देश की 130 करोड़ से अधिक आबादी में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 1,600 की है. 32 लाख वर्ग किलोमीटर की जमीन के विशाल दायरे में वे केवल आठ वर्ग किलोमीटर के सीमित दायरे में फैले हुए हैं. सरकार उनकी आबादी बढ़ाने की कोशिशों में लगी हुई है, लेकिन उनका जोर परिवार छोटा रखने पर है. हम बात कर रहे हैं संकटग्रस्त आदिम जनजाति-टोटो और इसके इलाके टोटोपाड़ा की.

टोटोपाड़ा
टोटोपाड़ा

यह इलाका पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में भूटान सीमा के करीब पड़ता है. प्रकृति की गोद में बसे टोटोपाड़ा तक पहुंचने के लिए करीब आधी दर्जन छोटी नदियों को पार करना होता है. इनमें एक नदी टोरसा भी है. गूगल मैप पर जब आप टोटोपाड़ा जाने के लिए रास्ता खोजेंगे तो वह इसी नदी के बीच से जाता दिखाई देगा. जल्दापाड़ा वन्यजीव अभ्यारण्य से होकर जाने वाले इस कच्चे रास्ते पर जब आप चलते हैं तो मनमोहक नजारों के चलते जीप को लगने वाले हिचकोले ज्यादा नहीं सालते.

इसके सबसे करीब स्थित मदारीहाट शहर से जब करीब डेढ़ घंटे का सफर कर टोटोपाड़ा पहुंचते हैं. हल्की-हल्की बारिश हो रही है. सड़क पर लोग न के बराबर हैं. मुख्य बाजार में करीब दर्जन भर दुकानें हैं और कमोबेश इतनी ही संख्या में दुकानदार भी. राजेंद्र प्रसाद इन्हीं में से एक हैं. उनका ताल्लुक बिहार के मोतिहारी से है. राजेंद्र अपनी जवानी के दिनों से टोटोपाड़ा में राशन की दुकान चलाते हैं. वे कहते हैं, ‘मेरे पिता-दादा बंगाल में आकर बसे थे. उसके बाद मैं इस इलाके में आकर बस गया.’ टोटोपाड़ा के बारे में वे कहते हैं, ‘यहां (मदारीहाट विधानसभा क्षेत्र) से बाहर निकलने के बाद तो लोग टोटोपाड़ा को जानते भी नहीं.’

देश के दूसरे इलाकों से यहां आकर बसने वालों में राजेंद्र प्रसाद अकेले नहीं हैं. नेपाली और बंगाली समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में यहां बस गए हैं. वक्त के साथ नेपालियों की संख्या तो टोटो समुदाय की तुलना में दोगुनी से भी ज्यादा हो चुकी है.

टोटोपाड़ा का मुख्य बाजार
टोटोपाड़ा का मुख्य बाजार

टोटो जनजाति के लोगों से मिलने के लिए हम बाजार से करीब आधा किलोमीटर दूर उनके गांव पहुंचते हैं. अधिकांश घरों में कोई हलचल नहीं दिखती. स्थानीय लोगों से पूछने पर मालूम होता है कि करीब सभी टोटो लोगों के पास खेती की जमीन है. जिनके पास अधिक जमीन नहीं वे या तो दूसरे के खेत में मजदूरी करते हैं या फिर बंटाई पर जमीन लेकर मक्का और धान की खेती. इसके लिए वे घर से सुबह छह बजे ही खेतों के लिए निकल जाते हैं और शाम को वापस लौटते हैं. खेतों में भी रहने के लिए उनका एक घर होता है. खेती के अलावा सुपारी के बागान भी टोटो जनजाति के लोगों के लिए आय का एक छोटा जरिया है.

