अभिनेता-कलाकार अमोल पालेकर ने एक दिवंगत और लगभग विस्मृत कलाकार प्रभाकर बर्वे की पुनरवलोकी प्रदर्शनी का उदघाटन करते हुए राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय में हो रही मनमानी, सलाहकार समितियों के पुनर्गठन में देरी, पिछली समिति द्वारा अनुमोदित दो कला-प्रदर्शनियों को रद्द करने आदि की तीख़ी आलोचना की. इस पर उन्हें दो बार टोका गया और उनसे प्रभाकर बर्वे पर बोलने के लिए कहा गया. पालेकर ने इसे उनकी स्वतंत्रता पर आघात मानते हुए अपना वक्तव्य बीच में ही समाप्त कर दिया. मुंबई का बड़ा कला-समुदाय वहां मौजूद था और उनमें से किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की.

बाद में दिल्ली से महानिदेशक ने स्पष्ट किया है कि सलाहकार समिति का कार्यकाल पिछले नवंबर में ही समाप्त हुआ है उनके पुनर्गठन की प्रक्रिया चल रही है तथा दो कलाप्रदर्शनियां रद्द नहीं की गयी हैं. यह भी बताया है कि पिछली समिति की सिफ़ारिशों पर अमल न करने का प्रश्न नहीं है, वह होगा. नयी समिति भविष्य की गतिविधियों के बारे में ही सिफ़ारिश करेगी.

यह एक अप्रिय प्रसंग है. इसमें संदेह नहीं. वर्तमान सत्ता ने संस्कृति की राष्ट्रीय संस्थाओं को अवमूल्यित और संकीर्ण करने, उनकी स्वायत्तता को धता बताने आदि का काम लगातार किया है और यह भी सही है कि व्यापक कलाकार-समुदाय इस बारे में कायर या चतुर या अवसरवादी चुप्पी, ज़्यादातर, साधे रहा है. इसलिए पालेकर ने एक सही मुद्दा उठाया है. पुनरवलोकी की प्रदर्शनियों के लिए जगह कम करना उनके वितान को सीमित करना है. पर वे बर्वे पर कम बोले जिससे इस कलाप्रदर्शनी की एक तरह से उपेक्षा हो गयी और अन्य मुद्दा प्रमुख हो गया. प्रभाकर बर्वे जैसे मूर्धन्य कलाकार की इतने दशकों बाद पहली बड़ी पुनरवलोकी प्रदर्शनी संग्रहालय में ही हो रही है जो कि एक बहुत अच्छा क़दम है. इसी प्रथा को जारी रखा जाना चाहिये.

इस प्रसंग का एक पूर्वपक्ष है. 2016 में राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय बंगलुरु में मुझे एक जापानी चित्रकार की पहली भारतीय एकल प्रदर्शनी का शुभारम्भ करने के लिए चित्रकार ने आमंत्रित किया था. चित्रकार कैलिफ़ोर्निया में रहते हैं, कबीर-विशेषज्ञ बल्कि कबीर-दीवानी विदुषी लिंडा हैस के पति हैं और कुल एक स्ट्रोक में अपना हर चित्र बनाते हैं. जब शुभारम्भ का लगभग एक सप्ताह रह गया तो बंगलुरु प्रदर्शनी के स्थानीय संयोजक का फ़ोन आया कि दिल्ली से फ़ोन आया है कि प्रदर्शनी का स्वागत है, पर शुभारम्भकर्ता का नहीं. मैंने तुरन्त कहा कि शुभारम्भ मैं नहीं करने आता, प्रदर्शनी होना ज़्यादा ज़रूरी है. पर स्थानीय आयोजकों ने वहां के अलियांस फ्रांसेस में एक शाम आयोजित की जिसमें चित्रकार ने सार्वजनिक रूप से 5 चित्र बनाये और हम दोनों ने एक रोचक संवाद किया. ये सभी पहले शुभारम्भ के अवसर पर संग्रहालय में होना था. शुभारम्भ कुछ दिनों के लिए टाल दिया गया.

