशासन को ‘चरमपंथियों का एक गुट’ करार दिया. उन्होंने अमेरिका को चेतावनी देते हुए यह तक कह दिया कि अगर उसने वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई की तो उसे वियतनाम युद्ध के जैसे नतीजे भुगतने होंगे.

वेनेजुएला में जारी संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर रूस और चीन अन्य देशों से अलग राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का साथ क्यों दे रहे हैं. वे एक ऐसे राष्ट्रपति के पक्ष में क्यों हैं जिसके खिलाफ वहां की अधिकांश जनता सड़कों पर प्रदर्शन कर रही है और जो देश में आम चुनाव कराने से साफ़ इनकार कर रहा है. अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार इसकी कई वजहें बताते हैं.

चीन सबसे बड़ा कर्जदाता

जानकारों के मुताबिक चीन वेनेजुएला को सबसे ज्यादा कर्ज देने वाला देश है. अमेरिकी थिंक टैंक ‘द डायलॉग’ की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि चीन ने बीते दस सालों में वेनेजुएला को 62 अरब डॉलर से ज्यादा का कर्ज दिया है. यह लैटिन अमेरिका के किसी भी देश को दिए गए कर्ज से कहीं ज्यादा है. इसके अलावा बीते 12 सालों में चीनी कंपनियों ने वेनेजुएला में करीब 20 अरब डॉलर का निवेश भी किया है.

लैटिन अमेरिकी मामलों के जानकार विक्टर एम मिजारेस सीएनएन से बातचीत में कहते हैं कि अब चीन को डर है कि अगर निकोलस मादुरो सत्ता से हट गए तो उसका भारी निवेश डूब सकता है. क्योंकि नया राष्ट्रपति चीन का कर्ज चुकाने के बजाय पहले देश के हालात सही करने पर ध्यान देगा.

वेनेजुएला के प्रमुख विपक्षी नेता खुआन गोइदो को देश में भारी समर्थन मिल रहा है | फोटो : एएफपी
वेनेजुएला के प्रमुख विपक्षी नेता खुआन गोइदो को देश में भारी समर्थन मिल रहा है | फोटो : एएफपी

इसके अलावा चीन ने इस समय निकोलस मादुरो के पक्ष में आवाज इसलिए भी बुलंद की है क्योंकि वह अमेरिका के पड़ोस में ऐसा करके उस पर दबाव बनाना चाहता है. ऐसा करके चीन अमेरिका के साथ जारी व्यापार वार्ता में रियायत पाने की कोशिश में भी है.

रूस के लिए वेनेजुएला अमेरिका के खिलाफ एक अहम मोर्चा है

उधर, रूस और वेनेजुएला के संबंध राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के समय से ही बेहतर बने हुए हैं. लैटिन अमेरिका में वेनेजुएला एक मात्र ऐसा देश है, जो हर मुद्दे पर रूस के साथ खड़ा रहा है. हाल ही में सीरिया और यूक्रेन के मामले पर भी वेनेजुएला ने रूस का साथ दिया था. पिछले कुछ समय में रूस वेनेजुएला का सबसे महत्वपूर्ण व्यवसायिक साझेदार भी बन गया है. दो साल पहले रूस की सरकारी तेल कंपनी रोसनेफ्ट ने वेनेजुएला की प्रमुख तेल कम्पनी सिटगो में 50 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदी थी. सिटगो वेनेज़ुएला की सरकारी तेल कम्पनी पदवसा का हिस्सा है. इससे तंगी से जूझ रहे वेनेजुएला को बड़ी राहत मिली थी.

इसके अलावा 2017 में रूस और वेनेजुएला के संबंधों की गहराई का तब पता लगा था, जब व्लादिमीर पुतिन ने तीन अरब डॉलर से ज्यादा का लोन चुकाने के लिए वेनेजुएला को कई सालों की और मोहलत दे दी थी. तब वह दौर शुरू हो चुका था जब वेनेजुएला के खराब आर्थिक हालात के चलते हर कोई वहां से अपना निवेश खींच रहा था.

विदेश मामलों के जानकार कहते हैं कि रूस द्वारा वेनेजुएला को बड़ी मदद दिए जाने के पीछे एक मात्र मकसद अमेरिका के गढ़ माने-जाने वाले लैटिन अमेरिका में अपने पैर जमाना रहा है और वह अपनी इस कोशिश में काफी हद तक कामयाब भी हो गया है. बीते दिसंबर में ही रूस और वेनेजुएला ने इस क्षेत्र में एक सैन्याभ्यास किया था. इस अभ्यास में अमेरिका के न चाहते हुए भी रूस के वे लड़ाकू विमान शामिल हुए थे, जो परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम हैं.

पूर्व अमेरिकी उप रक्षा मंत्री डेरेक चॉलेट सीएनएन से कहते हैं, ‘ऐसा करके पुतिन अमेरिका को साफ़ संदेश भेज रहे हैं कि अब वे अमेरिका के बगीचे (लैटिन अमेरिका) में खेलेंगे और अमेरिका लाख चाहकर भी उन्हें ऐसा करने से रोक नहीं सकेगा.’

निकोलस मादुरो ने बहुत पहले से तैयारी शुरू कर दी थी

हालांकि, कुछ जानकार यह भी बताते हैं कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो काफी पहले से जानते थे कि वे जिस राह पर चल रहे हैं, उसमें एक न एक दिन उनके पद पर संकट आएगा ही. इसीलिए उन्होंने इस स्थिति से निपटने की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर दी थी. मादुरो ने कई साल पहले से ही रूस और चीन से संबंध अच्छे करने शुरू कर दिए थे. मादुरो जानते थे कि वे इन दोनों देशों के जरिए हर मोर्चे पर अमेरिका और यूरोप का सामना कर सकते हैं. साथ ही वे यह भी जानते थे कि चीन और रूस का एक और बड़ा फायदा उन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मिलेगा, जहां ये दोनों देश अपने वीटो के जरिए वेनेजुएला के खिलाफ लाए गए हर प्रस्ताव को रोकने का माद्दा रखते हैं.