रफाल सौदे को लेकर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट चर्चा में है. बुधवार को संसद में पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि मोदी सरकार ने यह सौदा पूर्ववर्ती यूपीए सरकार की तुलना में 2.86 फीसदी कम कीमत पर किया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस डील को लेकर मचे विवाद के लिए सीएजी ने यूपीए के कार्यकाल में हुई शुरुआती डील को दोषी बताया है. अखबार ने बताया है कि सीएजी ने कभी भी 126 लड़ाकू विमानों वाले मीडियम मल्टी-रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) प्रॉजेक्ट को अंतिम मंजूरी नहीं दी थी.

रिपोर्ट में सीएजी की गाइडलाइन के हवाले से बताया गया है कि रक्षा सौदे के तहत ऐसे रक्षा हथियार को लेकर समझौता नहीं हो सकता, जो सौदे की बोली में दूसरे नंबर पर रहा हो. गौरतलब है कि यूपीए के समय वायु सेना में शामिल करने के लिए जिन विमानों का परीक्षण किया गया था, उनमें यूरोपीय फाइटर टाइफून पहले नंबर पर रहा था. लेकिन व्यावसायिक मूल्यांकन के बाद 2012 में सरकार ने रफाल विमान का चयन किया, यह मानते हुए कि यूरो फाइटर की अपेक्षा वह अधिक किफायती है.

सीएजी ने कई वजहों के चलते यूपीए सरकार के इस चयन की अपनी रिपोर्ट में आलोचना की है. उसने कहा है कि यूपीए की डील में फ्रांस की रक्षा कंपनी दसॉ को विमान से जुड़ी तकनीक और कीमत में बदलाव करने के लिए रक्षा खरीद प्रक्रिया का उल्लंघन का करने का मौका दिया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक वॉरंटी के लिहाज से दसॉ की तरफ से लगाई बोली भी सौदे का अनुपालन न करने वाली नहीं थी. वहीं, फील्ड परीक्षण के दौरान यह विमान वायु कर्मचारी गुणात्मक आवश्यकता (एएसक्यूआर) के मामले में भी खरा नहीं उतरा था. इसके अलावा कंपनी ने विमान की कीमत भी पहले से तय फॉर्मेट के हिसाब से नहीं रखी थी.

सीएजी ने यह भी पाया कि मूल सौदे को लेकर हुई अंतिम बातचीत में दसॉ ने केवल उन 18 विमानों के प्रदर्शन की गारंटी ली थी, जिनका निर्माण उसके यहां होना था. उसने कहा था कि विमान की तकनीक हस्तांतरित किए जाने के बाद बाकी 108 विमानों की गुणवत्ता के लिए एचएएल ही जिम्मेदार होगा. इस पर सौदे की बातचीत के लिए बनाई गई समिति (सीएनसी) ने जोर दिया कि दसॉ को बाकी विमानों की भी गुणवत्ता की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी. रिपोर्ट के मुताबिक यहीं पर यह सौदा अटक गया.