गांव में पसरी चुप्पी के बीच थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर हमारी मुलाकात विनोद टोटो से होती है. वे हमें पारंपरिक शैली में बने अपने घर के करीब ही मिलते हैं. हालांकि, अब वे इसे किचन की तरह इस्तेमाल करते हैं जबकि वे खुद अपनी पत्नी के साथ टीन से बने हुए घर में रहते हैं. 24 साल के विनोद बताते हैं कि इस तरह के घरों की जगह अब पक्के और टीन से बने हुए मकानों ने ले ली है. इस बात को ध्यान में रखते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने पारंपरिक टोटो आवास को संरक्षित करने के लिए 2017 में उसे ‘मॉडल होम’ का दर्जा दे दिया था.

हालांकि इससे लगता नहीं कि कुछ फर्क पड़ने वाला है. विनोद कहते हैं, ‘लोग अब नहीं बनाना चाहता है ऐसा घर. लोग अब पहले से अधिक डेवलप्ड हो गया. थोड़ा रुपया कमाने लग गया. अब टीन और सीमेंट से घर बनाता है. लकड़ी तो अब सीमेंट से भी अधिक महंगा पड़ता है, इसलिए लकड़ी का भी घर नहीं दिखता है.’ उनसे जब हमारी बातचीत हो रही होती है तो बारिश के साथ उनके कमरे से टीवी की आवाज भी सुनाई देती है. विनोद बताते हैं कि गांव में बिजली आए हुए 20 साल से अधिक हो गए हैं लेकिन, उन तक पक्की सड़क अभी तक नहीं पहुंच पाई है.

टोरसा नदी से होकर टोटोपाड़ा जाने के लिए बिना पुल का रास्ता
टोरसा नदी से होकर टोटोपाड़ा जाने के लिए बिना पुल का रास्ता

वहीं, बरसाती नदियों में पुल न बनाए जाने को लेकर भी विनोद अपनी निराशा जाहिर करते हैं. वे कहते हैं, ‘नदी में जब पानी भरा होता है तो हमारा आना-जाना (मदारीहाट) बंद हो जाता है’. इस समस्या से विनोद जैसे आम लोगों के साथ-साथ छात्रों को भी जूझना होता है. पढ़ाई के लिए मदारीहाट जाने वाले 11वीं के छात्र अरविंद टोटो बताते हैं, ’10वीं के बाद पढ़ाई करने के लिए बाइक से मदारीहाट जाना होता है. बारिश के दिनों में प्रॉब्लम बढ़ जाता है.’ हालांकि, इन लोगों के लिए राहत की बात है कि बारिश का पानी इन नदियों में अधिक दिनों तक नहीं टिकता. बारिश कम होने या रुकने के साथ ही नदियों का जल स्तर भी घट जाता है.

वैसे 11वीं और 12वीं में पढ़ने वाले टोटोपाड़ा के छात्रों की मुश्किल अब कम हो जाएगा. अगले शैक्षणिक सत्र से इन कक्षाओं की पढ़ाई यहीं शुरू हो जाएगी. यहां के उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रिंसिपल मीशा घोषाल बताती हैं कि कुछ दिन पहले ही 12वीं तक की पढ़ाई कराने का आदेश मिल चुका है. टोटोपाड़ा में 10वीं तक की पढ़ाई के लिए सभी छात्र इस इकलौते स्कूल पर ही निर्भर हैं.

मीशा घोषाल
मीशा घोषाल

वहीं, मीशा घोषाल अन्य समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचती हैं. वे बताती हैं, ‘सरकार की ओर से स्कूल के विकास के लिए दिया जाने वाला फंड (17,000 रुपये सालाना) पर्याप्त नहीं है. स्कूल की मरम्मत की जरूरत है. पानी का प्रॉब्लम है. सोर्स ऑफ वाटर कम है. झरना का पानी पाइपलाइन से आता है.’ उनसे पहले प्राथमिक स्कूल के प्रधानाचार्य रंजीत कुमार सिन्हा भी स्कूल के विकास के लिए पर्याप्त फंड न होने की शिकायत करते हैं. उनके मुताबिक प्राथमिक स्कूल के विकास कार्यों के लिए सालाना केवल 15,000 रुपये ही मिलते हैं. मीशा आगे बताती हैं, ‘पानी की कमी की वजह से टॉयलेट भी गंदा रहता है. उसका इस्तेमाल नहीं होता है.’

