इन दिनों सिर्फ एक काम करने में परम आनंद मिल रहा है. ‘गली बॉय’ के गाने सुनने में! लूप में लगाकर 18 के 18. है न?

इस म्यूजिक एलबम में दो कविताएं हैं – ‘दूरी’ और ‘एक ही रास्ता’– जिन्हें जावेद अख्तर ने लिखा है. बाकी सबकुछ खालिस हिप-हॉप रैप है, जो बिना किसी गुलजार या जावेद अख्तर की मदद लिए उम्दा ‘शब्दों की ज्वाला’ भड़काता है और हमेशा लड़की, शराब, महंगी गाड़ियों में जकड़े रहने वाले हिंदुस्तानी रैप की ‘बेड़ियां पिघलाता’ है. जो आक्रोश हमें अनुराग कश्यप के नायकों में नजर आता रहा है वो जोया अख्तर ने अपने नायक के संगीत में उड़ेला है, और यही आग, असमानता के प्रति यही रोष इस एलबम के रैप गीतों को बेहद खास बना रहा है.

‘गली बॉय’ के कुछ गीतों में क्रांति और राजनीति की भी खूब बातें हैं. जिस दौर में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री सत्ता प्रतिष्ठान के सामने नतमस्तक नजर आ रही है और प्रोपेगेंडा फिल्मों की लगातार बौछार हो रही है, उस दौर में किसी मुख्यधारा की ए-लिस्टर सितारों से सजी फिल्म का प्रतिकार की भाषा को मुख्यधारा का हिस्सा बनाकर घर-घर तक पहुंचाना कमाल बात है. डब शर्मा और डिवाइन का लिखा, गाया और संगीतबद्ध किया ब्रिलियंट आजादी अगर एक तरफ खासी मशहूरियत बटोर चुका है तो दूसरी तरफ कई (दक्षिणपंथी) दिशाओं से इसपर आलोचना की ईटें भी बरस चुकी हैं.

वामपंथी नेता कन्हैया कुमार की 2016 की मशहूर जेएनयू स्पीच में लगे आजादी के नारों की इस गीत में टेक ली गई है. देश के हालात पर चिंतित इस गीत में जमकर नेताओं की आलोचना की गई है और आजादी के नारों को हुक-लाइन बनाकर बेहद जोश में गाया गया है. भुखमरी से, भेदभाव से, पक्षवाद से आजादी मांगने की बात करने वाला यह गीत घोर राजनीतिक है, और नेताओं के प्रति आक्रोश से भरे रहने वाले बॉलीवुड के जैनेरिक सॉन्ग टेम्पलेट को एक भाजपा विरोधी युवा नेता के नारों की टेक लेकर बेहद कंटेम्पररी और साहसी बना देता है.

हालांकि गीत कन्हैया कुमार के नारों में वर्णित कई राजनीतिक बातों को खुद में शामिल नहीं करता. विवादास्पद होने से खुद को बचाए रखने की चतुराई इसमें साफ दिखती है,लेकिन वक्त ऐसा है कि जितना किया जा रहा है वो भी कम नहीं है! जहां कन्हैया कुमार के नारे संघवाद से, सामंतवाद से, पूंजीवाद से, ब्राह्मणवाद से और मनुवाद से आजादी की बात करते थे, वहीं ‘आजादी’ गीत ने खुद को इन सभी क्रांतिकारी नारों से दूर रखा है. असल में यह गीत इसके संगीतकार, गायक और लिरिसिस्ट डब शर्मा के एक पुराने गीत का नया फिल्म संस्करण है जो इन्होंने जेएनयू प्रकरण के बाद यूट्यूब पर अपलोड किया था. उस संस्करण में भी कन्हैया कुमार के सभी नारों को बेझिझक इस्तेमाल किया गया था और रैप की टेक लेकर इसे एक विजुअल गीत बनाया गया था.

