निर्देशक : जोया अख्तर

लेखक : जोया अख्तर, रीमा कागती, विजय मौर्या (संवाद)

कलाकार : रणवीर सिंह, आलिया भट्ट, सिद्धांत चतुर्वेदी, विजय राज, कल्कि केकला, विजय वर्मा, अमृता सुभाष, शीबा चढ्डा

रेटिंग : 4/ 5

मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ हिंदी सिनेमा की सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है. मुंबई की झोपड़पट्टियों में सांस लेने वाली कठिन जिंदगियों का यथार्थ 1988 में आई इस फिल्म से बेहतर कोई नहीं दिखा पाया. यह फिल्म जोया अख्तर की पसंदीदा हिंदी फिल्मों में से एक है और उन्हें फिल्मकार बनने के लिए प्रेरित करने वाले कारणों में से एक है.

इसलिए आज जब हम उनकी ‘गली बॉय’ देखते वक्त झोपड़पट्टियों से पटी पड़ी धारावी को सांस लेते हुए महसूस कर पा रहे होते हैं, वहां मौजूद हर गंध को अपने नथुनों के करीब पाते हैं, तब यह याद रखना जरूरी हो जाता है कि अमीर किरदारों की फिल्में बनाने के (गैरवाजिब) आरोप सहती रहीं जोया अख्तर यह कुशलता कहां से लाई होंगी.

सिनेमेटोग्राफर जय ओज़ा और प्रोडक्शन डिजाइनर सुजैन मैवान्जी का हुनर तो है ही, कि उन्होंने धारावी की चॉल और गलियों को जीवंत किया है. लेकिन यह इस निर्देशिका की तीक्ष्ण समझ ज्यादा है जिसके चलते वे धारावी को एक बाहरी व्यक्ति के तौर पर एक्सप्लोर करती हुई मालूम नहीं होतीं. लगता है जैसे धारावी में पले-बढ़े किसी शख्स ने ही ‘गली बॉय’ का निर्देशन किया है. फिल्म इस स्तर की रियलिज्म लिए हुए है.

फिल्म की एक बहुत बड़ी विशेषता तो यही है कि वह धारावी को एक किरदार मानती है और उसे बेहद उत्कृष्टता से रचती है. आजकल स्प्रे टैन का उपयोग कर गोरी चमड़ी वाले हीरो लोग आसानी से धूसर हो लेते हैं (‘मोहन जोदाड़ो’ वाले रितिक रोशन याद हैं न!) लेकिन कहानी की आत्मा के साथ उनकी चमड़ी का यह नकली जमीनी भूरा रंग मैच नहीं कर पाता. लेकिन जब रणवीर सिंह अपनी चमड़ी को स्लम में रहने वाले नायक (मुराद) के मुताबिक रंगते हैं तो आपको कहीं से भी मुराद के पीछे से सुपरस्टार रणवीर सिंह झांकते हुए नहीं मिलते. फिल्म में जो भी किरदार गढ़े गए हैं वे अपने परिवेश का हिस्सा लगते हैं और सामाजिक असमानता, वर्गभेद, पितृसत्ता के बंधन की इस कहानी को मिट्टी के रंग का होकर यथार्थवादी बनाते हैं.

धारावी के रैपर नेजी और डिवाइन के जीवन से प्रभावित ‘गली बॉय’ एक अंडरडॉग की कहानी है. ड्राइवर के साधारण बेटे मुराद के अपने सपनों को पहचानने, उन्हें पंख देने और उन पंखों के सहारे खुद को उड़ना सिखाने की कहानी है. जैसा कि अधिकतर अंडरडॉग की कहानियां कहने वाली फिल्मों के साथ होता है – चाहे वे खेल आधारित हों या संगीत – कि उनकी पटकथा का वितान आपको पहले से पता होता है. ज्यादातर अंडरडॉग की कहानियां एक निश्चित टेम्पलेट ही उपयोग करती हैं और ‘गली बॉय’ कोई अपवाद नहीं है. इसमें कई सिनेमाई क्लीशे हैं जो किन्हीं कमजोर हाथों में फिल्म को कमजोर बना सकते थे. लेकिन रीमा कागती और जोया अख्तर की प्रखर लिखाई व जोया के कमाल निर्देशन के चलते स्टीरियोटाइप्ड किरदार और क्लीशे वाले सीन भी गजब का सबटेक्स्ट खुद में समेटे मिलते हैं.