ऐसा नहीं है कि पानी की कमी की वजह से केवल स्कूल में ही शौचालयों का इस्तेमाल नहीं होता हो. टोटोपाड़ा में सरकारी सब्सिडी से बने कई ऐसे शौचालय दिखते हैं जिन्हें अब दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किया जाता है. स्थानीय लोग इनकी क्वालिटी सही नहीं होने की भी शिकायत करते हैं. इस इलाके में पानी की कमी के बारे में विनोद बताते हैं, ‘सर्दी के दिनों में पानी की समस्या बढ़ जाती है.’

शौचालय का दूसरा इस्तेमाल
शौचालय का दूसरा इस्तेमाल

टोटो जनजाति के लोग केवल इन बुनियादी समस्याओं से ही नहीं जूझ रहे. उनके सामने रोजगार के साथ-साथ अपनी भाषा और परंपरा को बचाए रखने की भी चुनौती है. रीता टोटो इस समुदाय की पहली ग्रेजुएट हैं. उन्हें इस उपलब्धि के लिए सरकार ने नौकरी दी है. 2010 में ग्रेजुएशन करने वाली रीता टोटो समुदाय के कल्याण के लिए सोशल वर्कर के रूप में काम कर रही हैं.वे बताती हैं, ‘ग्रेजुएट होने के बाद जब मुझे नौकरी लगा तो टोटो लोगों ने पढ़ाई पर अधिक ध्यान देना शुरू किया. लेकिन, अब यह थम गया है. जो पढ़ाई किया है, उनको जॉब नहीं हो रहा है. इस वजह से पढ़ने वाला सोचता है कि जब इन लोगों को नहीं हो रहा है तो हमारा क्या होगा! यही सब सोचकर कई लोग पढ़ाई भी बीच में छोड़कर काम-धंधा में लग जाता है.’

पढ़ाई पूरी करने के बाद भी टोटो लोगों को रोजगार न मिलने की बड़ी वजह उनकी भाषा को लेकर समस्या है. पुलिसकर्मी गौतम टोटो बताते हैं. ‘प्रॉब्लम क्या है कि सरकारी स्कूल में अंग्रेजी और हिंदी का पढ़ाई नहीं होता है. केवल बांग्ला में होता है. अगर अंग्रेजी-हिंदी में होता तो अच्छा होता. जॉब के लिए जो एक्जाम होता है, वो तो अंग्रेजी और हिंदी में होता है. ऐसा होने पर हमारा लोग फेल हो जाता है और पढ़ाई करने के बाद भी नौकरी नहीं लगता है.’ उनकी मानें तो पूरे समुदाय में करीब 30 लोगों के पास सरकारी नौकरी है. इनमें आंगनबाड़ी सहित अन्य स्थायी और अस्थायी कर्मी शामिल हैं.

समुदाय में रोजगार के संकट पर रीता टोटो सरकार से अपने समुदाय के लिए एक साल में केवल दो नौकरी के लिए कोटे की मांग करती हैं. उनका कहना है, ‘अनुसूचित जनजाति (एसटी) आरक्षण के तहत उन्हें कोटा हासिल है. इसके बाद भी टोटो अन्य जनजातियों से काफी पिछड़े हुए हैं. इस वजह से उन्हें इस आरक्षण का फायदा नहीं मिल पाता.’

टोटो जनजाति केवल दूसरी जनजातियों के मुकाबले ही पिछड़े हुए नहीं है बल्कि, टोटोपाड़ा में नेपाली सहित अन्य समुदाय के लोगों के बसने की वजह से उनके सामने कई तरह की चुनौतियां पैदा हो गई हैं. पहले की तुलना में अब उनके पास जमीन सीमित होती जा रही है. उनके सामने अन्य जातियों के संस्कृति और भाषा के प्रभाव से अपनी संस्कृति को बचाए रखने की भी चुनौती है.