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कहा जा रहा है कि जानी-मानी नारीवादी एक्टिविस्ट कमला भसीन ने कुछ 35-36 साल पहले पहली बार हिंदुस्तान में ‘आजादी’ शब्द को नारों में शामिल किया था. उन्होंने इस नारे को एक मुख्तलिफ स्वरूप में पाकिस्तान में सुना था. वहां के बाशिंदे उस वक्त के राष्ट्रपति जिया-उल-हक की मुखालफत कर रहे थे और ये नारे पाकिस्तानी नारीवादियों ने लगाए थे. नारा था – ‘औरत का नारा आजादी, बच्चों का नारा आजादी, हम लेकर रहेंगे आजादी, है प्यारा नारा आजादी’. कमला भसीन के साथ हिंदुस्तान आकर यह नारा वक्त के साथ परिस्थितियों के हिसाब से बदलता रहा और पहले कन्हैया कुमार ने तो अब ‘गली बॉय’ के ‘आजादी’ गीत ने इसे देशभर में मशहूर कर दिया है.

इस ‘आजादी’ गीत को लेकर उपज रहे विरोधाभास भी खासे दिलचस्प और हास्यास्पद हैं! जिस हिंदी न्यूज चैनल ने कन्हैया कुमार को 2016 में राष्ट्रद्रोही करार देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी, आज उसके नेटवर्क की एक म्यूजिक कंपनी के पास ही ‘गली बॉय’ के म्यूजिक राइट्स हैं! वे ही ‘आजादी’ गीत को इन दिनों घर-घर गली-गली पहुंचा रहे हैं! हालांकि विवाद से बचने के लिए फिल्म के प्रमोशन में इस गीत का इस्तेमाल बिलकुल नहीं किया गया है, और 14 फरवरी को फिल्म रिलीज से सिर्फ तीन दिन पहले 11 तारीख को इसका म्यूजिक वीडियो रिलीज किया गया है. चतुराई ऐसी, कि म्यूजिक वीडियो में से उन नारों को ही हटा दिया गया है और ‘आजादी-आजादी’ की हुक-लाइन को जैनेरिक शब्द की तरह उपयोग किया गया है. देखना दिलचस्प होगा कि ये घोर राजनीतिक एंटी-बीजेपी गीत फिल्म में किस तरह उपयोग होता है. ये नारे फिल्म में रहते भी हैं, या म्यूजिक वीडियो की तरह फिल्म से भी काट दिए जाते हैं.

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हाल ही में कांग्रेस ने इस ‘आजादी’ गीत के बहाने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए एक वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किया था.

देखते ही देखते दो घंटे के भीतर भाजपा के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर उसी आजादी-आजादी करते गीत को कांग्रेस-विरोधी विजुअल्स के साथ पेश कर दिया गया! लेकिन भाजपा भूल गई कि उनके घोर आलोचक जावेद अख्तर की सुपुत्री जोया अख्तर द्वारा निर्देशित फिल्म का यह गीत अपनी मौलिकता में ही एंटी-बीजेपी है!

तीसरा विरोधाभास हमारे फिल्मी सितारों के खोखलेपन को दिखाता है. रणवीर सिंह ‘गली बॉय’ के तकरीबन हर गाने को प्रमोट कर रहे हैं, लेकिन जब उनसे वरिष्ठ फिल्म समीक्षक अनुपमा चोपड़ा ने एक इंटरव्यू के दौरान ‘आजादी’ के बारे में पूछा, तो वे यह कहकर किनारे हो लिए कि इससे उनका सीधा-सीधा कोई लेना-देना नहीं है. ‘हम गैर-राजनीतिक लोग हैं’– यह कहकर रणवीर सिंह के साथ-साथ आलिया भट्ट ने भी ‘आजादी’ से पल्ला झाड़ लिया!

