इस कविता संग्रह की कविता ‘आत्महत्या’ का एक अंश -

‘उसने आत्महत्या की थी / इसलिए / बरी था देश / बरी था बाजार / खरीददार बरी थे / बरी थे मां-बाप / भले ही कोसा था उन्होंने / उसकी नासमझी को बारम्बार / कि उसने इंजीनियरी छोड़ / साहित्य पढ़ा था /...इससे तो भला था / कि वह / खेत में हल चलाता / दुकान खोल लेता / या यूं ही वक्त गंवाता / कम से कम पढ़ाई का खर्चा ही बचता / भाग्य को कोस लेते / पर बची तो रहती कुछ इज्जत / न पढ़ने से कुछ तो हासिल होता / बरी थी प्रेमिका / हार कर जिसने / मां-बाप का कहा माना था /...भला तो यह भी था कि / किस्से-कहानी सुना / या यूं ही कुछ गा बजा / भीख ही मांग लेता / कुछ तो पेट भरता / तो आखिर पुलिस ने मान लिया कि आत्महत्या हुई / उन्हीं किताबों के चलते / जिनमें कल्पनाएं थीं और थे सपने / डरावनी आशंकाएं थीं / भ्रम थे अपने / सो उसकी लाश के साथ किताबें भी जला दी गईं.’


कविता संग्रह : पिरामिडों की तहों में

लेखिका : सुमन केशरी

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन

कीमत : 395 रुपए


कभी-कभी कविताएं कुछ-कुछ सपनों की मानिंद हो जाती हैं. माने कभी गुदगुदाती हैं, कभी उदास करती हैं, कभी हंसाती हैं, कभी दिल के बहुत करीब लगती हैं तो कभी-कभी बहुत ही बेसिर-पैर की भी हो जाती हैं. सपनों के बारे में तो फिर भी यह कहते बुरा नहीं लगता कि बड़ा ही बेसिर-पैर का सपना था. पर कविताओं के बारे में ऐसा कहते हुए अच्छा नहीं लगता, क्योंकि वे किसी खास मौके पर, खास भावों के कारण, कुछ खास लम्हों में जन्म लेती हैं और किसी व्यक्ति विशेष का प्रयास होती हैं.

लेकिन अच्छा चाहे न लगे पर सच यही है कि बहुत सी कविताओं का पता नहीं लगता कि वे किस गृह-नक्षत्र में जन्मी थीं और क्यों! मतलब वे पढ़ने वालों के सिर के ऊपर से कुछ इसी तरह से निकल जाती हैं कि पाठक सिर्फ कंधे उचकाकर रह जाता है. ‘पिरामिडों की तहों में’ कविता संग्रह में कंधे उचकाने वाली ऐसी बहुत सी कविताओं के साथ, स्त्री मन की कुछ भावुक और कुछ दिल छूने वाली कविताएं हमें देता है.

इस संग्रह की शीर्षक कविता से लेकर अन्य बहुत सी कविताएं आम पाठक के जेहन में नहीं जा पाती. और समझ में आए बिना तो कोई भी रचना न प्रभावित करती है और न ही सुखद लगती है. सुमन केशरी की कई कविताएं बिल्कुल सिर के ऊपर से गुजर जाती हैं. वे उन कविताओं में किस मुद्दे को उठाती हैं, क्या कहना चाहती हैं यह पता ही नहीं चल पाता. इस कारण उन्हें पढ़कर कुछ खीज-सी भी महसूस होती है. ऐसी ही एक कविता है ‘ये दिन पिरामिडों की तहों में गुजरते दिन हैं’. इसी की कुछ पंक्तियां –

‘ये दिन पिरामिडों की तहों में गुजरते दिन हैं / घुप्प अंधेरों में बसी है / दमघोंटू जहरीली हवा / पत्थर बन गई हड्डियों पर बिछी / भुरभुरी मिट्टी / पांवों के नीचे सांपिन-सी सरकती है / भय केवल भय / आत्माएं जाग रही हैं / जीवन के अहसास भर से / वे पहचानती नहीं मुझे / स्तब्ध आत्मग्रस्त संशयी निगाहों से टटोलती हैं /...यह पिरामिडों की मेरी तीसरी यात्रा थी / तीन बार पुकारने पर प्रेत जागते हैं / ऐसा ही कहा था गुरु ने / मैंने गुरु को पुकारा तीन तीन बार / आत्माएं मेरा अनुगमन कर / पुकारने लगीं गुरु को / पिरमिड में गूंज रही थीं कातर पुकारें / गुरु कहीं नहीं थे.’