टोटोपाड़ा स्थित उत्तर बंगाल क्षेत्रीय बैंक के मैनेजर भक्त टोटो सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘यहां बाहर का आदमी भी घुस गया है. पहले नेपाली लोग यहां पर भूटान से संतरा लाता था. उस दौरान ही कई लोग हम लोगों का जमीन में बस गया. अब उन लोगों को हटाया नहीं जा सकता है.’. उनकी मानें तो 1978 से पहले टोटोपाड़ा की जमीन इस जनजाति के लिए आरक्षित थी लेकिन, भूमि सुधार के लिए शुरू किए राज्य सरकार के ऑपरेशन बरगा के तहत करीब 2,000 एकड़ में 341 एकड़ जमीन ही टोटो समुदाय के हिस्से में आई.

भक्त टोटो
भक्त टोटो

भक्त टोटो आगे बताते हैं, ‘बाकी के जमीन पर टोटो के साथ-साथ बाहरी लोग भी बसा हुआ है लेकिन, उनको इसका टैक्स नहीं देना पड़ता. उनका नाम जमीन के साथ दर्ज ही नहीं हुआ है और कोई इसका कागज भी नहीं है. हम लोगों को तो टैक्स (341 एकड़ का) भी देना पड़ता है.’

सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक धनीराम टोटो इस पर भी चिंता जाहिर करते हैं कि कम वोटर (करीब 800) होने की वजह से उनके समुदाय से कोई प्रतिनिधि संसद और विधानसभा के लिए नहीं चुने जाते. उनकी मानें तो अब स्थिति यह है कि ग्राम पंचायत के चुनाव में भी एक-दो टोटो ही निर्वाचित हो पाते हैं. वहीं, बीते साल चुनाव में नेपाली समुदाय की एक महिला ग्राम प्रधान के पद पर चुनी गईं.

‘राजनीति की वजह से अधिक प्रॉब्लम हो रहा है. संसद और विधानसभा में हमारे प्रतिनिधि नहीं पहुंच पा रहे हैं. ग्राम पंचायत में भी केवल एक टोटो चुना गया था. दूसरे समूह का वोट अधिक है. 600 वोटर है, इसका क्या कीमत है! हमलोग कुछ मांग नहीं कर सकता है. हमारा जो एमपी है, वो लास्ट बेंच पर बैठता है. कुछ डिमांड नहीं करता है.’

धनीराम की यह शिकायत अलीपुरद्वारा से तृणमूल कांग्रेस के सांसद दशरथ टिर्की को लेकर है. उनकी इस बात की पुष्टि सांसदों के कामकाज पर नजर रखने वाली संस्था पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च भी करती है. इसके मुताबिक दशरथ टिर्की ने 16वीं लोक सभा में एक भी सवाल नहीं पूछा और सिर्फ पांच चर्चाओं में हिस्सा लिया.

टोटोपाड़ा की पूरी आबादी अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए इस एकमात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर है
टोटोपाड़ा की पूरी आबादी अपनी स्वास्थ्य समस्याओं के लिए इस एकमात्र प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर है

कम आबादी की वजह से हो रहे इन नुकसानों के बाद भी टोटो अपनी जनसंख्या सीमित रखना चाहते हैं. इसके लिए वे गर्भनिरोध के तरीके अपनाते हैं जिनमें ऑपरेशन भी शामिल है. हालांकि, सरकार टोटो जनजाति की कम आबादी को देखते हुए इस ऑपरेशन पर प्रतिबंध लगा चुकी है, फिर भी इस जनजाति की अधिकतर महिलाएं चोरी-छिपे सरकारी और निजी अस्पतालों में अपना नाम बदलकर इसे अंजाम देती हैं. समुदाय के एक व्यक्ति ने सत्याग्रह को नाम न छापने की शर्त पर बताया कि इसके लिए नेपाली नाम से आईडी कार्ड बनाया जाता है. उन्होंने बताया कि जाली आईडी कार्ड बनाने से लेकर ऑपरेशन कराने तक इस काम में 10,000 रुपये तक लग जाते हैं.

