महज़ महीने भर बाद ही लोक सभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने वाली है. केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार रफाल लड़ाकू विमानों की ख़रीद प्रक्रिया में छेड़छाड़ के आरोपों से घिरी है. तीन तलाक़ पर प्रतिबंध लगाने और नागरिकता कानून में संशोधन के उसके प्रयास नाकाम हो चुके हैं. इतना ही नहीं. बीते एक महीने से ख़ास तौर पर क्षेत्रीय विपक्षी दल मोदी सरकार के ख़िलाफ़ लगातार एकजुट दिख रहे हैं. इसके अलावा सीबीआई पर नियंत्रण को लेकर हाल ही में मचे घमासान की वजह से भी हाल ही में मोदी सरकार की काफी किरकिरी हो चुकी है.
तभी अचानक 14 फरवरी को जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ (केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल) के काफ़िले पर अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला हो जाता है. इसके बाद डेढ़-दो महीने से चली रही उठापटक नेपथ्य में यानी पर्दे के पीछे चली जाती है. और देश एक भावनात्मक उबाल में डूबने-उतराने लगता है. ऐसा होना स्वाभाविक भी है. क्योंकि आतंकियों ने 42 जवानों को मौत की नींद सुलाया है.
आदर्श स्थिति तो ये है कि कहीं भी, किसी भी तरह के आतंकी हमले, एक-दूसरे पर सियासी हमलाें का विषय होने नहीं चाहिए. देश के सुरक्षा बलों पर हुआ हमला तो क़तई नहीं. मगर ये हो रहा है. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का ताज़ा बयान इसका उदाहरण है. उद्धव ठाकरे पांच साल से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में साझीदार हैं. करीब इतने ही समय से महाराष्ट्र में भी भाजपा के साथ सरकार चला रहे हैं. लेकिन जब भी मौका मिलता है वे ‘सहयोगी’ भाजपा पर अंगुली उठाने या उसे नीचा दिखाने से नहीं चूकते.
उद्धव ने शुक्रवार को ही कहा है, ‘आतंकी हमले का ख़ुफ़िया अलर्ट पहले से था. लेकिन वे कौन लोग हैं जो इस तरह के अलर्ट पर भी कार्रवाई नहीं कर सकते. जिन्होंने नहीं की. आपने उन्हें ही पूरी ज़िम्मेदारियां क्यों दे रखी हैं? उन्हें पद से हटाइए.’ अपने इस बयान में उद्धव ने किसी का नाम नहीं लिया है. लेकिन उनके बयान के ‘आप’ का मतलब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ‘सभी ज़िम्मेदारियां संभालने वाले’ का अर्थ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से लगाया जा रहा है.
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी एक तरफ़ कह रहे हैं कि वे और उनकी पार्टी ‘इस मुश्किल घड़ी में सरकार के साथ है. हमें कोई बांट नहीं सकता.’ लेकिन इसी कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला सरकार पर अंगुली उठा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके ‘56 इंच के सीने’ की ताक़त दिखाने की चुनौती दे रहे हैं.
वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपील कर रहे हैं कि ‘यह ‘भावनात्मक पल’ है. इस हमले की वज़ह से देश के लोगों का खून खौल रहा है. आलोचना करने वाले इसका राजनीतिक लाभ न उठाएं.’ लेकिन दूसरी और पीएमओ में मंत्री जितेंद्र सिंह इस हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के सियासी दलों को कटघरे में खड़ा कर चुके हैं. प्रधानमंत्री भी सभी से कह रहे हैं कि उन्होंने इस मामले में सेना को कुछ भी करने की खुली छूट दे दी है. जबकि सभी को पता है कि इतने बड़े मसले पर कोई भी फैसला सिर्फ देश का राजनीतिक नेतृत्व ही ले सकता है.
सोशल मीडिया भी इस मसले पर अपनी ‘अनसोशल’ भूमिका निभा रहा है. उदाहरण नीचे दिए गए एक पत्र से समझा जा सकता है. यह पत्र जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले से पहले पुलिस और अर्धसैनिक बलों के शीर्ष अफ़सरों को आठ फरवरी के दिन जारी किया गया. ‘सत्याग्रह’ इस पत्र की प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं करता. अलबत्ता इतना तय माना जा सकता है कि पत्र जिन सोशल मीडिया समूहों से प्रसारित हो रहा है, वे निश्चित ही केंद्र में सरकार चला रही भाजपा के लोगों से संंबद्ध नहीं हैं. वे विपक्ष या उसकी विचारधारा से जुड़े लोग हो सकते हैं.

इस पत्र से केंद्र सरकार की दो ख़ामियां उजागर होती हैं. एक- अगर इस तरह का ख़ुफ़िया अलर्ट जारी हुआ तो इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया. दूसरी बात- यह अतिगोपनीय पत्र लीक कैसे हुआ? जबकि ऐसे पत्रों को न तो फैक्स किया जाता है और न ही ईमेल, ऐसा इसी पत्र में सबसे ऊपर दाहिनी तरफ लिखा है. सोशल मीडिया इस ‘प्रामाणिक-अप्रामाणिक दस्तावेज़’ के जरिए सरकार पर सवाल खड़ा करके उस पर दबाव बना रहा है जिसका असर देश की सियासत पर और भी पड़ना तय है
आने वाले समय में आतंकी हमले को लेकर सियासत के चरम पर पहुंच जाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. महीने भर बाद ही हमारे लोकसभा चुनाव हैं. और अगर नरेंद्र मोदी सरकार ने इस हमले के ज़वाब में कोई कार्रवाई नहीं की तो विपक्षी दल चुनाव में उसकी बख़िया उधेड़ने का कोई मौका न छोड़ेंगे. वहीं अगर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा कुछ हुआ तो सरकार और ‘सरकारी दल’ इसे अपनी उपलब्धि बताने से नहीं चूकेंगे. उरी हमले के बाद जो हुआ उस पर ‘पराक्रम पर्व’ मनाने से लेकर ‘फिल्म बनाने तक’ सब कुछ किया जाता हम देख ही चुके हैं.
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