राजनीति में कब क्या हो जाए, कहा नहीं जा सकता. हाल तक चंद्रबाबू नायडू के लिए सब ठीक चल रहा था. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से अलग हटने के बाद वे विपक्षी एकजुटता की धुरी बनते दिख रहे थे. तेलंगाना विधानसभा चुनावों में न सिर्फ उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया बल्कि गैर कांग्रेसी नेताओं से भी मिलने-जुलने का सिलसिला चलाया. इन चुनावों के दौरान उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ मंच भी साझा किया.

राहुल गांधी के अलावा भी चंद्रबाबू नायडू ने कई नेताओं से मुलाकात कर विपक्ष को एक सूत्र में बांधने की कोशिश की. इनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार, तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी, बीजू जनता दल के मुखिया नवीन पटनायक और आम आदमी पार्टी संयोजक अरविंद केजरीवाल शामिल हैं. इस सबसे ऐसा लगा कि जिस भूमिका में कभी जेडीयू प्रमुख और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बाद में ममता बनर्जी दिख रहे थे, उसमें अब चंद्रबाबू नायडू आ गए हैं.

लेकिन तेलंगाना चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन का प्रयोग बुरी तरह नाकाम रहने के बाद स्थिति अचानक बदल गई. चंद्रबाबू नायडू को अपनी आक्रामक मुद्रा को छोड़कर रक्षात्मक मुद्रा में आना पड़ा है. जिस कांग्रेस के साथ मिलकर वे तेलंगाना में चुनाव लड़े थे, वही कांग्रेस आंध प्रदेश में अगले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में उनके साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाह रही. तेलंगाना के लिए गठबंधन करते वक्त दोनों दलों ने साझा राजनीति को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थीं. लेकिन चुनाव में इस गठबंधन का जो हश्र हुआ उसके बाद कांग्रेस के अंदर यह बहस छिड़ गई है कि चंद्रबाबू नायडू के साथ मिलकर आंध प्रदेश में चुनाव लड़ने से फायदा कम और नुकसान अधिक होगा.

कांग्रेस के साथ गठबंधन करके चंद्रबाबू नायडू ने तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति के प्रमुख के चंद्रशेखर राव की राह मुश्किल करने की कोशिश की थी. फिर भी वे पहले के मुकाबले कहीं बड़ा बहुमत हासिल करने में कामयाब रहे. इसके बाद से चंद्रशेखर राव ने कई मौकों पर यह कहा है कि वे आंध्र प्रदेश की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे. उन्होंने इस बात के स्पष्ट संकेत दिए हैं कि जैसे चंद्रबाबू नायडू ने उनके लिए तेलंगाना में मुश्किलें पैदा करने की कोशिश की, उसी तरह की कोशिश वे आंध्र प्रदेश में नायडू के लिए करेंगे.

राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकजुटता की धुरी बनकर किंगमेकर की भूमिका तलाश रहे चंद्रबाबू नायडू के लिए उनके गृह राज्य आंध्र प्रदेश में मुश्किलें बढ़ाने का काम उनकी सहयोगी रही भाजपा भी कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष ​अमित शाह बार-बार यह दोहरा रहे हैं कि चंद्रबाबू नायडू के लिए अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो गए हैं. भाजपा के ये दोनों शीर्ष नेता ये भी कह रहे हैं ​कि चुनाव बाद भी भाजपा और टीडीपी का गठबंधन नहीं हो सकता.

मोदी-शाह के इन बयानों और कांग्रेस की ओर से गठबंधन को लेकर दिखाई जा रही अनिश्चितता के बाद चंद्रबाबू नायडू अलग-थलग पड़ते दिख रहे हैं. आंध्र प्रदेश में यह चर्चा भी चल रही है कि पूर्व मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के बेटे जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के साथ भाजपा का गठबंधन हो सकता है. एक चर्चा यह भी है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी जगन मोहन रेड्डी के संपर्क में हैं और उनकी कोशिश यह है कि जगन को सम्मानजनक स्थिति देकर कांग्रेस में वापस ले आया जाए. जगन मोहन रेड्डी जिस ओर भी जाएंगे, वे चंद्रबाबू नायडू के लिए मुश्किल ही पैदा करेंगे.

चंद्रबाबू नायडू की एक और मुश्किल है. उनके इस कार्यकाल में पांच साल के कामकाज को लेकर ऐसा माहौल नहीं बना है जैसा उनके पहले के कार्यकाल में बना था. जिस तरह की ‘विकास पुरुष’ की छवि चंद्रबाबू नायडू ने पहले गढ़ी थी आज उसी छवि वाले कई मुख्यमंत्री देश भर में दिखते हैं. इसलिए अब चंद्रबाबू नायडू अलग नहीं दिखकर कई मुख्यमंत्रियों में से एक हो गए हैं. ऐसे में कहा जा रहा है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में उन्हें सिर्फ काम के आधार पर वोट मांगने का भी कोई खास लाभ नहीं मिलने जा रहा है.

पहले आंध्र प्रदेश में और बाद में दिल्ली में मोदी सरकार के खिलाफ चंद्रबाबू नायडू के अनशन को भी राजनीतिक विश्लेषक खुद को प्रासंगिक और चर्चा में बनाए रखने की उनकी कोशिश के तौर पर देख रहे हैं. चंद्रबाबू नायडू अब भी विपक्षी नेताओं से लगातार मिलजुल रहे हैं और मोदी सरकार के खिलाफ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं. लेकिन उनके बारे में एक आम धारणा यह बनती जा रही है कि अपने गृह राज्य आंध्र प्रदेश में ही वे लगातार कमजोर होते जा रहे हैं.

इन सब बातों के आधार पर तो यही लगता है कि चंद्रबाबू नायडू अपनी राजनीति के एक मुश्किल दौर में पहुंच गए हैं. दिल्ली की सत्ता पाना तो दूर, आंध्र प्रदेश की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनकी वापसी भी मुश्किल लग रही है.