केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के दो महात्वाकांक्षी विधेयक निरस्त हो गए हैं. इनमें पहला है- तीन तलाक़ विधेयक और दूसरा- नागरिकता संशोधन विधेयक. दोनों विधेयक इसलिए निरस्त हुए क्योंकि संसद के मौज़ूदा बजट सत्र के आख़िरी दिन बुधवार को राज्य सभा की बैठक अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई.

ख़बरों के मुताबिक दोनों विधेयक लाेक सभा में पारित हो चुके थे. इसके बाद इन्हें राज्य सभा में भेजा गया था. लेकिन वहां से विभिन्न दलों के विरोध की वज़ह से ये अब तक पारित नहीं हो पाए थे. और अब चूंकि एक महीने के भीतर अगले लोक सभा चुनाव की घोषणा होने वाली है. यानी राज्य सभा की अगली बैठक नई लोक सभा के गठन के बाद ही होगी. लिहाज़ा इन कानूनों को भी नई लोक सभा से फिर पारित कराने के बाद राज्य सभा के पास भेजना होगा. इस बाबत संसदीय नियमों के अनुसार अगर कोई कानून राज्य सभा से पारित होकर लोक सभा में विचाराधीन है तो वह लोक सभा भंग होने के बावज़ूद निरस्त नहीं होता. लेकिन यदि लाेक सभा से पारित कानून राज्य सभा में विचाराधीन रह गया तो वह लोक सभा भंग होते ही रद्द या निरस्त मान लिया जाता है.

इन विधेयकों का विरोध करने वालों में सत्ताधारी एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के घटक भी शामिल थे. नागरिकता संशोधन कानून का तो सबसे ज़्यादा एनडीए के पूर्वोत्तर राज्यों के घटक दल ही विरोध कर रहे थे. इन दलों को डर है कि इस कानून से उनके राज्यों में जनसंख्या का घनत्व असंतुलित हो जाएगा. इस डर की वज़ह ये है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार आदि से भारत आकर रह रहे अधिकांश शरणार्थी पूर्वोत्तर के राज्यों में ही बसे हुए हैं. नागरिकता संशोधन विधेयक के ज़रिए इन शरणार्थियों में से ग़ैर-मुस्लिमों को आसानी से भारतीय नागरिकता देने का बंदोबस्त किया गया था. विरोध का यही हाल तीन तलाक़ पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून का भी था. संभवत: इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार ने इन्हें पारित कराने के लिए ज़्यादा जोर भी नहीं लगाया.