वसंत-अवसंंत

कहने को तिथियों के हिसाब से वसंत आ गया है लेकिन दिल्ली में जिस कड़ाके की ठंड पड़ रही है उसके रहते वसंत अभी ख़ासी दूर लगता है. अज्ञेय ने अपने एक हाइकू में लिखा था- ‘और कहीं भी वसंत आया है/या कि अलूचे ही हैं ये बौराये.’ तो वसंत कहीं आता है, कहीं नहीं आता. जहां आता है वहां उल्लास तरह-तरह से छा जाता है. जहां नहीं आता वहां ठंडी उदासी छायी रहती है. कई बार लगता है कि ऐसा भी होता है कि हम अपनी व्यस्तता में वसंत के आने-होने-जाने को लक्ष्य ही नहीं कर पाते. निराला की उक्ति है- ‘सुमन भर न लिये, सखि, वसंत गया.’ मैंने कभी लिखा था कि ‘हम अपना वसंत पहचानते हैं’ पर लगता है ऐसी कोई पहचान थी नहीं- वह कविजनोचित गर्वोक्ति ही थी!

वसंत का फूलों से विशेष संबंध है. उसे वसंती रंग के कपड़े पहनकर मनाने की परम्परा है. हमारी राग-संपदा में वसंत, वसंत बहार, जलधर वसंती आदि कई राग हैं जबकि ग्रीष्म, शिशिर आदि को लेकर नहीं. अलबत्ता हेमंत और वर्षा को लेकर राग हैं. हमारा शास्त्रीय संगीत अतिवादी मौसम, जैसे गर्मी और जाड़े को, राग के योग्य नहीं समझता.

सागर में, जहां मेरा बचपन और लड़कपन बीता, वसंत आता था और हम उसके आने-जाने को मानते थे. उस समय की मेरी अनेक कविताओं में वसंत, रंग,रूमान, कामना आदि की प्रमुखता थी. कोई अगर तब की कविताओं को पढ़कर मुझे ‘एक छोटे शहर का वसंती कवि’ क़रार देता तो भले मुझे शायद बुरा लगता पर एक प्रामाणिक वर्णन फिर भी होता. वसंती कवि होने का एक अनिवार्य आशय यह होता कि सारे अंधेरों के बावजूद आप उजाले के कवि हों. इधर मुझे अंधेरा कुछ अधिक नज़र आने लगा है और वसंत की संभावना आसानी से पकड़ में नहीं आती. अपनी कविता में भी एक कवि बहुत लंबा फ़ासला तय करता है और पहले से बाद तक पहुंचते-पहुंचते कितना बदल जाता है.

पर यह भी मानना पड़ेगा कि अंधेरों की भीषण जकड़बंदी में भी वसंत की कामना क्षीण नहीं हुई है. उजाले, उल्लास, उम्मीद, ऊष्मा और ऊर्जा की आकांक्षा शिथिल नहीं हुई है. अपने समय की भीषण सच्चाइयों से हम भाग नहीं सकते और न ही ऐसा करते हैं. पर हम उनके बरक़्स सुंदरता, लालित्य और प्रसन्नता के किसी वसंत की प्रतीक्षा करते रहते हैं. यह प्रतीक्षा ही हमारी मानवीयता है जो अदम्य है और कर्म की मांग भी करती है. वसंत यों नहीं आ जायेगा. उसके लिए प्रयत्न करना होगा. वह भाग्य या नियति की तरह नहीं है. वसंत हम रचते हैं- वह किसी कामदेव की कृपा नहीं है.

पर अभी तो अवसंत है. घेरता-चांपता-दबाता अवसंत. ठंडा, हिंसक-क्रूर, अंधेरा. वह सोचता है कि वह असमाप्य है, उसने वसंत की आकांक्षा को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया है. पर ठीक इस सबके बीच वसंत की संभावना, अंधेरी रात के बाद हुई भोर के उजास की तरह, आभा की तरह प्रगट हो रही है. हम उम्मीद का क्षितिज आलोकित होता धीरे-धीरे, देख पा रहे हैं- वसंत आ रहा है, आयेगा!