जैसे आलिया भट्ट का किरदार वैसे तो सिर्फ एक सहयोगी प्रेमिका का है और कम ही दृश्यों में वे परदे पर प्रमुखता से छाई मिलती हैं. लेकिन उनके किरदार को लिखा इतना जबरदस्त गया है कि यह नरम-गरम नायिका कभी भी कमजोर मालूम नहीं होती. नायिका की ये विशेषताएं सीधे जोया-रीमा की लेखकीय जोड़ी से निकलकर आई हैं ये आपको समझ आता है, और इस नायिका की समझदार बातों के बहाने आज की समान अधिकारों की बात करने वाली लड़कियों का सुंदर चित्रण किया गया है, यह भी फिल्म देखकर आप समझ ही जाएंगे.

आलिया भट्ट बड़ी ही खूबसूरती से ऐसी नायिका सफीना बनती हैं. समाज के बंधनों में बंधी अपनी नाजुक प्रेम-कहानी में प्यार, जलन, तड़प के सारे रंग बड़ी तमीज से भरती हैं और अपने इस रोल को अपने सर्वश्रेष्ठ किरदारों में से एक बनाती हैं.

‘गली बॉय’ एक जहीन अंडरडॉग फिल्म से ब्रिलियंट फिल्म तक का जो सफर तय करने में सफल रही है, उसमें कुछ चीजों का खासा योगदान है. एक तो है लेखन जो सूक्ष्म से सूक्ष्मतम इमोशन्स को खूबसूरती से उभारता है. जिन भी सिनेप्रेमियों ने मशहूर रैपर ऐमेनिम की अमेरिकी फिल्म ‘8 माइल’ (2002) देखी है वो समानताएं पहचानने के बावजूद ‘गली बॉय’ को बहुत बेहतर फिल्म मानेंगे. इसकी लिखाई की डेप्थ वह अमेरिकी फिल्म नहीं छू सकती.

बाप विजय राज और मुराद के बीच के दृश्य, खासकर इंटरवल के बाद. ड्राइवर बनकर मुराद का गाड़ी के अंदर बैठकर आक्रोश भरा रैप सुनना. एक कविता ‘दूरी’ लिखने की प्रेरणा किसी को रोते हुए देखने के बाद मिलना. ‘रोटी, कपड़ा, मकान’ के साथ दीवार पर ‘इंटरनेट’ भी लिखना क्योंकि यही इंटरनेट तो उसे आगे ले जा रहा है. पोते के प्रति दादी के व्यवहार का तपाक से बदल जाना और अमीर घर के लंबे-चौड़े बाथरूम में धारावी के लड़के का पैरों से जगह नापना. ऐसी अनेक दुर्लभ विशेषताएं कई दृश्यों में हैं जो कि हिंदी फिल्मों की लेखन में बहुत कम नजर आती हैं. ‘गली बॉय’ की यही संवेदनशील लिखाई कई जगहों पर जादुई सी है.

फिर जोया अख्तर साइलेंस का अद्भुत उपयोग करने में महारत हासिल करती ही जा रही हैं. ‘लक बाय चान्स’ में रितिक रोशन के किरदार का कार की खिड़की पर चिपके गरीब लड़के से हाथ मिलाने का दृश्य याद है? ‘गली बॉय’ में ऐसे कई मार्मिक दृश्य हैं जिन्हें साइलेंस मजबूत बनाता है.