सुमन केशरी ने इस संग्रह में सबसे ज्यादा कविताएं स्त्रियों पर लिखी हैं. वे सभी प्रभावित चाहे न करती हों, लेकिन उनमें स्त्री अस्मिता की गहरी ठसक है जो अच्छी लगती है. वहीं कुछ कविताएं काफी अच्छी बन पड़ी हैं जिन्हें पढ़ना सुखद लगता है. समाज और घर-परिवार में महिलाओं के दोयम दर्जे से कवयित्री काफी आहत हैं और इसके लिए उनके भीतर जो गुस्सा है, वह सहज ही उनकी कविता में दिखता है. ऐसी ही एक कविता है ‘निष्कासित’ –

‘कभी किसी औरत का घर देखा है? / कहते तो यही हैं / कि औरत ही घर बनाती है / पर जब भी बात होती है घर की / तो वह हमेशा मर्द का ही होता है / और / वहां से निष्कासित / औरत ही होती है’

इसी मिजाज की एक अन्य कविता में सुमन महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग सामाजिक मानदंडों पर त्यौरी चढ़ाते हुए कहती हैं -

‘कैसा अजीब ढब है / पुरुष घर छोड़े तो वैरागी हो जाता है / संन्यासी कहलाता है / सब उसके पांवों पर गिर / धन्य हो जाते हैं / और / औरत अगर घर छोड़े तो / कुलटा कहलाती है / हर दर से ठुकराई जाती है / सबके पांवों की ठोकरें / वह खाती है / आह! / इसका अपवाद तो / सीता भी नहीं हुई!!’

एक सजग लेखक की नजर अपने भविष्य के साथ वर्तमान पर भी जरूर होती है. दुखते वर्तमान की हर एक कसक और संत्रास को गहराई से महसूस करता लेखक जब उस पीड़ा में अपने पाठकों को भी साझीदार बनाता है तो महसूस होता है जैसे हम अकेले ही उस टीस से नहीं गुजर रहे थे. सुमन केशरी समाज में बढ़ रही हिंसा से काफी आहत हैं. वे उस अकेलेपन को काफी गहराई से महसूस करती हैं जो अक्सर ही हिंसा के साक्षी रहे व्यक्तियों के भीतर पनपता है. हिंसा के गवाहों के सामने आजीवन एक किस्म की चुनौती ये होती है कि वे अपने भयावह अनुभवों को किसी से इसलिए नहीं बांट पाते क्योंकि उन्हें डर होता है कि कोई भी उनकी बात का भरोसा नहीं करेगा. ऐसी ही मनःस्थिति पर सुमन लिखती हैं –

‘हां बस देखता जाता था बेचैन / कि कैसे बताए वह / उस रात के बारे में / जब उसने अपने ही पड़ोसियों को बाल्टी उठा / पेट्रोल फेंकते देखा था घरों पर / कैसे बताए कि / आया था उड़ता एक गोला और / आग बरसने लगी थी चारों ओर / कैसे बताए उस रात अंधेरे की गोद गरम थी / बावजूद थर-थर कांपते जिस्मों के / कैसे बताए तब से अब तक / कितनी बार धंसा है वो समन्दर में / आग बुझाने / कोई नहीं मानता उसकी बात / कोई नहीं जानता समन्दर की थाह.’

‘पिरामिडों की तहों में’ कविता संग्रह की लेखिका असहनीय होते जा रहे दौर में मनुष्य बने रहने के लिए आवश्यक मानवीय चेतना को खोजती हुई महसूस होती हैं. अभिव्यक्ति की आजादी, स्त्री अस्मिता, लड़कियों के ऊपर सामाजिक दबाव, मांओं के बेटियों को जन्म न दे सकने के दबाव आदि मुद्दों को उन्होंने अपनी कविताओं का हिस्सा सबसे ज्यादा बनाया है.

वही संग्रह की कई सारी कविताएं सामान्य पाठक की समझ की परीक्षा लेती हुई सी नजर आती हैं. दूसरी तरफ जो कविताएं समझ के स्तर पर खरी उतरती हैं, वे अपने भाव में गहरी होते हुए भी संभवतः अभिव्यक्ति के स्तर पर पीछे छूट जाती हैं इसलिए बहुत प्रभावित नहीं करती. कुल मिलाकर यह कविता संग्रह पाठक को एक रीतेपन के से अहसास के साथ छोड़ देता है.