पुलिसकर्मी गौतम टोटो कहते हैं, ‘जमीन को लेकर तो अब लोगों में हिस्सेदारी बढ़ गया. अब जॉब भी नहीं है. ज्यादा पॉपुलेशन करने से भी कोई फायदा नहीं है. बच्चों को अच्छा स्कूल में पढ़ाना चाहिए. अधिक बच्चा होगा तो पढ़ाई भी ठीक नहीं मिलेगा. जब छोटा परिवार वाला अच्छा करता है तो उसे देखकर दूसरा भी अपने परिवार को छोटा रखने की कोशिश करता है.’

बदलते वक्त के साथ टोटो समुदाय में परिवार के आकार को लेकर ही सोच नहीं बदल रही है. अन्य समुदायों के साथ भी उनके रिश्ते बन रहे हैं. समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अपनी संस्कृति और परंपरा को कायम रखने के लिए अन्य समुदाय के साथ वैवाहिक संबंध बनाने से बचता है. कोई भी टोटो अपनी माता के कुल के लड़के-लड़की जैसे, मौसेरे या ममेरे भाई-बहन से शादी कर सकता है. हालांकि हाल के समय में कुछ टोटो युवक और युवतियों ने अन्य समुदायों के लोगों से विवाह किया है. इस बारे में विनोद टोटो बताते हैं, ‘हमारे समुदाय में भी लड़कों के दूसरे समुदाय की लड़कियों से लव मैरेज करने का मामला सामने आया है. बाहर काम करने वाले ऐसा अधिक करते हैं. लड़कियां कम करती हैं.’

विवाह के मौके पर सुपारी के बगान में सामूहिक भोज का आयोजन, इसमें टोटो के पारंपरिक पेय इयू के साथ अब बीयर भी परोसी जाने लगी है
विवाह के मौके पर सुपारी के बगान में सामूहिक भोज का आयोजन, इसमें टोटो के पारंपरिक पेय इयू के साथ अब बीयर भी परोसी जाने लगी है

टोटो समुदाय में न तो दहेज का चलन है और न ही तलाक का. यानी एक बार विवाह होने पर इसे आजीवन निभाना होता है. माना जाता है कि इस परंपरा की वजह से कई विवाहित महिलाओं ने पारिवारिक तनाव की वजह से खुदकुशी भी की है. विनोद टोटो ऐसे दो-तीन मामले सामने आने की बात करते हैं. वैसे पत्नी या पति में से किसी एक की मौत के बाद महिला और पुरुष दोनों को एक साल बाद फिर से विवाह करने की इजाजत भी है. हालांकि, इस एक साल के दौरान उन्हें कई नियमों पालन करना होता है. इसमें पुरुष के लिए एक साल तक बाल न कटवाना और बाजार न जाना शामिल है. वहीं, महिलाएं एक साल तक बालों में कंघी नहीं करतीं. साथ ही, बारिश में भी सिर ढकने की मनाही होती है.

इसके अलावा टोटो समुदाय में शादी से पहले भी लड़के-लड़की के बीच शारीरिक संबंध मान्य है. इसके चलते महिलाओं के शोषण की आशंका रहती है. हालांकि, विनोद की मानें तो ऐसा न के बराबर ही होता है. उनका कहना है कि यदि कोई गलत करता है तो उसे समुदाय के प्रधान सजा देते हैं. विनोद टोटो बताते हैं कि वे खुद बिना विवाह के अपनी पत्नी के साथ एक साल तक रहे थे. इस दौरान उनका और उनकी पत्नी का एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था.