फिर 18 गीतों-कविताओं वाला संगीत है, जो खुद धारावी की तरह इस फिल्म का एक मजबूत किरदार है. नैरेटिव में खूबसूरती से पिरोए गए गीत हैं और कविता की टेक लेने वाले रैप तो हर जगह ही शानदार है. हालांकि ‘आजादी’ गीत में से कन्हैया कुमार वाले नारे गायब हैं लेकिन बाकी इतना कुछ दमन की मुखालफत करने वाला यहां मौजूद है कि आप उसी में खोए रहते हैं, और कई दर्शकों का तो इस सेल्फ-सेंसरशिप की तरफ शायद ध्यान भी नहीं जाएगा.

फिल्म की एक कमी उसकी लंबाई जरूर है और इंटरवल के बाद कुछ-कुछ क्षणों के लिए फिल्म से मोहभंग होता है. एक दूसरी कमी फिल्म के ज्यादातर मुख्य गानों और संवादों से हमारा पहले से परिचित होना है. प्रमोशन के नाम पर फिल्में आजकल अपना इतना सारा कंटेंट पहले से दर्शकों को दिखा देती हैं कि फिल्म में उन्हें देखने पर नएपन का अहसास नहीं होता. आपने जितना कम ‘गली बॉय’ के बारे में पहले से जाना होगा, उतना आपके लिए अच्छा होगा.

फिल्म में अभिनय सिर्फ उनका उम्दा नहीं है जो फिल्म में नहीं हैं! मुराद के पिता के रोल में विजय राज विलक्षण हैं. इंटरवल के बाद का उनका गुस्सैल और भावुक काम तो कमाल ही है. मुराद के दोस्त और उस पर हावी रहने वाले मोईन के रोल में विजय वर्मा बेहद गहरी छाप छोड़ते हैं. ‘मॉनसून शूटआउट’ (2017) में नवाज संग लीड रोल निभाने के बावजूद उन्हें पहचान नहीं मिली, लेकिन अब से वे खूब पहचाने जाएंगे.

एमसी शेर नाम के रैपर के किरदार में सिद्धांत चतुर्वेदी हैं जो इस फिल्म के दूसरे रणवीर सिंह हैं. चूंकि रणवीर का किरदार अंडरडॉग का है तो एक लंबे समय तक उन्हें मुराद को अंडरप्ले करना था और ऐसे वक्त में उनका मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत कई सीन में उनसे ज्यादा असरदार साबित होते हैं. ‘इनसाइड एज’ में सीनियरों से बुली होने वाले सीधे-साधे पतले-दुबले बॉलर का रोल करने वाले सिद्धांत यहां अपने ट्रांसफॉर्मेशन से चकित करते हैं और ठीक उतनी ही कुशलता से एक रैपर का किरदार अभिनीत करते हैं जितनी कि रणवीर. वे फिल्म में दूसरे रणवीर सिंह हैं, हमने ऐसे ही नहीं कहा!

रणवीर सिंह फिल्म की आन-बान-शान हैं और जो काम ‘रॉकस्टार’ के लिए रणबीर कपूर ने किया था वही ‘गली बॉय’ के लिए रणवीर सिंह करते हैं. चूंकि वे गाने गाते भी खुद हैं इसलिए उनकी मेहनत दोगुनी है और इसका दोगुना फल फिल्म को मिलता भी है. ‘लुटेरा’ की धीमी आवाज वाले रणवीर की ‘गली बॉय’ में वापसी हुई है और रैप गाते वक्त बुलंद आवाज तथा संवाद बोलते वक्त धीमी आवाज का वेरिएशन उनके किरदार को बहुआयामी बना देता है.

मासूमियत, आक्रोश, नायिका के लिए प्रेम, मां के लिए चिंता, कविता को रैप में ढालने की तड़प और वर्गभेद को पार करने की ललक को चेहरा देने वाला विलक्षण अभिनय अगर आपको देखना है, तो ‘गली बॉय’ नहीं देखने की गलती मत कीजिएगा. अच्छे सिनेमा का टाइम इतने जोर-शोर से कभी-कभार ही आता है!