इसीलिए कहा जाता है, कि सितारों की पीआर द्वारा निर्मित क्रांतिकारी इमेज पर ज्यादा दिन भरोसा नहीं करना चाहिए. क्योंकि आखिर में दिल हिंदी सिनेमा के प्रशंसकों का ही टूटता है. निर्देशक पर करना चाहिए, क्योंकि आखिर में फिल्म, फिल्म का संदेश और फिल्म की विचारधारा केवल निर्देशक की होती है. बाकी चेहरे हैं. चेहरे पर चेहरे हैं.

‘गली बॉय’ का दूसरा सत्ता विरोधी गीत जिंगोस्तान है. इसका नाम अंग्रेजी के शब्द जिंगोइज्म (Jingoism) यानी कट्टर राष्ट्रवाद और हिंदुस्तान की संधि करके रचा गया है. कहने का मतलब है कि सत्ता समर्थक कट्टर राष्ट्रवाद की मुखालफत करने वाला इससे बेहतर सत्ता-विरोधी गीत आपने 2014 के बाद से लेकर अब तक सुना नहीं होगा.

‘जिंगोस्तान’ को भी फिल्म के प्रमोशन में इस्तेमाल नहीं किया गया है और न इसका अब तक कोई म्यूजिक वीडियो रिलीज हुआ है. चुपचाप 18 गानों के बीच में राजनीतिक रूप से सचेत श्रोताओं के लिए इसे सरका दिया गया है. इस गीत के रचयिता डब शर्मा ने कुछ दिन पहले अपने ट्विटर मंच पर व्यंग्यात्मक ट्वीट तक किया है और लिखा है कि ‘जिंगोस्तान वीडियो एक समानांतर ब्रह्माण्ड में रिलीज हो चुका है. उम्मीद है आपको पसंद आया होगा!’ साफ है कि आज के घोर राजनीतिक माहौल में प्रतिकार की आवाज को मुख्यधारा के सिनेमा का हिस्सा बनाना बेहद जटिल काम है.

‘गली बॉय’ के ज्यूकबॉक्स में इस गीत के दो वर्जन हैं –‘जिंगोस्तान बीटबॉक्स’ और ‘जिंगोस्तान’– जिसमें से बीटबॉक्स वाला वर्जन बीट्स के चलते बेहद मारक असर रखता है. डब शर्मा ने इसे लिखा, गाया तथा संगीतबद्ध किया है और यह रैप गीत मोदी सरकार में हुई मॉब लिंचिंग तथा नेताओं द्वारा जनता को डर बेचने की कड़ी आलोचना करता है. ‘पकड़ो, मारो, काटो, चीर दो/साफ-सुथरी चमड़ियों में गहरे-गहरे नील दो’, ‘2018 है, देश को खतरा है/ हर तरफ आग है, तुम आग के बीच हो’ और ‘खींचो, नोंचो, पकड़ो, पेल दो/सूखी-सूखी नफरतों में गरम-गरम तेल दो’ जैसी सनसनीखेज पंक्तियों के बीच ‘जिंगोस्तान जिंदाबाद!’ नाम की हुक-लाइन लगातार सुनाई देती है और गीत कट्टर राष्ट्रवाद की सत्ता समर्थक विचारधारा को अपने व्यंग्य से घायल कर देता है. इस गीत में ढेर सारा सबटेक्स्ट मौजूद है जो इसे बार-बार सुनकर समझा जा सकता है. देखना बेहद दिलचस्प होगा कि इस एंटी-बीजेपी गीत को भी फिल्म में किस तरह उपयोग किया जाता है.