शब्दों की छाया

शब्दों के आलोक की चर्चा होती रही है. यह उचित ही कहा जाता रहा है कि शब्द हमें सच का, सच्चाई का, होने न-होने का, समय में होने और समय के पार जाने का आलोक देते रहते हैं. उनके आलोक में हमें इन सबका बोध और अनुभव अधिक गहरे, अधिक सघन स्तर पर होता है. ऐसा बहुत कुछ है हमारे अनुभव और भावना में जो शब्द न पाता तो कभी आलोकित ही न होता. सच्चाई के बीहड़ अंधेरों में हम अकसर शब्दों की लालटेन लिये भटकते रहते हैं. कई बार जब सुबह बहुत दूर लगती है, हम शब्दों की रोशनी से ही राहत और गरमाहट, उम्मीद और धीरज पाते हैं.

कुमार गंधर्व एक निर्गुण पद गाते थे- ‘गुरु जी, मैं जहां बैठूं वहां छाया जी’. शब्दों का अगर आलोक होता है तो उनकी छाया भी होती है. उसी छाया में हम कई बार चैन, सुकून और समझ पाते हैं. जैसे संगीत में सुरों का वितान छा जाता है अपने अलग-अलग रागरूपों में और उस की छाया में हम आलिप्त बैठे रहते हैं वैसे ही साहित्य में शब्दों का वितान अपनी अनेक विधाओं में छा जाता है और हम उसके नीचे अपने जीवन के अर्थ को नबेरते बैठे रहते हैं.

इस समय हम शब्दों और बिम्बों से लगातार घेरे जाते लोग हैंं. यह घेरा हमें सोचने तक की फुरसत नहीं देता. इसमें हर पल घमासान मचा होता है जिसमें हम बुरी तरह फंस जाते हैं और तंग आकर अपना विवेक, अपनी बुद्धि स्थगित कर देते हैं. यह शब्दों की छाया नहीं, उनका एक अभद्र घेरा है. शब्दों की छाया में हम घेरे नहीं जाते बल्कि हमारा आत्मविस्तार होता है. वे हमें मुक्त करते हैं. उनसे कोई फ़ौरी नतीजा नहीं निकलता और न ही वे सच्चाई से भागने का कोई उपाय सुझाते हैं. वे तो हमें अपनी और अपने आसपास की सच्चाई को अधिक तीख़ी और संवेदनशील कुशाग्रता से महसूस करने के लिए प्रेरित करते हैं.

वह ऐसा छाया होती है जो हमें जताती रहती है कि उसकी छाया के पार भी अपार जीवन है. साहित्य हमें जीवन से सीधे संपर्क में सच्चाई से दुहरे संवाद में अवस्थित करता है पर यह भी याद दिलाता रहता है कि जीवन और सच्चाई उसके भूगोल से कहीं बड़े और जटिल हैं. इस अहसास के साथ जीवन में वापस जाना अधिक सतर्क नागरिक की तरह वापस जाना है. साहित्य हमारी नागरिकता का विस्तार करता, उसमें अधिकार और ज़िम्मेदारी का भाव सघन-तीव्र करता है. जैसे जीवन में वैसे ही साहित्य में आलोक और छाया की आंख मिचौली चलती रहती है. हमें कुछ आलोक में बेहतर दिखायी देता है और कुछ छाया में.

आलोक और छाया दोनों के लिए ज़रूरी है शब्दों की जीवंत सार्थक विपुलता, उनकी अतर्कित बहुतायत नहीं. थोड़े से शब्दों से अकसर न आलोक मिलता है न ही वे छाया देते हैं. टिकाऊ वितान तभी बनता है जब शब्दों की बड़ी सम्पदा हो, किसी एक लेखक के यहां नहीं, सब लेखकों के यहां मिलकर. तभी वह हमारी अनिवार्य बहुलता का प्रामाणिक साक्ष्य भी बन पाता है.