हाल में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है. इसमें उसने अपील की है कि अयोध्या में जो गैर-विवादित जमीन है उसे भारत सरकार को वापस दे दिया जाए. केंद्र सरकार का कहना है कि वह गैर विवादित जमीन मूल मालिकों को लौटाना चाहती है. इस जमीन पर सुप्रीम कोर्ट ने करीब ढाई दशक पहले यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था जिसे सरकार ने वापस लेने की मांग की है.

अयोध्या में गैर-विवादित जमीन में से ज्यादातर रामजन्मभूमि न्यास की है. यह विश्व हिंदू परिषद द्वारा शुरू किया गया ट्रस्ट है जिसे राम मंदिर निर्माण के लिए बनाया गया है. केंद्र की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को मुख्य मामले के साथ जोड़ दिया है. यानी इसकी सुनवाई 26 फरवरी को मुख्य मामले के साथ ही होगी.

अयोध्या में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ी जिस भूमि पर झगड़ा है वह 0.313 एकड़ ही है. छह दिसंबर, 1992 को बाबरी मस्जिद विद्ध्वंस की शुरुआत इसी ज़मीन से हुई थी. बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद 1993 में यह और इसके आसपास की करीब 67 एकड़ जमीन केंद्र सरकार ने अधिग्रहीत कर ली थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस जमीन पर स्टे लगा दिया था.

छह दिसबंर 1992 को अयोध्या में जो हुआ वह घटनाओं के एक लंबे सिलसिले का नतीजा था. आइए सिलसिलेवार तरीके से समझा जाए कि कैसे हर सरकार ने बाबरी मस्जिद को गिराने में धक्का लगाया.

पहला धक्का: 1949, नेहरू और पंत के बीच टकराव

यह विवाद 23 दिसंबर 1949 को शुरू हुआ. सवेरे बाबरी मस्जिद का दरवाजा खुला तो उसके भीतर राम के बाल रूप यानी राम लला की मूर्ति रखी थी. एक पक्ष ने कहा कि रामलला प्रकट हुए हैं. दूसरे पक्ष का दावा था कि किसी ने रात में चुपचाप बाबरी मस्जिद में घुसकर यह मूर्ति वहां रख दी थी. अगले दिन मस्जिद में हजारों की भीड़ जमा हो गई. तनाव बढ़ने लगा.

जब जवाहरलाल नेहरू को इस विवाद का पता चला तो उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत को पत्र लिखकर यथास्थिति कायम करने का आदेश दिया. पंत हिंदूवादी सोच के नेता थे. वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर अपनी किताब ‘बियॉन्ड द लाइन्स’ में इसका जिक्र किया है. उनके मुताबिक नेहरू ने लिखा कि ‘पूरे उत्तर प्रदेश का माहौल बद से बदतर होता जा रहा है और यकीनन उत्तर प्रदेश अब अपना घर नहीं लगता. कोई भी साक्ष्य इस बात को प्रमाणित नहीं करता कि वहां कभी मंदिर था.’ पंत ने नेहरू के ख़त का जवाब नहीं दिया. उन्होंने मूर्तियां तो नहीं हटवाईं लेकिन, परिसर पर ताला जड़वा दिया.

दूसरा धक्का : 1985, शाहबानो मामला और मस्जिद के ताले खुलना

शाहबानो मामले में राजीव सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी. तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुजारा भत्ता दिए जाने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसने संसद के रास्ते पलट दिया था. सरकार पर मुस्लिम तुष्टिकरण का इल्ज़ाम लगा. संतुलन बिठाने के लिए वे हिंदू तुष्टिकरण की राह चल पड़े. बाबरी मस्जिद परिसर के ताले खोल दिए गए. नेहरू के काल में धर्मनिरपेक्षता का मतलब हर धर्म से समान दूरी था. अब इसके मायने हर धर्म से समान नज़दीकी हो गया.

तीसरा धक्का : 1990 में आडवाणी की रथ यात्रा

राजीव गांधी सरकार की भूल ने संघ के हाथों में मंदिर का मुद्दा थमा दिया था. यहीं से भाजपा का उभार शुरू हो गया. जहां 1984 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ़ दो सीटें ही मिली थीं, वहीं 1989 में यह आंकड़ा 86 पर आ गया. हालांकि जनता दल की सरकार को समर्थन दे रही भाजपा को उस समय धक्का लगा जब प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू कर मैदान मार लिया. ऐसे में भाजपा को मंदिर मुद्दा ही सत्ता तक पहुंचने का ज़रिया दिखाई दिया. मंडल की प्रतिक्रिया में उसने कमंडल का अस्त्र चलाया. लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से लेकर अयोध्या तक की रथ यात्रा का ऐलान कर दिया.

25 सितंबर 1990 को आडवाणी ने सोमनाथ से अपनी रथ यात्रा शुरू की. इस छह हफ़्ते बाद अयोध्या पहुंचना था. यात्रा आगे बढ़ने के साथ सांप्रदायिक तनाव भी बढ़ता गया . आडवाणी के साथ विश्व हिंदू परिषद और अन्य हिंदू संगठनों के समर्थक चल रहे थे. शहर दर शहर राम मंदिर के निर्माण का आह्वान करते हुए नारे गूंजने लगे. रथ यात्रा बिहार पहुंचते ही मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने इसे रोक लिया. उधर, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने कार सेवकों को अयोध्या में घुसते ही रोक लिया और वापस भेज दिया. पर, फिर भी कुछ कारसेवक विवादित स्थल तक पहुंच गए और तोड़ फोड़ शुरू कर दी. पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया. कई लोग मारे गए. देश भर में दंगे फैल गए. वीपी सिंह सरकार चुपचाप खाड़ी तमाशा देखती रही और रथ यात्रा रक्त यात्रा में बदल गयी.