इन दो गीतों के अलावा ‘इंडिया 91’ नामक रैप आज बंट रहे देश में ‘अनेकता में एकता’ की वकालत करता है और देश की अलग-अलग भाषाओं वाले रैप गायकों के आक्रोश को जोड़कर खुद को तैयार करता है. फिर एक दूरी नामक गीत है जो जावेद अख्तर ने रैपर डिवाइन के साथ मिलकर लिखा है. यह कतई राजनीतिक गीत नहीं है, लेकिन इसमें एक खूबसूरत इमेजरी है जो कि फौज को राजनीतिक मतलबों के लिए उपयोग करने वाले इस चालाक समय पर कटाक्ष करती हुई मालूम होती है. इस गीत में धारावी में रहने वाला रणवीर सिंह का किरदार दुनिया में मौजूद असमानता के प्रति दुख प्रकट करता है और एक जगह अपनी बेबस मां को याद करते हुए उसे ‘फौजी’ की संज्ञा देता है. ‘मुझको सीने से लगाकर कुछ नहीं कहती/ मेरी मां बस रोती/ मेरी मां मेरी फौजी/ मेरी मां मेरी बोली/ मेरी लोरी मत रोना मत रोना/ अब तो होनी है अनहोनी/ अब होनी है अनहोनी, मां.’ ऐसी खूबसूरत रूपक गढ़ने के लिए जावेद साहब को सलाम! अगर डिवाइन ने गढ़ा है तो उन्हें सलाम!

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सत्ता पक्ष की दक्षिणपंथी राजनीति भी इन दिनों हिंदी फिल्म गीतों में खूब हिलोरें मार रही है! ‘फिल्लौरी’ वाले काबिल संगीत निर्देशक शाश्वत सचदेव के चलते ‘उरी’ फिल्म के ‘मंजर है ये नया’ और ‘बह चला’ जैसे गीत बेहद खूबसूरत बन पड़े हैं. लेकिन कुछ गीत इस प्रोपेगेंडा फिल्म में घोर राजनीतिक रंग लिए हैं और सत्ता प्रतिष्ठान के उग्र राष्ट्रवाद का खुलकर समर्थन करते हैं. छल्ला (मैं लड़ जाना) ऐसा ही एक लाउड गीत है.

‘उरी’ के साथ ही रिलीज हुई ‘द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर’ में भी एक गीत राजनीतिक रंग में रंगा मिलता है. कटाक्ष करने वाला ओम शब्द वैसे तो बाबा नागार्जुन की एक बेमिसाल कविता है, लेकिन मालूम होता है कि इस प्रोपेगेंडा फिल्म ने उस कविता की चुनिंदा पंक्तियां उपयोग कर गांधी परिवार पर हमला किया है –‘ऊं शेर के दांत, भालू के नाखून, मर्कट का फोता/ ऊं हमेशा हमेशा राज करेगा मेरा पोता’. पोता, यानी मौजूदा परिप्रेक्ष्य में इशारा राहुल गांधी की तरफ है, जिन्हें इस फिल्म के द्वारा सोनिया गांधी संग निशाना बनाया गया है.

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बाल ठाकरे के जीवन पर बनी बायोपिक ठाकरे के भी सारे गीत घोर राजनीतिक हैं. ‘आया रे ठाकरे’ से लेकर ‘साहब तू सरकार तू’ और ‘ठाकरे थीम’ जैसे गीत केवल नफरत की राजनीति करने वाली शख्सियत बाल ठाकरे को महिमामंडित नहीं करते, बल्कि इस बहाने कट्टर हिंदुत्व की राजनीतिक विचारधारा भी साथ महिमांडित होती है. चाहे बाल ठाकरे को ‘इंकलाबी’ और ‘क्रांतिकारी’ कहने वाला ‘साहब तू सरकार तू’ हो या फिर नवाज की आवाज में बाल ठाकरे के इस तरह के संवादों से लदा ‘ठाकरे थीम’ – ‘मेरा हर गुनाह मेरा विचार बनकर लाखों लोगों के खून में बहेगा’.