चौथा धक्का: कल्याण सिंह की सरकार और वह ज़मीन

साल 1991 में केंद्र में नरसिम्हा राव के नेतृत्व कांग्रेस सरकार बनी. जानकारों की मानें तो भाजपा को अहसास था कि कांग्रेस मंदिर मुद्दे पर खुलकर विरोध में नहीं उतरेगी, सो उसके हौसले बढ़े हुए थे. उसी समय उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह के हाथ से सत्ता निकलकर भाजपा के पास आ गई थी. कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 1991 में विवादित परिसर के आसपास की ज़मीन को राम मंदिर न्यास के हवाले कर दिया. यह वही ज़मीन है जिसका ज़िक्र ऊपर किया गया है. सरकार ने पर्यटन को बढ़ावा देने के बहाने 2.77 एकड़ ज़मीन अपने कब्ज़े में ली और राम मंदिर समर्थक दलों ने इस पर हलचल शुरू कर दी.

1992 में अयोध्या गए केंद्र के एक प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि मस्जिद को काफ़ी नुकसान पहुंचाया जा चुका है और मस्जिद के नज़दीक चबूतरे का निर्माण किया जा चुका है. यह सब कल्याण सिंह की नाक के नीचे हो रहा था. हालात तेज़ी से सरकार के हाथ से फिसलते जा रहे थे.

पांचवां धक्का: विश्व हिंदू परिषद का ऐलान

इस सब हलचल के दौरान विश्व हिंदू परिषद ने छह दिसंबर 1992 को विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण करने का ऐलान कर दिया. हज़ारों कार सेवक एक बार फिर अयोध्या की ओर चल पड़े. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार होने की वजह से कट्टरपंथी हिंदू संगठनों के हौसले आसमान छू रहे थे. केंद्र ने कल्याण सिंह को दिल्ली तलब किया और ताकीद की कि इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट को हल करने दिया जाए. कहते हैं कि आत्मविश्वास के अतिरेक से लबरेज़ कल्याण सिंह ने प्रधानमंत्री से कहा कि इस मुद्दे का सिर्फ़ एक ही हल है- विवादित ढांचे को हिंदुओं के हवाले कर दिया जाए.

रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ़्टर गांधी’ में लिखते हैं, ‘कल्याण सिंह ने आदेश जारी कर दिया कि अयोध्या आने वाले कार सेवकों की ख़ातिर सरकारी खर्च पर की जाए.’ उधर, गृह मंत्रालय ने 20,000 अर्धसैनिक बलों को अयोध्या भेज दिया. वे आए तो सही पर उन्होंने डेरा शहर से कुछ दूर डाला. यह दूरी एक घंटे की थी. दूसरी तरफ़, लगभग एक लाख कर सेवक अयोध्या आ टिके थे. गुहा लिखते हैं कि दिल्ली से अयोध्या रवाना होने से एक रात पहले आडवाणी ने प्रेस कांफ्रेस में कहा कि वे भी नहीं जानते कि छह दिसंबर को क्या होने वाला है. उनका कहना था, ‘मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि कार सेवा ज़रूर होगी.’

आख़िरी धक्का: छह दिसंबर, 1992

‘मंदिर वहीं बनायेंगे’, ‘एक धक्का और दो, बाबरी मस्जिद तोड़ दो’ के नारों से अयोध्या गूंजने लगी थी. अर्ध सैनिक बल अब भी शहर से एक घंटे की दूरी पर थे. उन्हें बुलाया ही नहीं गया. परिसर की रखवाली के लिए रैपिड एक्शन फोर्स के जवान तैनात थे. कार सेवकों का हुजूम परिसर की ओर बढ़ रहा था. भाजपा के नेता- लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, साध्वी ऋतम्भरा, उमा भारती, वीएचपी के अशोक सिंघल- सब परिसर के नज़दीक जमा थे.

कुलदीप नैयर ने लिखा है कि इस दौरान नरसिम्हा राव अपने पूजा कक्ष में बैठे हुए थे. उधर, इंडिया टुडे ने लिखा कि एसबी चह्वाण भी अपने पूजा कक्ष में ध्यान मग्न थे. तभी एक कारसेवक मस्जिद के गुम्बद पर चढ़ गया और उसकी देखा-देखी कई और भी. फ़ैज़ाबादियों की सांसे रुक गयी थीं, जहां विभाजन के वक़्त भी दंगे नहीं हुए थे वह शहर अब यकीनन होने वाले दंगों के डर से कांप रहा था. देखते-देखते 400 साल पुरानी बाबरी मस्जिद तोड़ दी गयी. और साथ ही दफ़न हो गई भारत की धर्मनिरपेक्षता.

बाद में क्या हुआ?

देश भर में दंगे, तकरीबन 2000 से ज़्यादा मौतें, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान ही मरे. कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने बाद में इसका बदला मुंबई में बम धमाके करके लिया. केंद्र ने उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया और मामला सुप्रीम कोर्ट चला गया. साल 1993 में सरकार ने विवादित स्थल के आसपास 67 एकड़ भूमि का अधिग्रहण कर लिया. उसने इस घटना पर लिब्राहन आयोग भी बिठाया जिसने लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती आदि को ढांचा गिराने का ज़िम्मेदार माना. आयोग अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये. अब हर पांच सालों में यह मुद्दा उठ खड़ा होता है. फिर चुनाव आ गए हैं. राजनीति की कढ़ाई में फ़ैज़ाबाद को तला जा रहा है और अयोध्या बनाकर परोसा जा रहा है.