इन प्रो-बीजेपी गीतों के इतर, जिस गीत को 2019 का सबसे चतुर राजनीतिक और प्रोपेगेंडा गीत होने का खिताब दिया जाना चाहिए वो ‘मणिकर्णिका’ का भारत ये रहना चाहिए है. अगर आप इस गीत और गीतकार प्रसून जोशी की राजनीति से वाकिफ नहीं हैं, तो ये गीत सच में सुनने वाले की आत्मा झकझोर देने की काबिलियत रखता है. जब वे लिखते हैं और शंकर महादेवन मिसरी-सी मीठी आवाज में गाते हैं –‘मेरी नस-नस तार कर दो/ और बना दो एक सितार/ राग भारत मुझ पे छेड़ो/ झन-झनाओ बार बार’, तो लगता है जैसे भारत से प्रेम करने की इससे बेहतर और सुंदर अभिव्यक्ति हो ही नहीं सकती.

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लेकिन सच्चाई में ये गाना घोर राजनीतिक है और हो सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा की चुनावी रैलियों में जोर-शोर से उपयोग भी हो (नीचे दिया वीडियो देखिए, बात हमारी समझ जाएंगे!). रूमानी गीतों के उत्कृष्ट गीतकार प्रसून जोशी खुलकर प्रो-मोदी हैं और लगता भी है कि उन्होंने यह गीत ‘मणिकर्णिका’ फिल्म के लिए नहीं बल्कि भाजपा की राष्ट्रवादी विचारधारा को समर्थन देने के लिए लिखा है.

इस गीत को लॉन्च करते वक्त उन्होंने कहा भी था कि देश-प्रेम आप जैसे भी दिखाओ – कला के माध्यम से दिखाओ, या संगीत और सामाजिक बदलाव के माध्यम से – लेकिन देश-प्रेम आपको दिखाना तो पड़ेगा. इस चेतावनी सरीखे ज्ञान को सुनकर लगा था कि किसी कोमल हृदय गीतकार को नहीं, सत्ता पक्ष के किसी प्रवक्ता को रात की टीवी न्यूज पर सुन रहे हैं.

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‘मणिकर्णिका’ फिल्म में पहली और प्रमुख सिचुएशन पर ‘भारत ये रहना चाहिए’ उपर्युक्त बैठता भी नहीं है. जब ये कहानी की शुरुआत में जोर-शोर से आता है तो मणिकर्णिका की शादी नहीं हुई होती है (1842) और बिठूर के पेशवा व मणिकर्णिका के पिता अंग्रेजों से समय पर नहीं मिलने वाली पेंशन की चिंता करने के कुछ दिन बाद एक पुस्तकालय में इसे साथ गाते हैं! एक तो यह सिचुएशन ही काफी फिल्मी और हास्यापद है लेकिन सबसे बड़ी बात है - और यह तथ्य सभी जानते भी हैं - कि उस दौर में राजा-महाराजा केवल अपनी रियासतों से प्यार करते थे. भारतवर्ष की चिंता किसी को नहीं थी.

आगे चलकर फिल्म में भी कई बार दिखाया जाता है कि झांसी के राजा और उनके मंत्री किस तरह केवल अपनी रियासत ‘झांसी’ को अंग्रेजों से बचाने के लिए चिंतित थे. झांसी ही उनके लिए ‘मातृभूमि’ थी. लेकिन राजनीतिक रूप से राष्ट्रवादी हो चुके कंगना रनोट और प्रसून जोशी ने भारत का गुणगान करने का मौका बेवजह फिल्म में ठूंस दिया.

फिल्म के अंतिम हिस्से में यह गीत दोबारा आता है जब लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लड़ते हुए प्राण त्यागती हैं, और इस बार शर्तिया प्रभाव छोड़ता है. लेकिन राजनीतिक प्रोपेगेंडा अगर हावी नहीं होता, तो किसी भी दिन रानी लक्ष्मीबाई पर बनने वाली फिल्म में इस राजनीतिक गीत से बेहतर गीत सुभद्रा कुमारी चौहान की कालजयी कविता पर रचा जाता. ‘चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी/ बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी/ खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी.’ नहीं क्या?

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